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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

५६० राजतरंगिणी बुभोज सिंहलादीन्यो द्वीपान्स रुचियाऽकरात् । मोराकनामा मोराकभवनं भुवनाद्भुतम् ॥ ३५६ ॥ ३५६. मोराक नामक वह सचिव भुवन में अद्भुत 'मोराक भवन'१ बनवाया जिसने सिंहलादि द्वीपों का भोग किया था। षट्त्रिंशद्गृहलक्षाणि पुरं तत्प्रथथे परा । यस्यास्तां वर्धनस्वामी विश्वकर्मा च सीमयोः ॥ ३५७ ॥ ३५७. पूर्व काल में यह ख्याति थी—'इस नगर में छत्तीस लाख गृह हैं।' जिसकी सीमा पर वर्धन स्वामी१ और विश्वकर्मा२ हैं। दक्षिणस्मिन्नेव पारे वितस्तायाः पुरा किल । निर्मितं तेन नगरं विभक्तैर्युक्तमापणैः ॥ ३५८ ॥ ३५८. वितस्ता के दक्षिण तटपर उसने सुविख्यात बाजारों से युक्त नगर निर्मित कराया । ते तत्राभ्रंलिहाः सौधा यानध्यारुह्य दृश्यते । वृष्टिस्निग्धं निदाघान्ते चैत्रे चोत्कुसुमं जगत् ॥ ३५६ ॥ ३५९. वहाँ वे गगनचुम्बी राजप्रासाद थे जिनपर आरूढ़ होकर निदाघ (ग्रीष्म) के अन्त में वृष्टि स्निग्ध एवं चैत्र१ मास में विकसित कुसुम पूर्ण जगत् देखा जाता था ।


शताब्दा तक मिलता है। जोनराज के वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है। (जोन राज० ४३०) ३५६. (१) मोराक भवन : इस स्थान का पता नहीं चलता। इस पर भी कहीं से प्रकाश नहीं पड़ता कि मन्त्री मोराक का आधिपत्य सिंहल में किस प्रकार हुआ था । पाठभेद : श्लोक संख्या ३५७ में 'षट्त्रिंशद्गृह' का 'षट्त्रिंशगृह' तथा 'सीमयोः' का पाठभेद 'सोमयोः' तथा 'स मयः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५७ (१) वर्धन स्वामी : वर्धन स्वामी तथा विश्वकर्मा के मन्दिरों का पता नहीं चलता। वर्धन स्वामी का पुनः उल्लेख कल्हण ने त० ६ : १९१ में किया है। (२) विश्वकर्मा : यह मन्दिर भी सूत्रपात की सीमा पर वर्धन स्वामी के समान होना चाहिये । इस मन्दिर का पुनः उल्लेख नहीं मिलता । श्रीस्टेन का मत है कि त० ८ : २४३८ श्लोक से इस मन्दिर की ध्वनि निकलती है । कश्मीर में विश्वकर्मा को सर्व शिल्प प्रवर्तक माना गया है। उनकी पूजा का विधान भी किया गया है । विश्वकर्मा तथा पूज्यः सर्वशिल्पप्रवर्तकः । नील० 623 ॥ पाठभेद : श्लोक संख्या ३५८ में 'दक्षिण' का पाठभेद 'दक्षिणे' मिलता है। श्लोक संख्या ३५९ में 'चोत्कु' का पाठभेद 'वोत्कु' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५९. (१) चैत्र : यह चान्द्रमास का एक महीना किंवा मास है। इस मास में चित्रा नक्षत्र पर पूर्णचन्द्र स्थित होता है। यह मास मार्च एवं अप्रैल

तृतीय तरंग ५६१ तद्विना नगरं कुत्र पवित्राः सुलभा भुवि । सुभगाः सिन्धुमंमेदाः क्रीडावसथवीथिषु ॥ ३६० ॥ ३६०. पृथ्वी पर उस नगर के अतिरिक्त और कहाँ क्रीड़ागृह¹, पथों के तट तथा पवित्र एवं सुन्दर नहरें सुलभ हो सकती हैं ?

मास में पड़ता है। क्योंकि चान्द्रवर्ष गणना के अनु- सार प्रति तीसरे वर्ष मल मास अर्थात् एक मास और वर्ष में जुट जाता है अतएव सौर वर्ष के अनुसार इसका समय अस्थिर रहता है। चैत्रमास का कश्मीर में बड़ा महत्त्व है। प्रथम दिन चैत्र से संवत् का आरम्भ होता है। प्रथम दिन चैत्र शुक्लपक्ष को ब्राह्मणों को वस्त्र, अलंकार, मुद्रा, तथा रत्न दान करने का पर्व माना जाता है। चैत्र में श्रीपञ्चमी के दिन लक्ष्मी पूजन का माहात्म्य है। (नी० ६४१-६४६) कश्मीर मण्डल की देवी कश्मीरा का प्रतिमा को स्नान पूजा आदि करने का विधान किया गया है। चैत्र शुक्ल षष्ठी को चैत्र षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन स्कन्द की पूजा होती है। यह दिन बालकों के स्वास्थ्य के साथ सम्बन्धित किया गया है। चैत्र नवमी को भद्रकाली की पूजा पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य से की जाती है। चैत्र शुक्ल एकादशी को वास्तु देव की पूजा की जाती है। चैत्र द्वादशी को वासुदेव की पूजा का दिन है। चैत्र त्रयोदशी को मदनयात्रा उत्सव मनाया जाता है। कामदेव का छवि वस्त्र बनाया जाता है। इस दिन पति अपना पत्नी को स्नान कराता है। चैत्र सुदी पन्द्रह को पिशाच प्रयाण का उत्सव मनाया जाता है। निकुम्भ ने इस दिन बालुकार्णव में अभियान करता पिशाचों के निवास स्थान पर आक्रमण किया था। पिशाच की मृत्तिका प्रतिमा बनायी जाती थी। उसकी पूजा प्रत्येक गृह में मध्याह्न तथा चन्द्रोदय काल में की जाती थी। नीलमत पुराण ने इस प्रकार सम्पूर्ण चैत्र मास में प्रायः प्रत्येक दिन को पूजा तथा उत्सव का दिन निश्चित कर दिया है। (नी० ६४४-६६७) ७१

पाठभेद - श्लोक संख्या ३६० में 'सुभगा' का पाठभेद 'सुलभाः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३६० । १) क्रीड़ा गृह एवं नहरें : कल्हण का यहाँ तात्पर्य डल लेक अर्थात् शुवेश्वरो सर तथा अंचर लेक से निकलने वाली अनेक नहरों से है जो श्रीनगर में फैली हैं। वे श्रीनगर के केन्द्र तक चली गयी हैं। इन नहरों पर बाजार तथा मकान आदि अब भी बने हैं। हाउस बोट नहरों में लगी रहती हैं। जहाँ बिजली का प्लग तटवर्ती बिजली के खम्भों से लगाकर पूरा हाउस बोट विद्युन्मय कर दिया जाता है। यह नहरें वेनिस की नहरों के समान यातायात तथा परिवहन का काम करती हैं। शाक- सब्जी तथा अन्य सामान बेचने वाले नावों पर सामान बेचते हैं। थाईलैण्ड के बैंकाक नगर में भी नहरों में घूमती नावों पर बाजार लगा दिखायी देता है। मुझे दोनों स्थानों की साम्यता देखकर आश्चर्य हुआ। कल्हण ने यहाँ 'पवित्र' शब्द का प्रयोग किया है। ये नहरें अब पवित्र नहीं कही जा सकतीं। आबादी बढ़ जाने के कारण, तथा हाउस वोटों की संख्या अत्यधिक होने और पर्यटकों की संख्या लाखों से ऊपर प्रति वर्ष पहुँचने के कारण नहरें गन्दी रहती हैं। मल मूत्र तथा गन्दगी सब नावों हाउस बोटों तथा तटवर्ती मकानों से निकलकर नहरों में जाती हैं। अतएव उन्हें आज पवित्र कहना पवित्रता का उपहास करना होगा। कल्हण के समय नहरें साफ रहीं होंगी। पवित्र शब्द श्लीस्टीन के मतानुसार वाङ्मय पद बनाने के लिये कल्हण ने प्रयोग किया है। परन्तु मैं समझता

