राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४० राजतरंगिणा सत्यं विश्वम्भरा देवी भूपते रत्नसूरियम् । उत्पत्त्या द्योतते धर्म्यैः कृतज्ञैर्या भवादृशैः ॥३००॥ ३००. हे भूपते ! सत्य ही यह विश्वम्भरा देवी रत्न प्रसूता है, जो कि आपके तुल्य कृतज्ञ एवं धार्मिकों की उत्पत्ति से समुज्ज्वल है । अन्तरङ्गतया श्लाघ्यः कोऽन्यस्तस्मान्महीभ्रुजः । इत्थं जडे जगत्येकस्त्वां यथावद्विचेद यः ॥३०१॥ ३०१. 'उस महीभुज से (अधिक) अन्य कौन अन्तरङ्गत के कारण श्लाघ्य है ? जिसने जड़ संसार में उस प्रकार आपको जाना । चिरं खलु खिलीभूताः कृतज्ञत्वस्य वीथयः । धीर त्वयैव न त्वाशु संचारो यदि दर्शयते ॥३०२॥ ३०२. 'हे धीर ! कृतज्ञता की वीथियां पूर्व में ही निःसार (नष्ट) हो जाती, यदि आप शीघ्र ही संचार न करते । पाकश्चेन्न शुभस्य मेऽद्य तदसौ प्रागेव नादात्किमु स्वार्थश्चेन्न मयाऽस्य किं न भजते दीनान्स्वबन्धून्अयम् । मत्तो रन्ध्रदृशोऽस्य भीर्यदि न तल्लुब्धः किमेष त्यजे- दित्यन्तः पुरुषाधमः कलयति प्रायः कृतोपक्रियः'॥३०३॥ ३०३. (अन्य से) उपकृत अधम पुरुष प्रायः अन्तःकरण में इस प्रकार सोचता है— 'आज मेरे शुभ का परिपाक (भाग्योदय) हुआ है, अन्यथा पूर्व में ही इसने क्यों नहीं प्रदान किया, यदि मुझसे इसका स्वार्थ नहीं है, तो क्यों न यह अपने दीन बन्धुओं को उपकृत करता है। छिद्रद्रष्टा मेरे द्वारा यदि इसे भय न होता, तो क्या यह लोभी त्याग करना, प्रदान करता ? साल लिखी है। आबाद किया । उसकी हकीकत ३०१ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह पहले हिस्सा में गुजर गयी । साठ बरस की मुद्दत ७६वां श्लोक है । हकूमत करके जिन्दगी का बिस्तर लपेट लिया । ३०२ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ७७वां श्लोक है । पाठभेद : पाठभेदः श्लोक संख्या ३०० में 'धर्म्यैः का पाठभेद श्लोक संख्या ३०३ में 'पक्रियः' का पाठभेद 'धम्र्यैः' मिलता है । 'पक्तियः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : ३०० (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ३०३ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ७५वां श्लोक है । ७८वां श्लोक है ।