राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५४१ अत्युदात्तगुणेष्वेषा कृतपुण्यैः प्ररोपिता। शतशाखीभवत्येव यावन्मात्राऽपि सत्क्रिया ॥३०४॥ ३०४. 'पुण्यशालियों द्वारा अत्युदात्त गुणवानों पर (प्ररोपित) की गयी, यावन्मात्र भी सत्क्रिया शत शाखाओं वाली हो ही जाती है। तच्च गुणवतामग्र्यस्तत्त्वज्ञैश्चाभिनन्दितः । परीक्षितो मणिरिव व्यक्तं बहुमतः सताम् ॥३०५॥ ३०५. 'वास्तव में तत्त्वज्ञों द्वारा अभिनन्दित गुणवानों में अग्रणी एवं स्पष्ट ही सज्जनों द्वारा बहु मान्य (बहुमत) (आप) परीक्षित मणि तुल्य हैं। तस्मादनुगृहाणास्मान्मा स्म त्याक्षीर्नरेंद्रताम् । ममापि ख्यातिमायातु गुणवत्पक्षपातिता ॥३०६॥ ३०६. 'अतएव हमें अनुगृहीत करें। नरेन्द्रता का त्याग न करें ताकि मेरी भी गुणवत्पक्षपातिता प्रख्यात हो। पूर्वं तेनाथ चग्मं मयाऽपि प्रतिपादितम् । भवान् पाणिप्रणयिनीं विदधातु पुनर्भूवम् ॥३०७॥ ३०७. 'पूर्व में उनसे एवं अन्त में मेरे द्वारा भी प्रतिपादित भूमि को पुनः आप हस्तगत करें।' अभ्याजौदार्यचर्यस्य श्रुत्वेति नृपतेर्वचः । कृतस्मितो मातृगुप्तः शनैर्वचनमब्रवीत् ॥३०८॥ ३०८. उदारचर्या निष्कारण उदारता पूर्ण आचरण वाले इस नृपति की बात सुनकर मुस्कुराकर मातृगुप्त शनैः शनैः बोला- ३०४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ७९वा श्लोक है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३०५ में 'भिनन्दिता' का पाठभेद 'पि नन्दिताः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३०६ (१) गुणवत्पक्षपातिता : यह शब्द सुन्दर है। भावपूर्ण है। अतएव मूलरूप में यहाँ रखा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि मैं भी गुणवानों के प्रति पक्षपात करता हूं यह ख्याति हो । पाठभेद : श्लोक संख्या ३०७ में 'पाणि' का पाठभेद 'प्रति' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३०७ (१) पुनर्भूवम् : पुनर्भूवम् यहाँ श्लिष्ट है। इसका अर्थ यहाँ दो विभिन्न भुवन अर्थात् लोक अथवा 'पुनर्भू' पुनर्विवाहित विधवा हो सकती है। ३