५६० राजतरंगिणी बुभोज सिंहलादीन्यो द्वीपान्स सचिवाऽकरात् । मोराकनामा मोराकभवनं भुवनाद्भुतम् ॥ ३५६ ॥ ३५६. मोराक नामक वह सचिव भुवन में अद्भुत 'मोराक भवन' बनवाया जिसने सिंहलादि द्वीपों का भोग किया था। षट्त्रिंशद्गृहलक्षाणि पुरं तत्प्रथथे परा । यस्यास्तां वर्धनस्वामी विश्वकर्मा च सीमयोः ॥ ३५७ ॥ ३५७. पूर्व काल में यह ख्याति थी—'इस नगर में छत्तीस लाख गृह हैं।' जिसकी सीमा पर वर्धन स्वामी' और विश्वकर्मा² हैं। दक्षिणस्मिन्नेव पारे वितस्तायाः पुरा किल । निर्मितं तेन नगरं विभक्तैर्युक्तमापणैः ॥ ३५८ ॥ ३५८. वितस्ता के दक्षिण तटपर उसने सुविख्यात बाजारों से युक्त नगर निर्मित कराया। ते तत्राभ्रंलिहाः सौधा यानध्यारुह्य दृश्यते । वृष्टिस्रिग्धं निदाघान्ते चैत्रे चोत्कुसुमं जगत् ॥ ३५६ ॥ ३५९. वहाँ वे गगनचुम्बी राजप्रासाद थे जिनपर आरूढ़ होकर निदाघ (ग्रीष्म) के अन्त में वृष्टि स्निग्ध एवं चैत्र' मास में विकसित कुसुम पूर्ण जगत् देखा जाता था। शताब्दा तक मिलता है। जोनराज के वर्णन से की सीमा पर वर्धन स्वामी के समान होना चाहिये । यह स्पष्ट हो जाता है। (जोन राज० ४३० । इस मन्दिर का पुनः उल्लेख नहीं मिलता । श्रोस्टोन का मत है कि त० ८ : २४१८ श्लोक से इस ३५५० (१) मोराक भवन : इस स्थान मन्दिर की ध्वनि निकलती है । का पता नहीं चलता । इस पर भी वहो से प्रकाश कश्मीर मे विश्वकर्मा को सर्व शिल्प प्रवर्त्तक माना नहीं पड़ता कि मन्त्री मोराक का आधिपत्य सिंहल गया है। उनको पूजा का विधान भा किया गया है। में किस प्रकार हुआ था । विश्वकर्मा तथा पूज्यः सर्वशिल्पप्रवर्त्तकः । पाठभेद : नी० ० 623 ॥ श्लोक सख्या ३५७ में 'षट्त्रिंशद्गृह' का पाठभेद : 'षट्त्रिशगृह' तथा 'सीमयोः' का पाठभेद 'सीमयो.' श्लोक संख्या ३५८ में 'दक्षिण' का पाठभेद तथा 'स मयः' मिलता है। 'दक्षिणे' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : श्लोक सख्या ३५९ में 'वोत्कु' का पाठभेद ३५७ (१) वर्धन स्वामी : वर्धन स्वामी 'वोत्कु' मिलता है। तथा विश्वकर्मा के मन्दिरों का पता नहीं चलता । पादटिप्पणियाँ : वर्धन स्वामी का पुनः उल्लेख कल्हण ने त० ६ : ३५९० (१) चैत्र : यह चान्द्रमास का एक १६३ में किया है। महीना किंवा भाग है। इस मास में चित्रा नक्षत्र पर (२) विश्वकर्मा : यह मन्दिर भी सूत्ररात पूर्णचन्द्र स्थित होता है। यह मास मार्च एवं अप्रैल

तृतीय तरंग ५६१ तांदूना नगरं कुत्र पवित्राः सुलभा भुवि । सुभगाः सिन्धुसंभेदाः क्रीडावसथवीथिषु ॥ ३६० ॥ ३६० पृथ्वी पर उस नगर के अतिरिक्त और कहाँ क्रीड़ागृह¹, पथों के तट तथा पवित्र एवं सुन्दर नहरें सुलभ हो सकती हैं ?


[बायाँ स्तम्भ / Left Column] मास में पड़ता है । क्योंकि चान्द्रवर्ष गणना के अनु- सार प्रति तीसरे वर्ष मल मास अर्थात् एक मास और वर्ष में जुट जाता है अतएव सौर वर्ष के अनुसार इसका समय अस्थिर रहता है । चैत्रमास का कश्मीर में बड़ा महत्व है । प्रथम दिन चैत्र से संवत् का आरम्भ होता है । प्रथम दिन चैत्र शुक्लपक्ष को ब्राह्मणों को वस्त्र, अलंकार, मुद्रा, तथा रत्न दान करने का पर्व माना जाता है । चैत्र में श्रीपंचमी के दिन लक्ष्मी पूजन का माहात्म्य है । ( नी० ६४४—६४६ ) कश्मीर मण्डल की देवी कश्मीरा की प्रतिमा को स्नान पूजा आदि करने का विधान किया गया है । चैत्र शुक्ल षष्ठी को चैत्र षष्ठी का पर्व मनाया जाता है । इस दिन स्कन्द की पूजा होती है । यह दिन बालकों के स्वास्थ्य के साथ सम्बन्धित किया गया है । चैत्र नवमी को भद्रकाली की पूजा पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य से की जाती है । चैत्र शुक्ल एकादशी को वास्तु देव की पूजा की जाती है । चैत्र द्वादशी को बासुदेव की पूजा का दिन है । चैत्र त्रयोदशी को मदन यात्रा उत्सव मनाया जाता है । कामदेव का छवि वस्त्र बनाया जाता है । इस दिन पति अपनी पत्नी को स्नान कराता है । चैत्र सुदी पन्द्रह को पिशाच प्रयाण का उत्सव मनाया जाता है । निकुम्भ ने इस दिन बालुकार्णव में अभियान करता पिशाचों के निवास स्थान पर आक्रमण किया था । पिशाच की मृत्तिका प्रतिमा बनायी जाती थी। उसकी पूजा प्रत्येक गृह में मध्याह्न तथा चन्द्रोदय काल में की जाती थी । नीलमत पुराण ने इस प्रकार सम्पूर्ण चैत्र मास में प्रायः प्रत्येक दिन को पूजा तथा उत्सव का दिन निश्चित कर दिया है । ( नी० ६४४-६६७ ) ७१


[दायाँ स्तम्भ / Right Column] पाठभेद : श्लोक संख्या ३६० में 'सुभगाः' का पाठभेद 'सुलभाः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३६० (१) क्रीड़ा गृह एवं नहरें : कल्हण का यहाँ तात्पर्य डल लेक अर्थात् श्रुवेश्वरी सर तथा अंचर लेक में निकलने वाली अनेक नहरों से है जो श्रीनगर में फैली हैं। वे श्रीनगर के केन्द्र तक चली गयी हैं । इन नहरों पर बाजार तथा मकान आदि अब भी बने हैं। हाउस वोट नहरों में लगी रहती हैं। जहाँ बिजली का प्लग तटवर्ती बिजली के खम्भो से लगाकर पूरा हाउस वोट विद्युन्मय कर दिया जाता है। यह नहरें वेनिस की नहरों के समान यातायात तथा परिवहन का काम करती हैं। शाक- सब्जी तथा अन्य सामान बेचने वाले नावों पर सामान बेचते हैं। थाईलैण्ड के बैंकॉक नगर में भी नहरों में घूमती नावों पर बाजार लगा दिखायी देता है। मुझे दोनो स्थानो की साम्यता देखकर आश्चर्य हुआ । कल्हण ने यहाँ 'पवित्र' शब्द का प्रयोग किया है। ये नहरें अब पवित्र नहीं कही जा सकतीं । आबादी बढ़ जाने के कारण, तथा हाउस वोटों की संख्या अत्यधिक होने और पर्यटकों की संख्या लाखों से ऊपर प्रति वर्ष पहुँचने के कारण नहरें गन्दी रहती हैं। मल मूत्र तथा गन्दगी सब नावों हाउस वोटों तथा तटवर्ती मकानों से निकलकर नहरों में जाती हैं। अतएव उन्हें आज पवित्र कहना पवित्रता का उपहास करना होगा । कल्हण के समय नहरें साफ़ रहीं होंगी। पवित्र शब्द श्रीकण्ठिन के मतानुसार काव्यमय पद बनाने के लिये कल्हण ने प्रयोग किया है। परन्तु मैं समझता

