राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 730, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५५३ पार्श्वस्थं तं लग्नमुक्त्वा प्रातर्मेत्सूत्रपातनम् । दृष्ट्वा पुरं विधेहीति वदद् भूतं तिरोदधे ॥ ३४८ ॥ ३४८. पार्श्वस्थ लग्न कहकर—'प्रातः मेरा सूत्रपात¹ देख कर नगर² निर्माण करो।' यह कहते हुए भूत तिरोहित हो गया । देव्या शारिकयाऽङ्केन यक्षेणाधिष्ठिते च सः । ग्रामे शारीटकेऽपश्यत्सूत्रं वेतालपातितम् ॥ ३४९ ॥ ३४९. उस (राजा) ने शारीटक ग्राम में वैताल पातित सूत्र¹ देखा जो देवी शारिका² एवं यक्ष अट्टा³ से अधिष्ठित था ।
पादटिप्पणियाँ : ३४८. (१) सूत्रपातन : इसे सूत लगाना, सूत बाँधना कहते हैं। इसका प्रयोग विश्व में सर्वत्र इमारतों तथा सड़कों की रचना में चिह्न लगाने के लिये होता है। कल्हण ने इसका पुनः उल्लेख तरंग ५:५६ में किया है। (२) नगर : यह नगर प्रवरपुर अथवा प्रवरसेनपुर था। प्राचीन श्रीनगर को पुनः मालूम पड़ता है राजा ने और विस्तृत किया। पुराने श्रीनगर से मिला ही उसने अपने नाम पर नगर बनवाया। प्रायः सभी मुस्लिम इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रवरसेन वर्तमान श्रीनगर का संस्थापक था यद्यपि वे यह भी कहते हैं कि श्रीनगर की रचना में अनेक राजाओ द्वारा अनेक बार परि-वर्त्तन किये गये हैं। मुस्लिम शासन काल में श्रीनगर या प्रवरपुर कश्मीर कहा जाता था। कश्मीर जाने का अर्थ श्रीनगर जाना समझा जाता था। बैरनी के अनुसार नगर चार फर्लांग में विस्तृत था। सन् १८१६ ई० में सिखों ने कश्मीर जीता तो पुराना नाम श्रीनगर रख दिया गया। मूल श्रीनगर की स्थापना अशोक न की थी। वर्तमान श्रीनगर का स्थान राजा प्रवरसेन ने चुना था। नाम प्रवरसेनपुर रखा गया था। कश्मीर उपत्यका के मध्य में स्थित है। वितस्ता नदी का पाट ८० गज है। वितस्ता के दक्षिण तटपर पुराना नगर अधिक आबाद था। समुद्र की सतह से ५२५० फिट ऊँचा है। यहाँ का तापमान जनवरी में ३५ डिग्री तथा जुलाई में ८० डिग्री होता है। वर्षा प्रति वर्ष यहाँ २७ इंच होती है। नगर के बाहर प्रायः कब्रिस्तान है।
पाठभेद : श्लोक संख्या ३४९ में 'शारीटके' का पाठभेद 'हारटठ' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ३४९ (१) सूत्र : जिस स्थान पर सूत्र-लगा था वहीं पर प्रवरपुर की स्थापना राजा प्रवरसेन ने की। वही वर्तमान श्रीनगर है। श्रीनगर टिप्पणी पृष्ठ १३८ पर द्रष्टव्य है। (२) शारिका देवी के कारण हरिपर्वत का नाम शारिका पर्वत पड़ गया है। यह श्रीनगर में ही एक प्रकार से नगर बढ़ने के कारण आ गया है। शारिका पर्वत पर सम्राट् अकबर ने दुर्ग निर्माण कराया था। यह किला भी अच्छी अवस्था में स्थित है। पर्वत की ढाल पर शारिका देवी का तीर्थ स्थान है। मैं जिस समय पहली बार यहाँ पहुंचा उस समय शारिका देवी तक पहुँचने के लिए राज्य सरकार की तरफ से पत्थर की सीढ़ियाँ बनवायी जा रही थीं।
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