राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३८ राजतरंगिणी उपकारं स्मरन्तस्तु कृतज्ञत्ववशंवदाः । पदवीमुपकर्तॄणां यान्ति निश्चेतना अपि ॥२९५॥ २९५. 'कृतज्ञता से वशंवद उपकार स्मरण करने वाले निश्चेतन भी उपकारियों का अनुसरण करते हैं। निर्वाणमनु निर्वाति तपनं तपनोपलः । इन्दुमिन्दुमणिः किंच शुष्यन्तमनु शुष्यति ॥२९६॥ २९६. 'सूर्यकान्त मणि सूर्य के निर्वाण (अस्त) के पश्चात् शान्त हो जाता है। और इन्दुमणि इन्दु के क्षीण होने पर शुष्क हो जाता है। पुण्यां वाराणसीं गत्वा तस्माच्छमसुखोन्मुखः । इच्छामि सर्वसंन्यासं कर्तुं द्विजजनोचितम् ॥२९७॥ २९७. 'अतएव शान्ति सुख का इच्छुक मैं पुण्य वाराणसी जाकर द्विज जनोचित सर्व त्याग करना चाहता हूँ। मणिदीपमिवेशं तमन्तरेणान्धकारिताम् । विभेमि द्रष्टुमप्युर्वी भोगयोगे कथैव का ॥२९८॥ २९८. 'मणि दीप' निभ उस स्वामी के बिना, अन्धकार पूर्ण पृथ्वी को देखने में भी भयभीत होता हूँ। भोग योग का कहना ही क्या ? इत्यौचित्यनिधेस्तस्य वाणीमाकर्ण्य विस्मितः । धीरः प्रवरसेनोऽप व्याजहारोचितं वचः ॥२९६॥ २९९. इस प्रकार औचित्य विधान की वाणी सुनकर विस्मित धीर प्रवरसेन भी उचित वचन बोला— दर्शन होता है कि मातृगुप्त को विक्रमादित्य ने जिस (२) सूर्यकान्त मणि : कविपरम्परा के महत्त्वपूर्ण स्थान पर पहुँचा दिया था वह उसके अनुसार चिन्तामणि सूर्य की रश्मियों से ज्योतिर्मय महानता तथा दूरदर्शिता का परिणाम था। होती है। इन्दुमणि शर्वरी में पिघल जाती है। पाठभेद : पाठभेद : श्लोकसंख्या २९५ में 'वशंवदाः' का पाठभेद श्लोक संख्या २९८ में 'कथैव का' का पाठभेद 'वशंवृता' मिलता है। 'तु का कथा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : २९५ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह २९८ (१.) मणिदीप : कल्हण ने पुनः ७१वां श्लोक है। उल्लेख तरंग ४:१५ में 'मणिदीपिकान्' किया है। मणि दीप का यहाँ अर्थ रात्रिकालीन प्रदीप है। २९६ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह २९९. (१) आइने अकबरी में अबुल फजल ७२वां श्लोक है। ने नाम पीथोरसेन दिया है। आइने अकबरी के