भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 732

तृतीय तरंग ५५५ वेतालावेदितं लग्नं जानतो जगतीभुजा । स्थपतेः स जयाख्यस्य नाम्ना प्रख्यापितोऽभवत् ॥ ३५१ ॥ ३५१. नृपति ने वेताल कथित लग्नवेत्ता स्थापिन 'जय' के नाम से उसे प्रख्यात किया । नगराप्रातिलोम्याय भक्त्या तस्य विनायकः । प्रत्यङ्मुखः प्राङ्मुखतां भीमस्वामी स्वयं ययौ ॥ ३५२ ॥ ३५२. उसकी भक्ति के कारण नगराभिमुख हेतु पश्चिमाभिमुख विनायक भीमस्वामी¹ स्वयं पूर्वाभिमुख हो गये । उसकी छत सम्भवतः बहुत दिन पहले गिर चुकी है। ब्राह्मणों के मतानुसार यह फाटक किंवा तोरण द्वार प्रवरसेन मन्दिर का द्वार था। यहीं से प्रवरसेन राजा स्वर्ग गये थे। यह वही द्वार है जिसका उल्लेख त० ३:७८ तथा विल्हण ने विक्रमाङ्क- देवचरित ८:१०९ में किया है। जहाँ कि प्रवरसेन के रग पथ का उल्लेख किया गया है। यह मन्दिर प्रत्यक्ष इसके पूर्व प्रवरसेन निर्मित मन्दिर का त० ३:१९ में उल्लेख किया गया है। (२) जयस्वामी : यहाँ पर प्रतिष्ठा की जो कथा कही गयी है वह तरंग ३ ४५१ श्लोक की कथा से और स्पष्ट हो जाती है। वहाँ रणेश्वर तथा रण स्वामी की प्रतिष्ठा का घटना वर्णन की गयी है। प्रवरसेन प्रारम्भ में शिव का उपासक था। वह शिवलिंग मूर्ति स्थापित करना चाहता था। उसने प्रथम शिव प्रवरेश्वर की प्रतिष्ठा की थी। (त० ३: ३६४,३७०) अलौकिक घटना के कारण जहाँ शिव स्थापना की बात थी वहीं पर विष्णु भगवान् जयस्वामी की मूर्ति अवतरित हो गयी। प्रतिष्ठा स्थापना के नियमों के अनुसार प्रत्येक देवता की स्थापना पर यन्त्र भी भिन्न होता है। यह यन्त्र भूमिपर बनाया जाता है। इस प्रकार विष्णु की प्रतिष्ठा शिवपीठ पर नही हो सकती जबतक कि वह यन्त्र न हटा दिया जाय। (विष्णु धर्मोत्तरपुराण : ३) जयस्वामी नाम प्रवरसेन के शिल्पी जय के नामपर रखा गया था। वह लग्न- वेत्ता थे जिसे वेताल ने बताया था। जयस्वामी देवस्थान का उल्लेख केवल एक बार और त० ५:४४८ में जयस्वामी विरोचन रूप से किया गया है। देवस्थान कहाँ था पता नहीं चलता। कल्हण ने इसके सम्भाव्य स्थान के विषय में भी कोई संकेत नही किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३५१ में 'वेताला' का 'वेताल' तथा 'जयाख्यस्य' का पाठभेद 'जयास्थ्यस्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५२ (१) भीमस्वामी : विनायक की पूजा अभी तक हर पर्वत अर्थात् शारिका पर्वत के दक्षिण मूल के सीमावर्ती नट्टान पर भीमस्वामी गणेश नाम से होती है। यह सम्राट् अकबर के हरिपर्वत पर निर्मित किला के बच्छ दरवाजा के समीप है। कश्मीर के तीर्थों में गणेश स्वामी का उल्लेख मिलता है। बडशाह जैनुल आवदीन ने भीमस्वामी गणेश का नवीन देवस्थान श्रोवर के अनुसार निर्माण कराया था। यह जियारत मकदूम शाह के समीप है। (श्रोवर : ३:३००) पण्डित साहिबराम ने अपने तीर्थों में बड़शाह के गणेश स्थान को मकदूम शाह के जियारत के समीप बताया है।