भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 716

तृतीय तरंग ५४५ राजा प्रवरसेनोऽथ नमयन्नवनीधरान् । अकृच्छ्रलङ्घ्याः ककुभो वृद्धस्य यशसो व्यधात् ॥ ३२४ ॥ राजा प्रवरसेन द्वितीय का अभियान : ३२४. राजा प्रवरसेन ने अवनीधरों ( भूपालों ) को झुकाते हुये, प्रवृद्ध यश द्वारा दिशाओं को बिना कष्ट के लंघनीय बना दिया । पीताब्धिलङ्घितोर्वीभृत्कुम्भयोनिरिवाऽनयत् । तस्य प्रतापः प्रभवन्भुवनानि प्रसन्नताम् ॥ ३२५ ॥ ३२५. जिस प्रकार समुद्र पान एवं पर्वत लंघन कर्ता ( कुम्भयोनि ) अगस्त्य१ जल निर्मल करते हैं उसी प्रकार उद्य होते उसके प्रताप ने भुवनों को प्रसन्न किया । पाठभेद : दिशा गमन कर रहे थे । उस समय विन्ध्य ने श्लोक संख्या ३२४ में 'व्यधात्' का पाठभेद नमस्कार किया । अगस्त्य ने उसे आशीर्वाद दिया 'न्यधात्' मिलता है । कि वह उसी प्रकार विनत उनके लौटने तक पड़ा पादटिप्पणियाँ : रहे । इसी समय से उत्तरापथ एवं दक्षिणापथ का ३२५ (१) अगस्त्य : ऋग्वेद के अनुसार आवागमन प्रारम्भ हुआ । इस आवागमन को प्रारम्भ अगस्त्य मित्रावरुणों के पुत्र हैं । ( ऋ० ७:३३:१३ ) करने के लिये अगस्त्य ने अपना निवास स्थान उर्वशी को देखकर मित्रावरुणों का रेत कमल पर काशी त्याग दिया । दक्षिण रामेश्वर में स्थित स्खलित हो गया । उससे वसिष्ठ एवं अगस्त्य हो गये । काशीपति शंकर स्वयं अपने दिये अभि- उत्पन्न हुए थे । ऋग्वेद में अगस्त्य के प्रचुर संख्या वचन के अनुसार दक्षिण रामेश्वर में निवास करने में सूक्त उपलब्ध हैं । उनका पैतृक नाम मान्य लगे । ( म० व० : १०२ ; दे० भा० २०:३.७ : एवं मान्दार्य भी वेदों में मिलता है । ( ऋ० १:- आ०रा० सार १० ; स्कन्द० ४:१:४ ) । १६५ ; १४—१५ ; १६६ ; १५ ; १८५ ; १० ) अगस्त्य को दक्षिण का स्वामी तथा विजेता कहा अगस्त्य की पत्नी का नाम लोपामुद्रा है । वह गया है । उनका उल्लेख सर्वदा दक्षिण तथा विदर्भराज निमिराज की कन्या थी । अगस्त्य श्रीलंका के सन्दर्भ में आया है । अगस्त्य ने लोपामुद्रा संवाद वैदिक साहित्य में प्रसिद्ध है । (१) वराह पुराण में पशुपालोपाख्यान में 'अगस्त्य ( ऋ० १:१७८:४ ; ) पुराणों के अनुसार मित्रा- गीता', (२) पंचरात्र की 'अगस्त्य संहिता' (३) स्कन्द वरुणों के वीर्य से इन्द्र के शाप के कारण कुंभ से पुराण की 'अगस्त्य संहिता' (४) 'शिव संहिता' तथा उत्पन्न हुए थे । अतएव इन्हें कुम्भयोनि कहा गया (५) भास्कर संहिता के 'द्वैध निर्णयतन्त्र' की रचना ( मत्स्य० ६१ : २०१ ; पद्म० सू० : २२ : २३ की है । ( ब्रह्म० वै० २:१६ ) अगस्त्य विदर्भ म० व० ९६ ; म० यो० १३२, १८४ ; म० निमिराज तथा काशिराज अलर्क के समकालीन भा० ३४४ ) । प्रतीत होते हैं । अग का अर्थ है पर्वत । पर्वत स्तम्भन करने अगस्त्य का उदय वर्षा ऋतु के अंत का प्रतीक के कारण अगस्त्य नाम पड़ा था । यही इस नाम है । इस समय जल निर्मल हो जाता है । भूमि की व्युत्पत्ति है । ( बा० रा० म० ११ ) अगस्त्य जल सोख कर हरीभरी हो जाती है । रा० व० ऋषि विन्ध्य पर्वत के गुरु थे । अगस्त्य दक्षिण २:१४० द्रष्टव्य है । ८०