राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 733, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें५५२ राजतरंगिणी भक्त्या प्रतिष्ठां प्राक्तस्मिन्बिभ्रीषोः प्रवरेश्वरम् । जयस्वामी स्वयं पीठे भित्त्वा यन्त्रमुपाविशत् ॥ ३५० ॥ ३५०. उसके भक्ति पूर्वक प्रवरेश्वर¹ की प्रतिष्ठा करने के पूर्व जयस्वामी² स्वयं यन्त्र भेदन कर पीठ पर आसीन हो गये । सन् १९६२ में जब में दूसरी बार आया त सीढ़ियाँ बन चुकी थी । शिखर पर स्थित शारिका देवी के समीप पहुँचने के लिये जहाँ से सीढ़ियाँ प्रारम्भ होती है वहाँ एक आधुनिक मन्दिर बना है। मन्दिर के बाहर शिवलिंग है । भीतर देवी की मूर्ति है। मन्दिर के नीचे सड़क के समीप पाँच या सात ब्राह्मणो के मकान है । यहाँ एक ढका हुआ होज बना है। यहीं से जनता पीने का जल प्राप्त करती है। शारिका मन्दिर बाहर से देखने पर हरिपर्वत दुर्ग के अन्दर एक दुर्ग अथवा किला मालूम पड़ता है। राजा गुलाब सिंह ने कश्मीर विजय के पश्चात् इसका निर्माण कराया था । शारिका देवी की यहाँ कोई मूर्ति नहीं है। एक शिला खण्ड खड़ा है। उस पर श्रीचक्र अंकित है । यह सिन्दूर लेपन से इतना ढक गया है कि रेखायें स्पष्ट प्रकट नहीं होतीं। पुजारियों का कथन है कि श्रीचक्र की रेखायें कभी-कभी स्वतः उमड़ आती है । दिखायी पड़ने लगती है। मैंने चक्र के कोणों को गिनना चाहा। परन्तु कुछ को छोड़कर अन्य सिन्दूर के मोटे स्तर से ढक गये हैं। दूर से देखने में शिलापट्ट का रूप शारिका पक्षी के आकार तुल्य लगता है। उस पर श्रीचक्र अङ्कित कर देव स्थान तथा मूर्ति का नाम शारिका रख दिया है। शारिका माहात्म्य में एक कथा कही गयी है। देवी दुर्गा ने मैना का रूप धारण कर लिया था । सुमेरु पर्वत से पर्वत खण्ड देवी अपने चंचु मे उठाकर लायी । वह दैत्यों के द्वार को बन्द करना चाहती थी । दैत्य लोग नरक में निवास करते थे । परन्तु इस स्थान पर नरक जाने का द्वार अर्थात् मार्ग था । उसी द्वार पर पर्वत खण्ड रख दिया। दैत्यों का इस द्वार से निकलना बन्द हो गया । द्वार का मुख भी बन्द हो गया । देवी स्वयं इस पर्वत पर निवास करने लगी । पर्वत का नाम हर पर्वत हो गया । कथासरित्सागर ७३ : १०९ में इसका उल्लेख है। (३) अट्टा : इस शब्द का उल्लेख राज- तरंगिणी में पुनः नहीं मिलता। नीलमत पुराण में भी में इस शब्द को नहीं पा सका । अट्टा का डिम्बो अर्थ मचान होता है। स्तीन ने एक सुझाव दिया है कि अट्टा कवि भाषा में ऊंचे किंवा शृंग, शिखर के लिये यहाँ प्रयोग किया गया है। अट्टालिका ऊंचे कई मञ्जिले मकान को कहते है । अट्टमेलक एक मन्त्री का उल्लेख रा० ८:४७७ में कल्हण ने किया है। ३५० (१) प्रवरेश्वर : हरिपर्वत के मूल तथा जामा मसजिद, जो अब ज़ियारत बहाउद्दीन साहब के नाम से सुप्रसिद्ध, के मध्य होना चाहिये । यह स्थान सम्भवतः श्रीनगर के मध्य में होगा। ज़ियारत बहाउद्दीन साहब के समीप की घेरा जो पुराना कब्रिस्तान है उस में मन्दिरों तथा देवस्थानों के अनेक अलंकृत शिलाखण्ड आज भी लगे दिखायी देते हैं । उस के दीवाल तथा कब्रों में वे लगे हैं। कब्रिस्तान के नैर्ऋत्य कोण में एक पुराना फाटक खड़ा है। वह बहुत ऊँचा है। थोड़ा भी बाकी है। वह बड़े शिलाखण्ड से बनाया गया है।