राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५५१ ततस्तस्य सरित्पारे मुक्तसंरावमग्रतः । ऊर्ध्वबाहु महद् भूतं प्रादुरासीन्महीजसः ॥ ३४० ॥ ३४०. तदनन्तर उस महौजस के सम्मुख नदी के पार ऊर्ध्व बाहु चीत्कार करता हुआ महान् भूत प्रादुर्भूत हुआ। नृपतिस्तस्य दृक्पातैर्ज्वलद्भिः कपिशीकृतः । उल्काज्योतिःकृताश्लेषः कुलाद्रिरिव दिद्युते ॥ ३४१ ॥ ३४१. उसके प्रज्वलित दृष्टिपातों से कपिशीकृत नृपति उल्का ज्योतियों से अलंकृत कुलाद्रि तुल्य प्रदीप्त हुआ। तमथ प्रतिशब्देन घोरेणापूरयन्दिशः । अत्रासं विहसन्नुच्चैरुवाच क्षणदाचरः ॥ ३४२ ॥ ३४२. भयंकर प्रतिध्वनि से दिशाओं को व्याप्त करते हुए क्षणदाचर १ ने उच्चाहास कर निर्भय नृपति से कहा— संत्यज्य विक्रमादित्यं सत्त्वोद्रिक्तं च शूद्रकम् । स्वां च भूपाल पर्याप्तं धैर्यमन्यत्र दुर्लभम् ॥ ३४३ ॥ ३४३. 'भूपाल ! विक्रमादित्य, सत्त्वशाली शूद्रक' एवं आपके अतिरिक्त अन्यत्र पर्याप्त धैर्य दुर्लभ है। वसुधाधिपते वाञ्छासिद्धिस्तय विधीयते । सेतुमेतं समुत्तीर्य पार्श्वमागम्यतां मम ॥ ३४४ ॥ ३४४. 'वसुधापते ! इस सेतु को पार कर मेरे पास आओ तुम्हारी वाञ्छा सिद्ध करता हूँ। माहुरी एक ही नदी हैं। परन्तु श्रीस्तीन का मत | निशा में चलने वाला होगा। क्षणदाचर का प्रचलित है कि माहुरी नदी मच्छीपुर परगना की मबुर नदी | अर्थ निशाचर है। राक्षस, निशाचर, क्षणदाचरादि है। माहुरी का उल्लेख नीलमत (१३२०) में | तम शक्ति के प्रतीक हैं। किया गया है। ३४३. (१) शूद्रक : विक्रमादित्य के समान ३४२. (१) क्षणदाचर : क्षणदा का अर्थ रात्रि | शूद्रक भी लोक साहित्यिक नायक है। कथा सरित्सा- किंवा निशा होता है। क्षणदाचर का अर्थ रात्रि किंवा | गर (७८:५) द्रष्टव्य है।