राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 735, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें५५६ राजतरंगिणी भीमस्वामी का दर्शन मैंने किया है। यह फाटक के ठीक वाम पार्श्व में है। यहाँ तक सड़क पक्की वानी है। मन्दिर के अन्दर एक भीमकाय चट्टान सिन्दूर से लिप्त मिलेगी। उसे देखकर मालूम होता है जैसे बड़ा सा सिन्दूर का ढोका रखा है। गर्मी में यह पिघलता सा लगता है। गणेश के आकार की मूर्ति नहीं दिखायी पड़ती। सिन्दूर के अन्दर छि गयी है। वह इतनो अधिक सिन्दूर मण्डित है कि यह कहना कठिन है कि मूर्ति का मुख दक्षिण है अथवा पश्चिम । मुझे प्रतीत होता है कि यहाँ मूर्ति नहीं रही होगी। मुसलमान किसी गढ़ी या बनी मूर्ति को बुत कहते हैं। पुरातन बाइबिल में भी पत्थर, लकड़ी आदि में किसी आकृति को बनाने का नाम ही मूर्ति है। मुस्लिम काल में निश्चय ही प्राचीन मूर्ति खण्डित कर दी गयी होगी। उसके स्थान पर पर्वतीय शिलाखण्ड को गणेश नाम से सिन्दूर पोतकर पूजा होने लगी। राजस्थान में मैंने अनेक अनगढ़ पत्थरों तथा बड़े टुकड़ो पर सिन्दूर लगा देखा है। भैरव आदि की मूर्ति न रखकर एक शिलाखण्ड रखकर उसपर सिन्दूर लगा देते हैं। राजस्थान भी मुस्लिम आक्रमणों का निरन्तर स्थान रहा है अतएव वहीं भी यह प्रथा अपना ली गयी होगी। मखदूम शाह की जियारत हरिपर्वत पर सबसे भव्य इमारत है। राज्य सरकार की तरफ से आजादी मिलने के पश्चात् ऊपर तक जाने के लिये पत्थर की पक्की सीढ़ियाँ बना दी गयीं है। मैंने इस स्थान को ध्यानपूर्वक देखा। आस्तीन के समय में बहुत परिवर्तन हो गया है। मन्दिरों के ध्वंसावशेष या तो हटा दिये गये हैं अथवा तोड़कर उनका गिट्टी अथवा ढोका बनाकर इमारत या फर्श में लगा दिये गये हैं। इस जियारत के साथ गनगाह है। मैं जब पहुँचा था तो इमारत की बायीं तरफ निर्माण कार्य हो रहा था। कोई इमारत या धार्मिक स्थान बनाया जा रहा था। यह जियारत निस्सन्देह हिन्दू मन्दिर के स्थानपर बनायी गयी है। रानगाह के पास मुझे वही गोमुखीय प्रणाळी मिली जिससे मन्दिर के अभिषेक का जल बाहर निकलता था और दर्शक उसमें गिरता चरणामृत लेते थे। मखदूम शाह के जियारत के दो तरफ एक मंजिला बरामदा बना है। यहाँ से श्रीनगर का दृश्य अच्छा दिखायी देता है। बरामदा के ऊपर मन्दिर कलश का विशाल आमलक पड़ा दिखाया दिया। यही कलश का महापद्म देखा। दोनों के मध्य में आरपार छेद था। कलश ऊँचा मूल में मोटा तथा ऊर्ध्व में पतला होता चला जाता है। इसलिये ऊपर से नीचे तक पत्थरों के क्रमों को संघटित रखने के लिये मध्य में लोटा अथवा ताम्बा का मोटा छड़ डाला जाता है और यही क्रम पहले भी था। सप्तर्षि : गणेश के उक्त स्थान के वाम भाग से एक मार्ग हरपर्वत पर जाता है। यह सड़क इस समय (शक १९६८) में कच्ची है। उसे कश्मीर राज्य की ओर से पक्की किया जा रहा है। शारिका देवी के मार्ग में सप्तर्षि का स्थान पड़ता है। यहाँ भी चट्टान पर सिन्दूर लगा है। कथा है। इस स्थानपर सप्तर्षि का आगमन तथा निवास हुआ था। नीलमत पुराणमें सप्तर्षि का स्थान सुमुख के समीप कहा गया है। वराहं च नृसिंहं च बहुरूपं वरप्रदम् । सप्तर्षीणां तथैवार्चा सुमुखस्य समीपगा ॥ 1159 = १३७० १२०१ चित्रकूटमथारुह्य स्वर्गलोके महीयते । तीर्थं सप्तर्षिरूपं नाम सर्वकामफलप्रदम् ॥ 1263 = १४०६