राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 736, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५५१ सद्भावश्रियादिका देव्यस्तेन श्रीशब्दलाञ्छिताः । पञ्च पञ्चजनेन्द्रेण पुरे तस्मिन्निवेशिताः ॥ ३५३ ॥ ३५३. उस पंचजनेन्द्र १ ने श्री शब्द लाञ्छित सद्भावश्री आदि पंच २ देवियों को उस नगर में स्थापित किया । अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयशतस्य च । गवां शतसहस्रस्य धेयानू ससपेयः कुरुः । 1264 = १४७७ ⁂ ⁂ ⁂ श्राद्धं दानं तथा जप्यं स्नानं होमस्तथार्चनम् । सर्वमक्षयतां याति यत्कृतं तत्र पार्थिव ॥ 1265 = १४७७ १४७८
विगाह्य पुष्करं तीर्थमतिरात्रफलं लभेत् । तीर्थ' मश्वऋषीणां च वह्निष्टोमफलं लभेत् ॥ 1543 = १५५८ पादटिप्पणियाँ : ३५३ ( १ ) पञ्चजन : कल्हण ने राजा को यहाँ पञ्चजनो का इन्द्र कहा है । पंचजन शब्द जातियो का भी वाचक है । ( क ) ब्रह्मसूत्र शारीरक भाष्य के अनुसार । चार वर्ण तथा पाँचवां बर्बर जाति को मिलाकर पञ्चजन की संज्ञा दी गयी है। ( ख ) पांच वर्ग, यथा, - देव, मनुष्य, गन्धर्व, नाग एवं पितृ को मिलाकर पंचजन कहा जाता है। ( ग ) एक मत है कि पंचजन शब्द पंचायत के लिये प्रयुक्त किया गया है। पंचायत के सभासदों को पंच कहा जाता है। उनके सामूहिक वर्ग को सूचित करने के लिये पञ्चजन को संज्ञा दी गयी है । (२) श्रीपंचदेवी मन्दिर : श्री स्टोन ने इन मन्दिरो का पता लगाया था परन्तु उन्हें प्रामाणिक ढंग पर कुछ मिल नहीं सका। श्री पण्डित आनन्द कौल ने अपने 'आर्कियोलोजी रिमेन्स इन कश्मीर' के पृष्ठ ३२ पर इस विषयपर प्रकाश डाला है । १ महाश्री : यह मन्दिर वितस्ता के चौथे पुल के अधोभागमे दक्षिण तटपर ईंटो की पाँच गुम्बदों की बनी एक इमारत है। बादशाह जैनुल आबदीन की माता की इसमें कब्र है। वह पूर्व कालीन महाश्री का मन्दिर प्रवरसेन द्वितीय का बनवाया है। मै अपने एक कश्मीरी ब्राह्मण मित्र के साथ इस स्थान पर आया। प्रवेश करते ही अहाता के द्वार को दोनो ओर ऊँचाई पर दीवाल में बनी मूर्तियाँ खण्डित लगी थी । द्वार प्राचीन मन्दिर का बिरदावली कह रहा था। भीतर कब्रिस्तान है। जैनुलआबदीन की कब्र एक चोकोर प्राकार के अन्दर है। इसी प्रकार के बाहर उक्त मन्दिर है। पुरातत्त्व विभाग की तरफ से इसकी मरम्मत की गयी है। मन्दिर में एक सिकड़ी अभी तक लटक रही है। मेरे मित्र ने कहा कि पूर्व मन्दिर का घण्टा इसमें लटकता था। जहाँ जैनुल आबदीन की मा की कब्र है वहीपर देवी का पीठस्थान रहा होगा। अथवा शिवलिंग रहा होगा। लटकती सिकड़ा से घण्टा या जलधारा का पात्र लगाया गया रहा होगा। उक्त अहाता किंवा मैदान का घेरा तीन ओर से मन्दिरों के भग्नावशेष पत्थरों से निर्माण किया गया है। इस समय वह बृहद् कब्रिस्तान का रूप ले लिया है। उक्त मन्दिर के गर्भ गृह में केवल एक ही कब्र सिकन्दर बुत शिकन की स्त्री अथवा बादशाह जैनुल आबदीन की मां की है। इस मन्दिर की प्रणाली आजतक यथायत् कायम है। उससे गर्भ गृह का जल चरणामृतस्वरूप बाहर निकलता था आज सात शताब्दियाँ बीत गयीं इस प्रणाली ने जल- बिन्दुओं का स्पर्श न किया होगा ।