५६२ राजतरंगिणी दृष्टः क्रीडानगादन्यत्र न मध्येनगरं क्वचित् । यतः सर्वौकसां लक्ष्मोः संलक्ष्या द्युपथादिः ॥ ३६१ ॥ ३६१. कहीं नगर मध्य क्रीड़ा पर्वत' नहीं देखा गया, जहां से आकाश तुल्य सब गृहों की शोभा लक्ष्य हो ।

है कि कुछ नहरें अपने तटों पर स्थित देव मन्दिर विहारों, मत्रों, मठों, एवं शालाओं, घाटों तथा साधु सन्तों के शिविरों के कारण अवश्य पवित्र मानी जाती रही होंगी। पवित्र स्थानों के सामीप्य के कारण उनके साथ पवित्र विशेषण जोड देना अस्वा- भाविक नहीं मालूम होता।

३६१ (१) पर्वत : यहां पर्वत का अर्थ हरि पर्वत किंवा शारिका पर्वत लगाना चाहिये । इस के शिखर से श्रीनगर तथा काश्मीर उपत्यका का विहंगम दृश्य दिखता है। कल्हण निश्चय ही यह दृश्य अनेक बार देखकर, मुग्ध हो गया होगा । उनका कवि हृदय रह-रह कर इस दृश्य का मनोहर वर्णन करना चाहता है।

शारिका पर्वत एक प्रकार से कश्मीर उपत्यका के मध्य में त्रिशूलिय स्वरूप स्थित है। कश्मीर उपत्यका को यदि अर्घा मान लें तो यह पर्वत शिवलिंग तुल्य लगेगा। अर्घा के चंचल जल ही डल, अंचर उसर सेल तथा अनेक सरोवर हैं। अर्घा से बहता अत्र वितस्ता, सिन्धु तथा अनेक स्रोतस्विनियों की धाराएँ है । हरपर्वत के ऐतिहासिक महत्व के स्थान से मुझे यह दृश्य अच्छा लगा ।

इस तरंग के ३३९-३४९ श्लोक इस सम्बन्ध में दृष्टव्य हैं। जहाँगीर हरि पर्वत के सन्दर्भ में लिखता है।

'इस्लाम धर्म के प्रकट होने के पूर्व काल के ऐसे मन्दिर तथा दृढ वर्त्तमान है जो सब पत्थर के हैं। और तल से छत तक चालीस चालीस गज के पत्थर काट कर एक दूसरे पर रखकर बनाये गये हैं।

नगर के पास एक पर्वत है। जिसे कोई मारान और कोई हरि पर्वत कहते हैं। पर्वत के पूरब तरफ झील है जिसका घेरा दस कोश है।

हमारे पिता (अकबर) ने आज्ञा दी थी कि एक दृढ़ दुर्ग पत्थर चूने का बनाया जाय। वह इस प्रार्थी के राजकाल में प्रायः पूरा हो गया। जिससे छोटा पर्वत दुर्ग के अन्दर आगया है। और इसके चारों ओर नजार दीवारी खींची गयी है। भीत दुर्ग के पास है। महल व एक छोटा उद्यान है। जिसमें एक छोटी इमारत है। जहाँ हमारे श्रद्धेय पिता बैठा करते थे। इस समय वह स्थान बहुत बुरी हालत में है गिरता दिखायी पड़ा। वह हमारे क़िबला तथा दृश्य देवता का स्थान है। जहाँ वह बैठा करते थे। और इस प्राणी के लिये वास्तव में सिजदा करने का स्थान है। इसलिये इस प्रकार इसको छोड़ना हमें अनुचित ज्ञात हुई। इस लिये मैने मोतमिव खां को जो हमारी प्रकृति को समझने वाला है आज्ञा दी कि इस छोटे बाग को ठीक करने का तथा इमारतों की मरम्मत कराने का पूरा प्रयत्न करे । थोड़े ही समय में उसके विशेष प्रयत्नों से इन सब में नई सुन्दरता आ गयी। उद्यान में ३२ गज चौकोर चबूतरे पर तीन खण्ड का एक ऊँचा गृह बनवाया गया। और इमारत की मरम्मत कराकर उसमें उस्तादों के बनाये चित्र लगाये, जिससे वह चीन की चित्रशाला की ईर्ष्या वस्तु होगयी। हमने इस उद्यान का नाम नूरे अफजा रखा।

तृतीय तरंग ५६३ चैतस्तं वारि वास्तव्यैर्वृहत्तुहिनशर्करम् । ग्रीष्मोग्रेश्न्हि स्ववेश्माप्रारक ततोऽन्यत्र लभ्यते ॥ ३६२ ॥ ३६२. वहाँ के निवासी ग्रीष्म के उग्र दिन में अपने गृह के सामने से प्रवाहित तुहिन खण्ड मय वितस्ता वारि प्राप्त करते थे । वहाँ के अतिरिक्त और कहाँ प्राप्त हो सकता है ? प्रतिदेवगृहं कोशास्ते तस्मिन्नर्पिता नृपैः । सदस्रशः शक्यते यैः क्रेतुं भूः सागराम्बरा ॥ ३६३ ॥ ३६३. उस नगर में राजाओं ने प्रति मन्दिर उतना कोश प्रदान किया, जिनसे सहस्र बार सागराम्बरा धरा खरीदी जा सकती थी । पुरे निवसत्तस्तस्मिंस्तस्य राजप्रजासृजः । शनैः साम्राज्यलाभस्य षष्टिः संवत्सरा ययुः ॥ ३६४ ॥ ३६४. उस नगर में निवास करते प्रजासृज राजा के साम्राज्य लाभ के साठ वर्ष व्यतीत हो गये । ललाटे शूलमुद्राङ्के जराशुक्लाः शिरोरुहाः । तस्य शम्भुभ्रमासङ्गिङ्गाम्भोविभ्रमं दधुः ॥ ३६५ ॥ ३६५. उसके शूल मुद्रांकित ललाट पर जरा के कारण श्वेत केश शिव के भ्रम से आलिंगित गंगा जल की शोभा धारण कर रहे थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ३६२ में 'वैतस्तं' का 'वृहतु' 'ग्रीष्मोग्रे' का 'ग्रोष्मोग्णो' 'ग्रीष्मोग्ने' तथा 'स्वत्र ततो' का पाठभेद 'ह्वतो' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३६२ (१) वारि : कल्हण यहाँ पर ग्रीष्म ऋतु में कश्मीरियों के शीतल वारि अर्थात् जल ग्रहण- प्रियता का उल्लेख करता है । प्र.८म का पुनः उल्लेख त० ८:१८६३ में किया है । पादटिप्पणियाँ : ३६५ (१) शूल मुद्राङ्किः शिव उपासक ललाट पर त्रिपुण्ड लगाते हैं । दोनों भ्रू के मध्य ललाट पर तिलक के स्थान पर शैव लोग त्रिशूलाकार तिलक चन्दन अथवा भस्म का लगाते हैं । यही यहाँ पर अभीष्ट है । (२) गंगाजल : इस पद में निदर्शन अलंकार है । गंगा जल की पवित्र धारा उज्ज्वल होती है । श्वेत केश उज्ज्वल होते हैं । गंगा हर के मूर्द्धा से ललाट पर गिरती हैं। यहाँ राजा का उज्ज्वल केश भी उसका मूर्धा से ललाट पर गिरता है । दोनो की तुलना कल्हण ने देकर अपनी काव्य व्यंजना का उत्तम उदाहरण उपस्थित किया है । गंगा का जल उज्ज्वल एवं यमुना का नीला होता है । गंगा जल का सर्वत्र वर्णन उज्ज्वल, धवल आदि विशेषणों से किया गया है। गंगा की उज्ज्वलता एवं यमुना की नीला नलिमा का भव्य दर्शन प्रयाग पर होता है। वहाँ स्पष्ट दिखायी देता हैं। दोनों जलों के रंगों में कितना अन्तर है। इन दोनों धाराओं के मध्य एक मलिन उज्ज्वल जल पंक्ति उज्ज्वल तथा नील जल मिल जाने के कारण बनती है । यही त्रिवेणी है ।

