भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 739

५६० राजतरंगिणी बुभोज सिंहलादीन्यो द्वीपान्स रुचियाऽकरात् । मोराकनामा मोराकभवनं भुवनाद्भुतम् ॥ ३५६ ॥ ३५६. मोराक नामक वह सचिव भुवन में अद्भुत 'मोराक भवन'१ बनवाया जिसने सिंहलादि द्वीपों का भोग किया था। षट्त्रिंशद्गृहलक्षाणि पुरं तत्प्रथथे परा । यस्यास्तां वर्धनस्वामी विश्वकर्मा च सीमयोः ॥ ३५७ ॥ ३५७. पूर्व काल में यह ख्याति थी—'इस नगर में छत्तीस लाख गृह हैं।' जिसकी सीमा पर वर्धन स्वामी१ और विश्वकर्मा२ हैं। दक्षिणस्मिन्नेव पारे वितस्तायाः पुरा किल । निर्मितं तेन नगरं विभक्तैर्युक्तमापणैः ॥ ३५८ ॥ ३५८. वितस्ता के दक्षिण तटपर उसने सुविख्यात बाजारों से युक्त नगर निर्मित कराया । ते तत्राभ्रंलिहाः सौधा यानध्यारुह्य दृश्यते । वृष्टिस्निग्धं निदाघान्ते चैत्रे चोत्कुसुमं जगत् ॥ ३५६ ॥ ३५९. वहाँ वे गगनचुम्बी राजप्रासाद थे जिनपर आरूढ़ होकर निदाघ (ग्रीष्म) के अन्त में वृष्टि स्निग्ध एवं चैत्र१ मास में विकसित कुसुम पूर्ण जगत् देखा जाता था ।


शताब्दा तक मिलता है। जोनराज के वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है। (जोन राज० ४३०) ३५६. (१) मोराक भवन : इस स्थान का पता नहीं चलता। इस पर भी कहीं से प्रकाश नहीं पड़ता कि मन्त्री मोराक का आधिपत्य सिंहल में किस प्रकार हुआ था । पाठभेद : श्लोक संख्या ३५७ में 'षट्त्रिंशद्गृह' का 'षट्त्रिंशगृह' तथा 'सीमयोः' का पाठभेद 'सोमयोः' तथा 'स मयः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५७ (१) वर्धन स्वामी : वर्धन स्वामी तथा विश्वकर्मा के मन्दिरों का पता नहीं चलता। वर्धन स्वामी का पुनः उल्लेख कल्हण ने त० ६ : १९१ में किया है। (२) विश्वकर्मा : यह मन्दिर भी सूत्रपात की सीमा पर वर्धन स्वामी के समान होना चाहिये । इस मन्दिर का पुनः उल्लेख नहीं मिलता । श्रीस्टेन का मत है कि त० ८ : २४३८ श्लोक से इस मन्दिर की ध्वनि निकलती है । कश्मीर में विश्वकर्मा को सर्व शिल्प प्रवर्तक माना गया है। उनकी पूजा का विधान भी किया गया है । विश्वकर्मा तथा पूज्यः सर्वशिल्पप्रवर्तकः । नील० 623 ॥ पाठभेद : श्लोक संख्या ३५८ में 'दक्षिण' का पाठभेद 'दक्षिणे' मिलता है। श्लोक संख्या ३५९ में 'चोत्कु' का पाठभेद 'वोत्कु' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५९. (१) चैत्र : यह चान्द्रमास का एक महीना किंवा मास है। इस मास में चित्रा नक्षत्र पर पूर्णचन्द्र स्थित होता है। यह मास मार्च एवं अप्रैल