भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 708

तृतीय तरंग १३३ अनुसार प्रवरसेन हिन्दुस्तान का एक सामान्य व्यक्ति था । एक क्षत्रिय व्यष्टि के पश्चात् राज्य की थी। वह राजा हुआ। इस पर वह नगरकोट गया । वहाँ का अधिकारी बन गया । मातृगुप्त ने प्रवरसेन के लिये राज्य त्याग दिया। वह बनारस चला गया और साधारण जीवन व्यतीत करने लगा । प्रवरसेन एक श्रेष्ठ राजा था । उसने काश्मीर की नींव पूरी बदलदी थी। कहा जाता है कि उसमें ३० लाख ६० हजार मकान थे। उसने बहुत दान किया था। प्रवरसेन कश्मीर की ग्यारह वर्षों की मालगुजारी बराबर मातृगुप्त के पास काशी भेजता रहा। मातृगुप्त धन गरीबों में बाँटता था। श्री विल्सन ने प्रवरसेन का राज्यारोहण कूक संवत् के अनुसार सन् १२६-२३ ईस्वी देता है । श्री एस. पी. पण्डित ने प्रवरसेन का राज्या- रोहण काल सन् १२३ ई० तथा राज्यकाल ६० वर्ष दिया है। श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३१८४ मास ११ तथा दिन प्रथम तथा राज्य- काल ६० वर्ष दिया है। श्री दायी ने यह समय सप्तर्षि संवत् ४०५४ तथा सन् १८४ ई० दिया है। कनिङ्गहाम ३२७८ वर्ष ३ मास ट्रायर के अनु- सार सन् १२३ वर्ष ८ मास तथा कनिघम के अनुसार सन् ४३२ ई० ६ मास आता है। हसन लिखता है- ६) परवरसेन । राजा परवरसेन सन् १३५ विक्रमी में मातृगुप्त के रुखसत करने के बाद कश्मीर में आकर हुकूमत के रस्म रखो दौर धौउ और रैय्यत की आसाइश में मश्गूल हुआ । अदल व इन्साफ और बख्शिश और मिहरवानी में मसरूफ रहकर अपने हमअस्रों से बढ गया। दो तीन साल कमाल आवादी के साथ इस जगह का इन्तजाम दरजा कमाल तक पहुँचाकर कश्मीर फौज के नाथ हिन्दुस्तान का इरादा किया। इतराफ हिन्दुस्तान के बहुत से मुल्क दरयाए शीर के किनारे तक अपने कब्ज़ा में ले आया। विक्रमाजीत का बेटा शीलादित्य जो कि मुखालिफों के हाथ से हारकर दरबारी के ईरूह में हैरान था। प्रवरसेन ने सहारे सारे मुझा- लिफों को जंग के जरिया महदूद और शिकस्त देकर शीलादित्य को इतने बाप के मौसूशी मुल्क पर इस- नद बख्श दिया। और सिंहासन का तख्त जो कि विक्रमाजीत के क़ब्ज़ा में पड़ा था मिन.दित्य से लेकर कश्मीर की तरफ भेजा । झूठ अरसा के बाद शीला- दित्य ने राजा की पैरवी से सरकशी करके बगावत का झण्डा बुलन्द कर दिया । राजा प्रवरसेन अपने लश्कर के साथ हमलावर हुआ । और उसे कैदी बनाया। बुलन्द हिम्मती ने उसको सुशा अदा से बड़ा कर उसके मौसूशी मुल्क पर बदस्तूर क़ायम किया। कुछ अरसा के बाद स्वार्थ बख्शी के बायस उसने फिर सरकशी की। राजा ने इसवार दूसरी दफ़ा कैद करके फिर मुआफ कर दिया। कहते हैं कि शीलादित्य ने छह मर्तबा बगावत बदस्तूर की । प्रवरसेन ने हर दफ़ा इसकी सरकशी करके फिर उसी वफ़ा की बशारत से बख्श दिया। सातवीं मर्तबा राजा ने कमाल कहर से उसकी हुकूमत को जब्त करके उस दागी को महबूस कर दिया। कुछ अरसा के बाद कमाल हिम्मत और दरया दिली से उसके गुनाहों से दरगुजर कर बदस्तूर अपने मुल्क की हुकूमत पर मुख्तार कर दिया। कहते हैं कि अपनी हिम्मत की बिना पर हर शहर बिना जंग व जदल से फतह करता वहाँ की हुकूमत पर वारि- सान मुल्क को बदस्तूर रखता था और अपनी मौसूशी मुमलकत से किसी को भी मायदिन न करता था। (१.३) बिलाद व इमारत के रख्त व ज़ब्त के बाद चाहा कि खित्तः कश्मीर में एक दिन बजौर शहर (पृष्ठ ६६) आबाद करके अपना नाम ज़माना की क्या पर यादगार छोड़े। इस बिना पर कहानियों मे से एक की रहनुमाई में श्रीनगर का शहर जो इस वक़्त आबाद और मशहूर है कोह मारों के इर्द गिर्द शाही इमारतों के साथ जिसकी तादाद मुवर्रों ने छतील