५६२ राजतरंगिणी दृष्टः क्रीडानगोऽन्यत्र न मध्येनगरं क्वचित् । यतः सर्वौकसां लक्ष्मोः संलक्ष्या नृपसद्मवत् ॥ ३६१ ॥ ३६१. कहीं नगर मध्य क्रीड़ा पर्वत नहीं देखा गया, जहाँ से आकाश तुल्य सब गृहों की शोभा लक्ष्य हो ।

हैं कि कुछ नहरें अपने तटों पर स्थित देव मन्दिर विहारों, मठों, मठों, एवं शालाओं, घाटों तथा साधु सन्तों के शिविरों के कारण अवश्य पवित्र मानी जाती रही होंगी । पवित्र स्थाना के सामीप्य के कारण उनके साथ पवित्र विशेषण जोड़ देना अस्वा- भाविक नही मालूम होता ।

हैं । और सब से तल तक चालीस चालीस गज के पत्थर काट कर एक दूसरे पर रखकर बनाये गये हैं । नगर के पास एक पर्वत है। जिसे कोई मारान और कोई हरि पर्वत कहते हैं । पर्वत के चारों तरफ झील है जिसका घेरा १।। कोश है।

३६१ ( १ ) पर्वतः यहाँ पर्वत का अर्थ हरि पर्वत किंवा शारिका पर्वत लगाना चाहिये । इस के शिखर से श्रीनगर तथा काश्मीर उपत्यका का विहंगम दृश्य दिखता है। कल्हण निश्चय ही यह दृश्य अनेक बार देखकर, मुग्ध हो गया होगा । उसका कवि हृदय रह-रह कर इस दृश्य का मनोहर वर्णन करना चाहता है ।

शारिका पर्वत एक प्रकार से कश्मीर उपत्यका के मध्य में शिवलिंग स्वरूप स्थित है। कश्मीर उपत्यका को यदि अर्घा मान लें तो यह पर्वत शिवलिंग तुल्य लगेगा । अर्घा के चंचल जल ही डल, अंचर वूलर लेक तथा अनेक सरोवर हैं। अर्घा से बहता जल वितस्ता, सिन्धु तथा अनेक स्रोतस्विनियों की धाराएँ है । हरपर्वत के ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान से मुझे यह दृश्य अच्छा लगा ।

इस तरंग के ३३९-३४९ श्लोक इस सम्बन्ध में द्रष्टव्य हैं। जहाँगीर हरि पर्वत के सन्दर्भ में लिखता है ।

'इस्लाम धर्म के प्रकट होने के पूर्व काल के ऊँचे मन्दिर अभी तक वर्तमान है जो सब पत्थर के

हमारे पिता (अकबर) ने आज्ञा दी थी कि एक दृढ़ दुर्ग पत्थरों चूने का बनाया जाय । यह इस प्रार्थी के राज्यकाल में प्रायः पूरा हो गया । जिससे लोग पर्वत दुर्ग के अन्दर आबया हैं। और इसके चारों ओर सत्तर तोपें भी सौंपी गयी हैं। भीतर दुर्ग के पास है। महल व एक छोटा उद्यान है। जिसमें एक छोटी इमारत है, जहाँ हमारे श्रद्धेय पिता बैठा करते थे। इस समय वह स्थान बहुत बुरे हालत में है गिरता दिखायी पड़ा। वह हमारे क़िबला तथा दृश्य देखना का स्थान है। जहाँ वह बैठा करते थे। और इस प्रार्थी के लिये वास्तव में सिजदा करने का स्थान है। इसलिये इस प्रकार इसकी जीर्णता हमें अनुचित ज्ञात हुई । इस लिये मैने मोतमित खाँ को जो हमारी प्रकृति को समझने वाला है आज्ञा दी कि इस छोटे बाग को ठीक करने का तथा इमारतों को मरम्मत कराने का पूरा प्रयत्न करे । थोड़े ही समय में उसके विशेष प्रयत्नों से इन सब में नई सुन्दरता आ गयी । उद्यान में ३२ गज चौकोर चबूतरे पर तीन खण्ड का एक ऊँचा सुफा बनवाया गया। और इमारत की मरम्मत कराकर उसमें उस्तादों के बनाये चित्र लगाये, जिससे वह चीन की चित्रशाला की ईर्ष्या वस्तु हो गयी । हमने इस उद्यान का नाम नूरे अफज़ा रखा।

तृतीय तरंग ५६३ धैतस्तं वारि वास्तवैर्यैर्वहत्तुहिनशर्करम् । ग्रीष्मोग्रेऽह्नि स्ववेश्माप्रात्क ततोऽन्यत्र लभ्यते ॥ ३६२ ॥ ३६२. वहाँ के निवासी ग्रीष्म के उग्र दिन में अपने गृह के सामने से प्रवाहित तुहिन खण्ड मय वितस्ता वारि प्राप्त करते थे । यहाँ के अतिरिक्त और कहाँ प्राप्त हो सकता है ? प्रतिदेवगृहं कोशास्ते तस्मिन्नर्पिता नृपैः । सहस्रशः शक्यते यैः क्रेतुं भूः सागराम्बरा ॥ ३६३ ॥ ३६३. उस नगर में राजाओं ने प्रति मन्दिर उतना कोश प्रदान किया, जिनसे सहस्र वार सागराम्बरा धरा खरीदी जा सकती थी । पुरे निवसतस्तस्मिंस्तस्य राजप्रजासृजः । शनैः साम्राज्यलाभस्य षष्टिः संवत्सरा ययुः ॥ ३६४ ॥ ३६४. उस नगर में निवास करते प्रजासृज राजा के साम्राज्य लाभ के साठ वर्ष व्यतीत हो गये । ललाटे शूलमुद्राङ्के जराशुक्लाः शिरोरुहाः । तस्य शुश्रूषमासङ्गिगङ्गाम्भोविभ्रमं दधुः ॥ ३६५ ॥ ३६५. उसके शूल मुद्रांकित ललाट पर जरा के कारण श्वेत केश शिव के श्रम से आलिंगित गंगा जल की शोभा धारण कर रहे थे ।

