भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

तृतीय तरंग ५५१ ततस्तस्य सरित्पारे मुक्तसंरावमग्रतः । ऊर्ध्वबाहु महत् भूतं प्रादुरासीन्महौजसः ॥ ३४० ॥ ३४०. तदनन्तर उस महौजस के सम्मुख नदी के पार ऊर्ध्व बाहु चीत्कार करता हुआ महान् भूत प्रादुर्भूत हुआ । नृपतिस्तस्य दृक्पातैर्ज्वलद्भिः कपिशीकृतः । उल्काज्योतिःकृताश्लेषः कुलाद्रिरिव दिद्युते ॥ ३४१ ॥ ३४१. उसके प्रज्वलित दृष्टिपातों से कपिशीकृत नृपति उल्का ज्योतियों से अलंकृत कुलाद्रि तुल्य प्रदीप्त हुआ । तमथ प्रतिशब्देन घोरेणापूरयन्दिशः । अत्रासं विहसन्नुच्चैरुवाच क्षणदाचरः ॥ ३४२ ॥ ३४२. भयंकर प्रतिध्वनि से दिशाओं को व्याप्त करते हुए क्षणदाचर १ ने उच्चाहास कर निर्भय नृपति से कहा— संत्यज्य विक्रमादित्यं सत्त्वोद्रिक्तं च शूद्रकम् । त्वां च भूपाल पर्याप्तं धैर्येमन्यत्र दुर्लभम् ॥ ३४३ ॥ ३४३. 'भूपाल ! विक्रमादित्य, सत्त्वशाली शूद्रक' एवं आपके अतिरिक्त अन्यत्र पर्याप्त धैर्य दुर्लभ है। वसुधाधिपते वाञ्छासिद्धिस्तद्य विधीयते । सेतुमेतं समुत्तीर्य पार्श्वमागम्यतां मम ॥ ३४४ ॥ ३४४. 'वसुधापते ! इस सेतु को पार कर मेरे पास आओ तुम्हारी वाञ्छा सिद्ध करता हूँ । माहुरी एक ही नदी है। परन्तु श्रीस्टीन का मत निशा में चलने वाला होगा। क्षणदाचर का प्रचलित है कि माहुरी नदी मच्छीपुर परगना की मबुर नदी अर्थ निशाचर है। राक्षस, निशाचर, क्षणदाचरादि है। माहुरी का उल्लेख नीलमत (१३२०) में तम शक्ति के प्रतीक हैं। किया गया है। ३४३. (१) शूद्रक : विक्रमादित्य के समान ३४२. (१) क्षणदाचर : क्षणदा का अर्थ रात्रि शूद्रक भी लोक साहित्यिक नायक है। कथा सरित्सा- किंवा निशा होता है। क्षणदाचर का अर्थ रात्रि किंवा गर (७८:५) द्रष्टव्य है।