राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५० राजतरंगिणी रात्रौ क्षेत्रं च लग्नं च दिव्यं ज्ञातुमथैकदा। स वोरो वीरचर्यायां निर्ययौ पार्थिवार्यमा ॥ ३३७ ॥ ३३७. पार्थिव सूर्य, वह वीर एक बार क्षेत्र एवं दिव्य लग्न ज्ञात करने के लिये रात्रि में वीर चर्या को निकला। गच्छतः क्ष्मापतेस्तस्य मौलिरत्नाग्रबिम्बितः । बभार ताराप्रकरो रक्षासर्षपविभ्रमम् ॥ ३३८ ॥ ३३८. गमन करते उस नृपति के मुकुर रत्नों के अग्र भाग में प्रतिबिम्बित तारा निकर रक्षा सर्षप१ तुल्य शोभित हुआ। अथानन्तचितालोकस्पष्टभीमतटद्रुमाम् । श्मशानप्रान्ततटिनीं पर्यटन्नाससाद सः ॥ ३३६ ॥ ३३९. पर्यटन करते हुए वह ऐसी सरिता तट पर पहुंचा जहाँ प्रान्त भाग में श्मशान१ था और अनन्त चिताओं के प्रकाश से तटवर्ती द्रुम स्पष्ट (भयंकर) वीभत्स लग रहे थे। पादटिप्पणियाँ. ३३९ (१) श्मशान-कल्हण ने इस स्थान ३३६ (१) पितामह-नगर- यहां पितामह का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है कि श्मशान कहाँ के नगर से अर्थ पुराधिष्ठान है। पुराधिष्ठान के पर है। श्मशान का स्थान श्रीनगर में बदलता लिये पादटिप्पणी श्रीनवर पृ० १३९-१४६ तथा रहा था। किन्तु इतना निश्चय प्रकट होता है कि रा० त० १:१०४; १२९, ३०६; ३:९९; वह स्थान सरिता तट पर था। सरिता के उस पार ५:२६७ द्रष्टव्य है। भूत था। जिसे सरिता के इस पार से राजा पाठभेदः श्मशान की चिता-ज्वाला-प्रकाश में देख सकता था। श्लोकसंख्या ३३८ में 'रत्नाग्र' का पाठभेद कल्हण ने तरंग ७ श्लोक ३३९ में राजा 'रत्नाङ्क' मिलता है। उच्चल के दाह स्थान का उल्लेख करता है। यह पादटिप्पणियाँ : स्थान वितस्ता तथा महासरित के संगम पर एक ३३८ (१) सर्षप : पीली सरसो भूत, द्वीप पर था। श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी प्रेतादि बाधा तथा सर्पों को दूर भगाने के लिये मन्त्र तरंग १: सर्ग ५ श्लोक ५४ तथा ५६ में मारी पढ़कर गृह में अथवा मपों के स्थान पर फेंका जाता नदी तथा मारी वितस्ता संगम का उल्लेख किया है। ताकि वाध्य दूर हो जाय। और सर्पादि भाग है। मारी वितस्ता का जहाँ संगम था वही जायें। जहाँ पीली सरसो नहीं मिलती वहाँ यह श्मशान वर्तमान प्रथम पुल के कुछ नीचे था। साधारण सरमों का हो प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन श्मशान के स्थान का निश्चित पता श्रीवर के उल्लेख मे मिल जाता है। महासरित वितस्ता संगम, प्रतीत होता है, कालान्तरमें मारी संगम के रूप में व्यवहृत होने लगा था। कुछ विद्वानों का विचार है कि मारी, मर, महासरित,