पाठभेद : अलंकार है । गंगा जल की पवित्र धारा उज्ज्वल श्लोक संख्या ३६२ में 'र्वहत्' का 'वृंहत्' होती है । श्वेत केश उज्ज्वल होते हैं । गंगा हर 'ग्रीष्मोग्रे' का 'ग्रीष्मोग्रो' 'ग्रीष्मोग्ने' तथा 'स्त्व के मूर्धा से ललाट पर गिरती है । यहाँ राजा का ततो' का पाठभेद 'त्कृतो' मिलता है । उज्ज्वल केश भी उसका मूर्धा से ललाट पर गिरता पादटिप्पणियाँ : है । दोनों की तुलना कल्हण ने देकर अपनी ३६२ (१) वारि : कल्हण यहाँ पर ग्रीष्म काव्य व्यंजना का उत्तम उदाहरण उपस्थित ऋतु में कश्मीरियों के शीतल वारि अर्थात् जल ग्रहण- किया है । प्रियता का उल्लेख करता है । ग्रीष्म का पुनः उल्लेख गंगा का जल उज्ज्वल एवं यमुना का नीला होता त० ८:१८६३ में किया है । है । गंगा जल का सर्वत्र वर्णन उज्ज्वल, धवल आदि पादटिप्पणियाँ : विशेषणों से किया गया है। गंगा की उज्ज्वलता ३६५ (१) शूल मुद्रांकित : शिव उपासक एवं यमुना की नीला नदिमा का भव्य दर्शन प्रयाग ललाट पर त्रिपुण्ड लगाते हैं । दोनों भ्रू के मध्य पर होता है। वहाँ स्पष्ट दिखायी देता है । दोनों ललाट पर तिलक के स्थान पर शैव लोग त्रिशूलाकार जलों के रंगों में कितना अन्तर है। इन दोनों तिलक चन्दन अथवा भस्म का लगाते हैं। यही धाराओं के मध्य एक मलिन उज्ज्वल जल पंक्ति यहाँ पर अभीष्ट है । उज्ज्वल तथा नील जल मिल जाने के कारण बनती (२) गंगाजल : इस पद में निदर्शन है। यही त्रिवेणी है ।

५६२ राजतरंगिणी दृष्टः क्रीडानगाऽन्यत्र न मध्येनगरं क्वचित् । यतः सर्वौकसां लक्ष्मीः संलक्ष्या द्युपदादिव ॥ ३६१ ॥ ३६१. कहीं नगर मध्य क्रीड़ा पर्वत १ नहीं देखा गया, जहाँ से आकाश तुल्य सब गृहों की शोभा लक्ष्य हो । हैं कि कुछ नहरें अपने तटों पर स्थित देव मन्दिर विहारो, मठों, घटों, एवं शालाओं, घाटों तथा साधु सन्तों के शिविरों के कारण अवश्य पवित्र मानी जाती रही होंगी। पवित्र स्थानों के सामीप्य के कारण उनके साथ पवित्र विशेषण जोड़ देना अस्वा- भाविक नहीं मालूम होता । ३६१ (१) पर्वतः : यहां पर्वत का अर्थ हरि पर्वत किंवा शारिका पर्वत लगाना चाहिये । इस के शिखर से श्रीनगर तथा काश्मीर उपत्यका का विहङ्गम दृश्य मिलता है। कल्हण निश्चय ही यह दृश्य अनेक बार देखकर, मुग्ध हो गया होगा । उसका कवि हृदय रह-रह कर इस दृश्य का मनोहर वर्णन करना चाहता है। शारिका पर्वत एक प्रकार से कश्मीर उपत्यका के मध्य में शिवलिंग स्वरूप स्थित है। कश्मीर उपत्यका को यदि अर्घा मान लें तो यह पर्वत शिवलिंग सदृश लगेगा । अर्घा के चंचल जल ही डल, अंचर वुलर लेक तथा अनेक सरोवर हैं। अर्घा से बहता जल वितस्ता, सिन्धु तथा अनेक स्रोतस्विनियों की धाराएँ है। हरपर्वत के ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान से मुझे यह दृश्य अच्छा लगा । इस तरंग के ३३९-३४९ श्लोक इस सम्बन्ध में द्रष्टव्य हैं। जहाँगीर हरि पर्वत के संदर्भ में लिखता है। 'इस्लाम धर्म के प्रकट होने के पूर्व काल के ऊँचे मन्दिर अभी तक वर्तमान है जो सब पत्थर के हैं। और सब में छत तक चालीस चालीस गज के पत्थर काट कर एक दूसरे पर रखकर बनाये गये हैं। नगर के पास एक पर्वत है। जिसे कोई मागान और कोई हरि पर्वत कहते हैं । पर्वत के चारों तरफ झील है जिसका घेरा १४ बांस है। हमारे पिता (अकबर) ने आज्ञा दी थी कि एक दृढ़ दुर्ग गहरा चूने का बनाया जाय। वह इस प्रार्थी के राज्यकाल में प्रायः पूरा हो गया । जिससे छोटा पर्वत दुर्ग के अन्दर आ गया है। और इसके चारों ओर चहार दीवारी बांधी गयी है। भीख दुर्ग के पास है । महल व एक छोटा उद्यान है। जिसमें एक छोटी इमारत है, जहाँ हमारे श्रद्धेय पिता बैठा करते थे। इस समय यह स्थान बहुत बुरी हालत में है गिरता दिखायी पड़ा। वह हमारे किबला तथा दृश्य देखने का स्थान है। जहा यह बैठा करते थे । और इस प्रार्थी के लिये वास्तव में सिजदा करने का स्थान है। इसलिये इस प्रकार इसकी जीर्णता मुझे अनुचित ज्ञात हुई। इस लिये मैने मोतमिन खां का जो हमारी प्रकृति को समझने वाला है आज्ञा दी कि इस छोटे बाग को ठीक करने का तथा इमारतों की मरम्मत कराने का पूरा प्रयत्न करे। थोड़े ही समय में उसके विशेष प्रयत्नों से इन सब में नई सुन्दरता आ गयी। उद्यान में ३२ गज चौकोर चबूतरे पर तीन खण्ड का एक ऊँचा सफा बनवाया गया। और इमारत की मरम्मत कराकर उसमे उस्तादों के बनाये चित्र लगाये, जिससे वह चीन की चित्रशाला की ईर्ष्या वस्तु हो गयी। हमने इस उद्यान का नाम नूरे अफज़ा रखा।

तृतीय तरंग ५६३ चैतस्तं वारि वास्तव्याैर्वहत्तुहिनशर्करम् । ग्रीष्मोग्रेऽह्नि स्ववेश्माग्रात्क्व ततोऽन्यत्र लभ्यते ॥ ३६२ ॥ ३६२. वहाँ के निवासी ग्रीष्म के उग्र दिन में अपने गृह के सामने से प्रवाहित तुहिन खण्ड मय वितस्ता वारि प्राप्त करते थे । वहाँ के अतिरिक्त और कहाँ प्राप्त हो सकता है ? प्रतिदेवगृहं कोषास्ते तस्मिन्नर्पिता नृपैः । सहस्रशः शक्यते यैः क्रेतुं भूः सागराम्बरा ॥ ३६३ ॥ ३६३. उस नगर में राजाओं ने प्रति मन्दिर उतना कोष प्रदान किया, जिससे सहस्र बार सागराम्बरा धरा खरीदी जा सकती थी । पुरे निवसतस्तस्मिंस्तस्य राजप्रजासृजः । शनैः साम्राज्यलाभस्य षष्टिः संवत्सरा ययुः ॥ ३६४ ॥ ३६४. उस नगर में निवास करते प्रजासृज राजा के साम्राज्य लाभ के साठ वर्ष व्यतीत हो गये । ललाटे शूलमुद्राङ्के जराशुक्लाः शिरोरुहाः । तस्य शम्भुभ्रमासङ्गिगङ्गाम्भोविभ्रमं दधुः ॥ ३६५ ॥ ३६५. उसके शूल मुद्रांकित ललाट पर जरा के कारण श्वेत केश शिव के भ्रम से आलिङ्गित गंगा जल की शोभा धारण कर रहे थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ३६२ में 'र्वहत्तु' का 'बृहत्तु' 'ग्रीष्मोग्रे' का 'ग्रीष्मोष्णो' 'ग्रीष्मोग्रे' तथा 'स्वत्र ततो' का पाठभेद 'त्कृतो' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३६२ ( १ ) वारि : कल्हण यहाँ पर ग्रीष्म ऋतु में कश्मीरियों के शीतल वारि अर्थात् जल ग्रहण- प्रियता का उल्लेख करता है । ग्रीष्म का पुनः उल्लेख त० ८:१८४३ में किया है। पादटिप्पणियाँ : ३६५ ( १ ) शूल मुद्रांकित : शिव उपासक ललाट पर त्रिपुण्ड लगाते हैं । दोनों भ्रू के मध्य ललाट पर तिलक के स्थान पर शैव लोग त्रिशूलाकार तिलक चन्दन अथवा भस्म का लगाते हैं । यही यहाँ पर अभीष्ट है । . ( २ ) गंगाजल : इस पद में निदर्शन अलंकार है । गंगा जल की पवित्र धारा उज्ज्वल होती है । श्वेत केश उज्ज्वल होते हैं । गंगा हर के मूर्धा से ललाट पर गिरती है । यहाँ राजा का उज्ज्वल केश भी उसका मूर्धा से ललाट पर गिरता है । दोनों की तुलना कल्हण ने देकर अपनी काव्य व्यंजना का उत्तम उदाहरण उपस्थित किया है । गंगा का जल उज्ज्वल एवं यमुना का नीला होता है । गंगा जल का सर्वत्र वर्णन उज्ज्वल, धवल आदि विशेषणों से किया गया है। गंगा की उज्ज्वलता एवं यमुना की नीला नलिका का भव्य दर्शन प्रयाग पर होता है । वहाँ स्पष्ट दिखायी देता है । दोनों जलों के रंगों में कितना अन्तर है। इन दोनों धाराओं के मध्य एक मलिन उज्ज्वल जल पंक्ति उज्ज्वल तथा नील जल मिल जाने के कारण बनती है । यही त्रिवेणी है ।

