भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 706

तृतीय तरंग ५३१

अनुसार प्रवरसेन हिन्दुस्तान का एक सामान्य व्यक्ति था। एक धार्मिक व्यक्ति ने भविष्यद् वाणी की थी। वह राजा होगा। इस पर वह नगरकोट गया। वहाँ का अधिकारी बन गया। मातृगुप्त ने प्रवरसेन के लिये राज्य त्याग दिया। वह बनारस चला गया और साधारण जीवन व्यतीत करने लगा। प्रवरसेन एक श्रेष्ठ राजा था। उसने काश्मीर की श्रीनगरो बसायी थी। कहा जाता है कि उसमे ३० लाख ६० हजार मकान थे। उसने बहुत दान किया था। प्रवरसेन कश्मीर की ग्यारह वर्षों की मालगुजारी बराबर मातृगुप्त के पास काशी भेजता रहा। मातृगुप्त धन गरीबों में बाँटता था। श्री विल्सन ने प्रवरसेन का राज्यारोहण मूल संवत् के अनुसार सन् १२२-२३ ईस्वी देता है। श्री एस. पी. पण्डित ने प्रवरसेन का राज्या- रोहण काल सन् १२३ ई० तथा राज्यकाल १० वर्ष दिया है। श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३१८६ मास ११ तथा दिन प्रथम तथा राज्य- काल ६० वर्ष दिया है। श्री वाली ने यह समय सप्तर्षि संवत् ४०५४ तथा सन् २४४ ई० दिया है। कलिगताब्द ३२७८ वर्ष ३ मास ड्रायर के अनु- सार सन् १२३ वर्ष ८ मास तथा कनिघम के अनुसार सन् ४३२ ई० ६ मास आता है। हसन लिखता है- ६) प्रवरसेन। राजा प्रवरसेन सन् १३५ विक्रमी में मातृगुप्त के रुखसत करने के बाद कश्मीर में आकर हकूमत के जब्त रख्त और फौज और रंय्यत की आसाइश में मशगूल हुआ। अदल व इन्साफ और बख्शिश और मिहरबानी में मसरूफ रहकर अपने हमअस्रों से बढ़ गया। दो तीन साल कमाल आजादी के साथ इस जगह का इन्तजाम दरजा कमाल तक पहुँचाकर कश्मीर फौज के साथ हिन्दुस्तान का इरादा किया। इतराफ हिन्दुस्तान के बहुत से मुल्क दरयाए शोर के किनारे तक अपने .कब्जा में ले आया। विक्रमाजीत का बेटा शीलादित्य जो कि मुखालिफों के हाथ से डरकर परेशानी के जंगल में हैरान था। प्रवरसेन ने उसके सारे मुखा- लिफों को जंग के जरिया मग्लूब और शिकस्त देकर शीलादित्य को अपने बाप के मौरूशी मुल्क पर तस- ल्लत बख्श दिया। और सिंहासन का तख्त जो कि विक्रमाजीत के कब्जा में पड़ा था शीलादित्य से लेकर कश्मीर की तरफ लौटा। कुछ अरसा के बाद शीला- दित ने राजा की पैरवी से सरकशी करके बगावत का झण्डा बुलन्द कर दिया। राजा प्रवरसेन अपने लश्कर के साथ हमलावर हुआ । और उसे कैदी बनाया। बुलन्द हिम्मती से उसको खता अता से बख्श कर अपने मौरूशो मुल्क पर बदस्तूर कायम किया। कुछ अरसा के बाद स्याह बख्ती के बायस उसने फिर सरकशी की। राजा ने उसपर दूसरी दफा कहर करके फिर मुआफ कर दिया। कहते हैं कि शिलादित्य ने छह मर्तबा बगावत अख्तयार की। प्रवरसेन ने हर दफा इसकी सरकोबी करके फिर उन्हे अता की कशरत से बख्श दिया। सातवीं मर्तबा राजा ने कमाल कहर से उसकी हकूमत को जब्त करके उस बागी को महबूस कर दिया। कुछ अरसा के बाद कमाल हिम्मत और दरया दिलो से उसके गुनाहों से दरगुजर कर बदस्तूर अपने मुल्क की हकूमत पर मुख्तार कर दिया। कहते हैं कि अपनी हिम्मत की बिना पर हर शहर बिना जंग व जदल से फतह करता वहाँ की हकूमत पर वारि- सान मुल्क को बदस्तूर रखता था और अपनी मोरूशी मुमलकत से किसी को भी माखिज न करता था। (पृ.२) बिलाद व इमसार के रब्त व जब्त के बाद चाहा कि खित्तः कश्मीर में एक दिल पजीर शहर (पृष्ठ ६६) आबाद करके अपना नाम जमाना की वफा पर यादगार छोड़े। इस बिना पर रूहानियों में से एक की रहनुमाई से श्रीनगर का शहर जो इस वक्त आबाद और मशहूर है कोह मारों के इर्द गिर्द शाफो इमारतों के साथ जिनकी तादाद मुवलों ने छतीस