राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग १५९ वितस्तायां स भूपालो बृहत्सेतुमकारयत् । ख्याता ततः प्रभृत्येष तादृङ्नौसेतुकल्पना ॥ ३५४ ॥ ३५४. उस भूपाल ने वितस्ता (नदी) पर बृहत् सेतु' का निर्माण कराया उस समय से उस प्रकार का नौका द्वारा सेतु निर्माण ख्यात (प्रचलित) हुआ । श्रीजयेन्द्रविहारस्य बृहद्बुद्धस्य च व्यधात् । मातुलः स नरेन्द्रस्य जयेन्द्रो विनिवेशनम् ॥ ३५५ ॥ ३५५. नरेन्द्र के मातुल जयेन्द्र ने जयेन्द्र विहार' का निर्माण कराया, और बृहद्^२ बुद्ध की स्थापना की ।
पाठभेद : श्लोक संख्या ३५४ में 'ततः' का पाठभेद 'तदा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५४ ( १ ) बृहत् सेतु—शाब्दिक अर्थ बड़ा पुल होता है । कल्हण ने इस का पुनः उल्लेख त. ८ : ३१७१ में किया है। इस सेतु के स्थान का निश्चयात्मक पता कल्हण नहीं देता । किन्तु पढ़ने से प्रतीत होता है कि मक्षिका स्वामी ( मायसुम ) के पास इसे होना चाहिये था । कल्हण राजा हर्ष के समय ( रा० त० ७ : १५४८ ) तथा श्रीवर ( १ : ३ : ९६ ) में एक नाव के पुल का वितस्ता पर उल्लेख करता है । वितस्ता पर आजादी ( सन् १९४७ ई० ) के पूर्व केवल लकड़ो के पुल विभिन्न शैलो के, बने थे । कश्मीर का पर्यटक उनमे अत्यन्त प्रभावित होता था । जैन कदल वितस्ता पर बने श्रीनगर पुल का जैनुल आवदीन बादशाह के समय में होना मिलता है । श्रीवर ने इसका उल्लेख तृतीय रा० त० १:३:१८, १९) में किया है। यह पुल पन्द्रहवी शताब्दी में वर्तमान था । प्रतीत होता है कि इसके पूर्व श्रीनगर में नौका पाट कर पुल नही बनाया गया था । इसके निर्माण के पश्चात् नाव पाटकर स्थाय पुल बनाने की परम्परा प्रचलित हो गयी । अतएव ऐतिहासिक दृष्टि से इस पद का महत्त्व है ।
३५५ ( १ ) जयेन्द्र विहार : ह्वेनसांग चनी पर्यटक ने इस बिहार में दो वर्षो तक (सन् ६३१- ६३३ ई० ) निवास किया था । उसे 'चे मे इन तो लो' के नाम से लिखा है । यह जयेन्द्र बिहार ही है । यहाँ उसने अनेक शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त की थी । यह बिहार श्रीनगर की जामा मसजिद के समीप था । सर वालर लारेन्स का कहना है कि उसके समय में भी श्रीनगर में लद्दाख से आने वाले बौद्ध लद्दाखी इस मसजिद के स्थान का पुराना नाम 'स्ते-रमु स्वक-कंग' कहते थे । वे यहाँ की यात्रा प्राचीन बिहार होने के कारण करते थे। यहाँ पूजा करते थे । ( २ ) बृहद् बुद्ध—सम्भवत' बृहद् बुद्ध का विशाल प्रतिमा ठोस थी, जैसा कि ललितादित्य ने कांस्य ताम्र अथवा अष्ट धातु की परिहासपुर में निर्माण कराकर प्रतिष्ठित किया था। (त.४:२०३) तरंग ४ : २०१ से प्रकट होता है कि जयेन्द्र बिहार भस्म हो गया था । बुद्ध की प्रतिमा राजा क्षेमगुप्त ने गलाकर सिक्का ढलवाया था । उसने पीतल की प्रतिमा से ढले सिक्को का आमदनी से क्षेम गौरीश्वर का मन्दिर निर्माण कराया था । श्रीनगर की अन्य बुद्ध प्रतिमाओ का उल्लेख राजा हर्ष ( त. ७ : १०९७ ) तथा राजा सुस्सल के काल में मिलता है। बृहद बुद्ध का उल्लेख चौदहवी