५६४ राजतरंगिणी अथाश्वपादेनेशाननिर्देशात्तत्क्षणागतः । काश्मीरिको जयन्ताख्या द्विजन्माऽयोजि पार्श्वगः ॥ ३६६ ॥ ३६६. अश्वपाद ने ईशान निर्देश पर तत्क्षण आये काश्मीरी जयन्त नामक विप्र को जो कि समीप में था नियुक्त किया। श्रान्तोऽस्यध्वन्य नान्यस्माद्देशात्तेऽभिमतं भवेत् । राज्ञे प्रवरसेनाय लेख एष प्रदर्श्यताम् ॥ ३६७ ॥ ३६७. 'पथिक' तुम श्रान्त हो। अन्य देश (स्थान) से तुम्हारा अभिमत (वाञ्छित) होना सम्भव नहीं है अतएव यह लेख राजा प्रवरसेन को दिखाओ। इत्युक्त्वार्पितलेखोऽसावसमर्थः पथः पृथून् । गन्तु प्रस्थानखिन्नोऽस्मि सद्यस्तेनेत्यगद्यत ॥ ३६८ ॥ ३६८. यह कहकर उसे लेख अर्पित करने पर उस (जयन्त) ने इस प्रकार कहा— "यात्रा से श्रान्त मैं सद्यः अधिक मार्ग चलने में असमर्थ हूँ।" स्नाह्यद्य तावत्त्वं स्पृष्टो द्विजः कापालिना मया । उक्तेति तेन क्षिप्तोऽसावासन्ने दीर्घिकाजले ॥ ३६९ ॥ ३६९. 'तुम द्विज, मुझ कापाली द्वारा स्पृष्ट हो, अतएव 'आज अद्य स्नान करो'— यह कहकर अश्वपाद ने समीपवर्ती दीर्घिका में इसे फेंक दिया। उन्मीलितेक्षणोऽद्राक्षीत्स्वं स्वदेशादथोत्थितम् । तस्थुषश्चार्चने राज्ञा भृत्यान्यग्राञ्जलाहृतौ ॥ ३७० ॥ ३७०. आँख खुली तो उस (जयन्त) ने अपने को स्वदेश (कश्मीर) में खड़ा (उत्थित) एवं अचनारत राजा के भृत्यों का जल लाने में व्यग्र देखा। स्वमावेदयितु नद्या नीयमाने नृपान्तिकम् । अन्वाक्षिपोऽक्षिपल्लेखं स स्नानकलशे ततः ॥ ३७१ ॥ ३७१. तदनन्तर स्व को विदित करने के लिये, नृप के निकट नदी से ले जाते हुए स्नान कलश में लेख अविलम्ब डाल दिया। प्रवरेशं स्नापयता स्रस्तं तत्कलशात्पुनः । राज्ञा लेखं वाचयित्वा जयन्तः प्रापितोऽन्तिकम् ॥ ३७२ ॥ ३७२. प्रवरेश (लिंग) का स्नान कराते हुए, राजा ने कलश निपतित, लेख को वाच कर, जयंत को समीप बुलाया। पाठभेद : श्लोक संख्या ३६६ में 'निद्दे' का 'निद' तथा श्लोक संख्या ३६७ में 'ध्वन्य' का पाठभेद 'श्मीरिको' का पाठभेद 'श्मीरको' मिलता है। 'ध्वनि' तथा 'शास्ते' का पाठभेद 'शतो' मिलता है।

तृतीय तरंग ५६५ कृतं कृत्यं महद्दत्त भोगा भुक्ता वयो गतम् । किमन्यत्करणीयं न एहि गच्छ शिवालयम् ॥ ३७३ ॥ ३७३. "कृत किये, महान् दान किया, भोगों का सम्भोग किया, आयु गत हो गयी, तुम्हें और क्या करणीय है ? आओ ! शिवालय ( शिवलोक ) चलो।"२ ततस्तं वृत्तसंकेतः संतोप्याभिमतार्पणात् । भित्त्वा तमश्मप्रासादं जगाहे विमलं नभः ॥ ३७४ ॥ ३७४. तद् उपरान्त संकेत को जानकर अभिमत (वाञ्छित धन) प्रदान द्वारा उसे (जयन्त को) सन्तुष्ट कर उस पाषाण प्रासाद का भेदन कर, विमल आकाश में प्रवेश किया। जनैः स ददृशे गच्छन् कैलासतिलकां दिशम् । विशदे घटयन् व्योम्नि द्वितीयतपनोदयम् ॥ ३७५ ॥ ३७५. कैलास तिलकित' (विभूषित) दिशा में जाते एवं निर्मल व्योम में द्वितीय सूर्योदय सम्पादित करते हुए देखा । जयन्तेनाद्भुतोदन्तहेतुनाऽवाप्य संपदः । स्वनामाङ्काग्रहारादकर्मभिनिर्ममेलाः कृताः ॥ ३७६ ॥ ३७६. जयन्त ने इस अद्भुत घटना द्वारा प्राप्त सम्पत्तियों का स्वनामांकित अग्रहारादि में सदुपयोग किया। एवं स भुवनैश्वर्यं भुक्त्वा भूमिभृतां वर । अनेनैव शरीरेण भेजे भूतपतेः सभाम् ॥ ३७७ ॥ ३७७. नृपति श्रेष्ठ उसने इस प्रकार भुवन भोग कर इसी शरीर से भूतपति की सभा को प्राप्त किया । पादटिप्पणियाँ : ३७३ (१) पत्र का खेल क्या था यह इस पद से स्पष्ट होता है । ३७४ (१) श्री विल्सन राजा का स्वर्गारोहण मूल काल सन् १८६ ई० तथा समीकृत काल सन् ४०६ ई० देता है । श्री एम० पी० पण्डित प्रवरसेन द्वितीय का स्वर्गगमन सन्१८६ ई० देते हैं। ३७५ (१) तिलकित : कैलास पर्वत गोल है । तिलक गोल होता है। कल्हण प्रतीत होता है कैलास यात्रा किया था। कैलास पर्वत सचमुच भूमि पर ललाट पर लगे गोल तिलक तुल्य लगता है। मैंने कैलास यात्रा की है। कल्हण का यह श्लोक पढ़ते ही, जिन्होंने भी कैलास यात्रा की है, उन्हें कैलास का अभिराम दृश्य स्मरण हो जायेगा । कैलास उत्तर दिशा में है। कैलास का शिखर हिमाच्छादित रहता है। पर्वत मूल मटमैले पत्थरों जैसे है। प्रायः हिमविहीन रहता है। ललाटपर भ्रूमध्य कस्तूरी तिलक के ऊपर यदि श्वेत चन्दन का तिलक लगा दिया जाय तो कैलास की उपमा ठीक बैठ जाती है । रक्त चन्दन किंवा केसर तिलक पर श्वेत चन्दन तिलक लगाने की प्रथा आज भी प्रचलित है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३७७ में 'भुक्त्वा' का पाठभेद 'त्यक्त्वा' मिलता है।

