भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 717

५४४ राजतरंगिणी अथ वाराणसीं गत्वा कृतकाषायसंग्रहः । सर्वं संन्यस्य सुकृती मातृगुप्तोऽभवद्यतिः ॥ ३२० ॥ ३२०. अनन्तर सुकृती मातृगुप्त वाराणसी जाकर, सर्व त्याग पूर्वक, काषा संग्रह कर, यती हो गया । राजा प्रवरसेनोऽपि कश्मीरोत्पत्तिमञ्जसा । निखिलां मातृगुप्ताय प्राहिणोद् दृढनिश्चयः ॥ ३२१ ॥ ३२१. दृढनिश्चयी राजा प्रवरसेन ने भी सम्पूर्ण कश्मीरोत्पत्ति ( राजस्व-ला मातृगुप्त को भेजा। स हठात्पतितां लक्ष्मीं भिक्षाभुक् प्रतिपादयन् । सर्वार्थिभ्यः कृतो वर्षान्दश प्राणानधारयत् ॥ ३२२ ॥ ३२२. कृती व भिक्षुभुकू हठपूर्वक आगत लक्ष्मी का सर्व प्रार्थियों को देते हुये, दश वर्ष प्राण धारण कि अन्योन्यं साभिमानानामन्योन्यौचित्यशालिनाम् । त्रयाणामपि वृत्तान्त एष त्रिपथगापयः १ ॥ ३२३ ॥ परस्पर स्वाभिमानी एवं औचित्यशाली इन तीनों (विक्रमादित्य, मातृगुप्त, यह वृत्तान्त त्रिपथगा२ का जल है । : (१) यती- शाब्दिक अर्थ संन्यासी, त्यागी, है। यम शब्द से यतो बना है। आत्मनि- स्वनियन्त्रण, अपने पर नियन्त्रण रखने ले व्यक्ति को यति किंवा यतो कहते हैं। नियों में जो लोग गृहस्थ जीवन त्याग देते हैं उन्हें ती कहा जाता है। ठभेद : श्लोक संख्या ३२१ में 'काश्मीरो' का पाठभेद द्मीरो' मिलता है। श्लोक संख्या ३२२ में 'हठा' का पाठभेद 'हारा है। पादटिप्पणियाँ : ३२३ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ८१वां श्लोक है : (२) त्रिपथगा : गंगा नदी है । कल्हण ने यहाँ पर अपने कवित्व का परिचय देते हुए सुन्दर उपमा दी है। त्रिपथगा (पवित्र गंगा) की तीन पथ अर्थात् लोक हैं। स्वर्ग, मर्त्य एवं पाताल लोक । स्वर्ग से गंगा चलकर मर्त्य लोक में आयीं। पाताल लोक में पहुँच कर गंगा ने राजा सगर के पुत्रों को तार कर भगीरथ की तपस्या सफल की थी। त्रिपथगा की विमल, धवल धारा तुल्य ही तीनों राजा विक्रमादित्य, मातृगुप्त एवं प्रवरसेन थे। महाभारत एवं भागवत पुराण अध्याय ९ में गंगावतरण की कथा काव्यमय पदो मे दी गयी है ।