भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 729, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 729

५५२ राजतरंगिणी इत्युदीर्य निजं जानुं रक्षः पारात्प्रसारयत् । तन्महासरितो वारि सेतुसीमन्तितं व्यधात् ॥ ३४५ ॥ ३४५. ऐसा कहकर राक्षस ने (उस) पार से जानु प्रसारित कर उस महासरित का जल सेतु-विभक्त कर दिया । अङ्गेन रक्षःकायस्य ज्ञात्वा सेतुं प्रकल्पितम् । वीरः प्रवरसेनोऽथ विकाशां क्षुरिकां दधे ॥ ३४६ ॥ ३४६. सेतु को राक्षस शरीर से निर्मित जानकर, धीर प्रवरसेन ने नग्न क्षुरिका१ धारण कर लिया। स तयोत्कृत्य तन्मांसं कृतसोपानपद्धतिः । अतरद्यत्र तत्स्थानं क्षुरिकाबल उच्यते ॥ ३४७ ॥ ३४७. वह उसका मांस उससे काटकर सोपान माग निर्मित कर, जहाँ पार किया, वह स्थान क्षुरिका१ बल कहा जाता है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४५ में 'यत्' का पाठभेद 'यन्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४६ (१) क्षुरिका : इसका अर्थ छोटी तलवार तथा छुरी भी होता है । कल्हण ने क्षुरिका शब्द का बहुत प्रयोग किया है । भारत के क्षत्रिय गण अन्य मध्य कालीन देशों के सैनिक वर्ग के समान दो कृपाण रखते थे । उनमें एक बड़ी तथा दूसरी छोटी होती थी । जापान के वीरकालीन पुरुष भी भारत के क्षत्रियों के समान ही सैनिक संहिता का अनुसरण करते थे । निस्सन्देह जापान में तेरहवीं शताब्दी तक यह प्रथा प्रचलित थी। बड़ी और छोटी तलवार वीरगण धारण करते थे। मुस्लिम काल में छोटी तलवार ने खंजर का स्थान ले लिया था। बड़ी तलवार कमर से बाईं तरफ लटकाते थे और खंजर नाभि के पास पेटी अथवा कमरबन्द में खोंस लेते थे। यह प्रथा अब और परिवर्तित हो गयी है। उत्सवों तथा भोजन के समय सैनिक अधिकारी केवल एक छोटी तलवार अर्थात् क्षुरिका कमर में अपने वर्दी के ऊपर वामभाग में लटका लेते हैं । मुख्यतः नाविक अधिकारियों में यह प्रथा सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित है । वे अपनी पुरानी परम्परा के अनुसार तलवार साथ रखते हैं । पाठभेद : श्लोक सख्या ३४७ में 'बल' का पाठभेद 'बाल' 'भाल' तथा 'वार' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४७ (१) क्षुरिका बल : वर्तमान खुदबल स्थान है । महासरित के उत्तरी तट पर है । बल स्थान को कहते हैं । कश्मीर के नामों के अन्त में बल स्थान वाचक नामों के अन्त में लगा दिया जाता है जैसे पारबल, मारवल, पोखरवल । मैं समझता हूँ कि हजरत बल का अन्तिम नाम बल स्थानवाचक था परन्तु वहाँ बाल रखा था अतएव कालान्तर में उसका नाम हजरत का बाल रखने के स्थान रूप में हजरत बल एवं बाल रख दिया गया । साधारण लोग कश्मीर में हजरत बल ही कहते हैं न कि हजरत बाल ।