५६८ राजतरंगिणी सर्वरत्नजयस्कन्दगुप्तशब्दाङ्किताभिधाः । आसन् विहारचैत्यादिकृत्यैस्तत्सांचवा यशः॥ ३८० ॥ ३८०. सर्वरत्न, जय १ एवं स्कन्द २ गुप्त नामक उसके मन्त्रिप्रवरों ने विहार चैत्य आदि कृत्य किये । 'च द्वात्रिंश' मिलता है । पादटिप्पणियाँ ३७९ (१) श्री विल्सन ने युधिष्ठिर द्वितीय का राज्याभिषेक काल सन् १८४ ईस्वी २ मास और सम कुल काल सं० ४८९ ई० दिया है । तथा राज्यकाल ३९ वर्ष २ मास देता है । श्री एस० पी० पण्डित ने यह समय सन् २०४ ई० तथा राज्य काल २१ वर्ष ३ मास दिया है । ह्वीन्र्तेोन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३२४६ वर्ष ११ मास १ दिन तथा राज्यकाल ३८ वर्ष ३ मास दिया है । श्री बा०ने यह समय संवत् ४०९३ तथा सन् ३२३ ई० दिया है । ट्रायन के मत से यह काल सन् १८४ ई० ८ मास तथा कनिघम के अनुसार संन् ४६४ ई० आत ह । पादटिप्पणियाँ : ३८० (१) जयेन्द्रविहार-चीनी पर्यटक मोकुन ने अपने पर्यटन में जे-जे विहार का उल्लेख किया है । वह सम्भवतः जय का ही निर्माण कराया होगा । (२) स्कन्द-स्कन्द द्वारा निर्मित विहार तरंग ६ । ३७ में वर्णित स्कन्द भवन विहार है । वह श्रीनगर में वर्तमान खण्डवन स्थान में था । यह विहार श्रीनगर के वितस्ता झेलम नदी के दक्षिण तटपर नौ कदल अर्थात् छठे पुल ओर नगर की सामावर्ती ईदगाह के मध्य स्थित था । कल्हण ने इसका वर्णन स० ८ : १४४२ में किया है । वहाँ उसने स्कन्द भवन ही नाम दिया है । यहाँ राजा सुम्शल की रानी भस्म हुई थी । यह स्थान मणिका स्वामी की श्मशान मूर्ति नाम से प्रसिद्ध हो गया था । इसे मापगुम अर्थात् अरक्षित स्थान भी कहते थे । कालान्तर में यह स्थान कब्रिस्तान के काम में आने लगा था । मुहम्मद शाह (सन् १४८४-८६) के समय में यह सेना का शिविर (छावनी) के काम में लाया गया था । खण्डवन मुहल्ला के दक्षिण तरफ विहार स्थान रहा होगा । यह स्थान सम्भवतः नव कदल से १५० गज पर रहा होगा । यहाँ पर अब मुल्ला मुहम्मद बासूर की जियारत है । जियारत में यहाँ पर स्थित प्राचीन मन्दिर तथा विहार के टूटे अलंकृत शिलाखण्ड लगे हैं । हिन्दू मन्दिर की शैलो पर जियारत का निर्माण किया गया था । स्कन्द का दूसरा नाम कार्तिकेय है । कुमार कार्तिकेय का एक बार उल्लेख नीलमतपुराण में आया है । कार्तिकेय की पूजा कृत्तिका के साथ करने का निर्देश किया गया है। नीलमत में उस महान् सेनानी अथवा सेनापति के रूप में चित्रित नहीं किया गया है । ( नील० 435, 642, 649 ) श्री स्तीन ने इस जियारत को सन् १८९१ ई० में देखा था । उन्हें एक स्थान कच्ची दीवाल से घिरा मिला था। इसके केन्द्र में २२ फ़िट ऊँचा एक डूह। चौकोर पत्थर की दीवाल से वेष्ठित मिला था । वह ३८ फ़िट वर्गाकार था । उसके दक्षिण पूर्व की ओर एक गड्ढा १० फ़िट का था । यह सम्भवतः प्राचीन जल कुण्ड अथवा जल स्थान था । उसके कुछ फासले पर लगभग सन् १८८१ ई० में जियारत के मुल्ला ने एक गोल कुँआ खोद लिया था। स्थानीय ब्राह्मण कहते हैं कि इस स्थान पर कुमार किंवा स्कन्द का मन्दिर था । उसके समीप

तृतीय तरंग ५६९ भवच्छेदाभिधं ग्रामं स्तुत्यं चैत्यादिसिद्धिभिः । यो व्यधात् सोऽस्य वज्रेन्द्रोऽप्यासीन्मन्त्री जयेन्द्रजः ॥ ३८१ ॥ ३८१. जिसने चैत्य आदि सिद्धियों ( निर्माण ) से भवच्छेद' नामक ग्राम स्तुत्य बनाया वह जयेन्द्र का पुत्र वज्रेन्द्र भी इसका मंत्री था । ही एक जलस्रोत था । यह स्रोत मार नहर में तारबल के समीप जाकर मिलता था । किसी ने इस जलस्रोत को चलते हुए नहीं देखा था । श्री स्टीन को श्री साहिबराम के पुत्र पं० रामचन्द्र ऋषी से जिनकी अवस्था ६० वर्ष की थी मालूम हुआ कि उनकी बाल्यावस्था में उनके एक अति वृद्ध सम्बन्धी गोवर्धनदास याजिद यहाँ नित्य पूजा करने आते थे । यहाँ पर शहतूत का एक पेड़ लगा था । यहाँ के गवर्नर शेख मुहीउद्दीन की आज्ञा से सन् १८४२-१८४५ के बीच काट डाला गया था । वृक्ष के कटने पर वृक्ष के तना से रक्त की धारा निकली थी । श्री गोवर्धन दास वहाँ पर प्रवण के दिन दीपक जलाने आते थे । जियारत के मुल्ला के अनुरोध पर गवर्नर ने वृक्ष कटवाया था क्योंकि हिन्दू यहाँ पूजा करने आते थे । नीलमत पुराण में स्कन्दतीर्थ, स्कन्दस्यायतन तथा स्कन्देश्वर का उल्लेख मिलता है । स्कन्दपूजा : रुद्रं चन्द्रसुमां स्कन्दं नासत्यौ नन्दिनं तथा । पूजयित्वार्चमाल्यादिनैवेद्यैश्च पृथक् पृथक् ॥ 381 : ४८८ × × × शाखो विशाखः स्कन्दश्च नैगमेषस्तथैव च । मरुतश्च ग्रहश्चैव रोगाणामधिपो ज्वरः ॥ 604:७२६ × × × स्कन्दस्य तत्र कर्तव्या पूजा माल्यैः सुगन्धिभिः । 647 : ७६९ शच्याः समीपे पौलस्त्य दृष्ट्वा स्कन्दं नराधिप । पात्रकुण्डे नरः स्नात्वा कौमारं लोकमाप्नुयात् ॥ 995 : ११६६ × × × स्कन्देश्वर . स्कन्देश्वरं विशाखेशं पौलास्त्यमपरं तथा । दृष्ट्वा कुमारमेकैक फलं गोदानजं लभेत् ॥ 991 : ११६८ × × × स्कन्दतीर्थ : स्नात्वा तु मदतीर्थे च स्कन्दतीर्थे च मानवः । तथा सुरेश्वरी तीर्थे स्वर्गलोके महीयते ॥ 318 : १५३२ ॥ × × × स्कन्दस्यायतनम् : सुवर्णबिन्दुस्तत्रैव हरस्यायतनं शुभम् । स्कन्दस्यायतनं तत्र सर्वपापनिषूदनम् ॥ 112 : १५४-१५५ पाठभेद : श्लोकसंख्या ३८१ में 'भवच्छेदा' का पाठभेद 'भीछो' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३८१ ( १ ) भवच्छेदः यह ग्राम ऊलर परगना में है । यह वर्तमान वुत ग्राम है। इसे 'बोस्मो' भी कहते है । मीर संगम से एक मील दक्षिण स्थित है । नीलमत में भवच्छेद वर्णन नहीं मिलता । भव, भवोत्स, भवेश का उल्लेख मिलता है । भवच्छेद ग्राम का भव से कोई सम्बन्ध है या नहीं गवेषणा का विषय है । भव कश्मीर के मुख्य नागो में से है : ७२

५७० राजतरङ्गिणी दिक्कामिनीमुखोत्कीर्णकीर्तिचन्दनचित्रकाः। आसन् कुमारसेनाद्याः तस्यान्येऽप्यग्रमन्त्रिणः ॥ ३८२ ॥ ३८२. दिशा रूपी कामिनियों के मुख को कीर्ति रूपी चन्दन¹ से चित्रित² करने वाले कुमारसेन आदि अन्य भी उसके अग्रय मन्त्री थे ।

दिवश्चक्रधरः श्वश्रो मद्यो देहारको गृहः । अन्धः पङ्गुस्तथा कुष्टी काणो बधिरषण्ढकौ 900 : १०६९-१०७० x x x तैत्तिरीयेस्वरं देयं दण्डकस्वामिनं तथा । मवस्य च तथा पार्श्वे रामस्वामिजनाईनम् ॥ 1157 : ११६८-११६९ ॥ x x x भवेश : शङ्खेश्वरं नृसिंहेशं मवेशं धनदेश्वरम् । सदा सन्निहितो राजन् ज्ञेयो भूतेश्वरो हरः ॥ 1026: ११९८-११९९ ॥ x x x भवोत्स : स्नात्वा नारायणस्थाने विष्णुलोके महीयते । रामतीर्थे भवोत्से च फलमेतत् प्रकीर्तितम् ॥ 1312 : १५२६ ॥ x x x पाठभेदः श्लोकसंख्या ३८२ मे 'चित्र' का पाठभेद 'चन्द्र' तथा 'चन्द्रि' मिलता है ।

केसर आदि से चित्र बनाना यह अत्यन्त प्राचीन प्रथा है। प्रायः संस्कृत के सभी काव्य एवं शृंगार ग्रन्थों में इसका उल्लेख मिलता है । विवाह के समय बंगाल की स्त्रियों का मुख चन्दन आदि की बिन्दियों से आज भी चित्रित किया जाता है । मैं सन् १९४६ में कमीशन का सदस्य होकर ब्रिटिश सरकार की तरफ से संविधान सम्बन्धी सलाह देने के लिये नेपाल गया था। उस समय यातायात इतना सुगम नही था । भीम फेडी से काठमाण्डू तक डाँड़ी से या पैदल जाना पड़ता था। इस लम्बे मार्ग में मैंने नेपाली स्त्रियो का चित्रित मुखमण्डल देखा । उज्ज्वल एवं लाल रग से मुख तथा अधर रंगती थीं। आँखें तथा भौंहें काजल या काले रंग से रंगती थी । कुछ तो इस प्रकार के चित्रण के कारण अत्यन्त फूहड़ लगने लगती थीं। उनका नैसगिक सौन्दर्य निखरने के स्थान पर दब जाता था। इस दो दिन वाले प्राकृतिक दृश्यो से मनोहर मार्ग में मानव शरीर पर यह कृत्रिमता देखकर जगत् की विषमता पर अनायास ध्यान चला जाता था । अकृत्रिमता में कृत्रिमता की पराकाष्ठा मिलती थी । पद का तात्पर्य यह है कि कुमारसेन तथा अन्य मन्त्रियो ने राजा का यश दिगंत में फैलाया । यहाँ कल्हण ने मन्त्रियो को नारियो के चित्रित करनेवाले कलाकार के रूप में प्रस्तुत किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३८३ में 'सल्लणा' का पाठभेद 'लक्षणा', 'भल्लणा', 'लल्लणा' तथा 'लूखणा' मिलता है ।

३८२ (१) चन्दन : मुखपर चन्दन लगाने का तत्कालीन प्रथा का कल्हण यहाँ उल्लेख करता है । दक्षिण में महिलायें मुखपर हल्दी तथा नेपाल में श्वेतचूर्ण लगाती हैं। चन्दन तीन प्रकार यथा रक्त श्वेत एवं कालेयक होता है । चन्दन लगाने की प्रथा कश्मीर में अत्यन्त प्राचीन है । नीलमत इसका उल्लेख करता है। (नी० 417, 423, 787) (२) चित्रित : मुखमण्डलपर चन्दन, रोरी,

तृतीय तरंग ५७१ पद्मावत्यां सुतस्तस्य नरेन्द्रादित्य इत्यभूत् । लःखणापरनामा यो नरेन्द्रस्वामिनं व्यधात् ॥ ३८३ ॥ लखण—नरेन्द्रादित्य १: ३८३. पद्मावती से उत्पन्न उसका पुत्र नरेन्द्रादित्य अपर नाम लखण २ था जिसने नरेन्द्रस्वामी ३ की स्थापना की । वज्रेन्द्रतनयौ वज्रकनकौ यस्य मन्त्रिणौ । अभूतां सुकृतोदन्तौ राज्ञी च विमलप्रभा ॥ ३८४ ॥ ३८४. सुकृति प्रख्यात वज्रेन्द्रतनय वज्र तथा कनक जिसके मन्त्री हुए और रानी विमलप्रभा थी । पादटिप्पणियाँ : ३८३ (१) श्री विल्सन ने राज्याभिषेक काल सन् २२४ ई० ५ मास तथा समीकृतकाल सन् ५४४ ई० और राज्य काल १३ वर्ष दिया है श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय सन् २०४ ई० तथा राज्यकाल १३ वर्ष दिया है । श्री स्टीन राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३२८६, मास २ दिन प्रथम तथा राज्यकाल १३ वर्ष देते हैं । श्री वालो ने यह समय सप्तर्षि संवत् ४१०६ तथा सन् ३३६ ई० दिया है । कलिगताब्द ३३१७ वर्ष ११ मास १३ दिन ड्रायर के अनुसार सन् २०४ ई० ११ मास तथा कनिघम के मत से सन् ४८३ ई० आता है । हसन—राजा नरेन्द्रादित्य संवत् २३४ विक्रमी में बाप की जगह पर सर पर ताज रखकर मुहकमा असनाय अपनी तरफ से जारी किया और तेरह साल हकूमत में मशगूल रहा । (२) लखण : जनरल कनिघम ने एक मुद्रा का उल्लेख किया है। जिसपर (रा) जा राखण उदयादित्य टंकित है। उसे कश्मीर की मुद्रा कहा है। (लेटर इण्डोसीथियन पृष्ठ १११, और प्लेट ७ तथा १२) यह 'देव शाही' शिवगेल शैली की मुद्रा से मिलता है। (प्लेट ७ : ११) यह मुद्रा राजतरंगिणी में वर्णित (१ ; ३४७) खिलिखल किंवा नरेन्द्रादित्य से मिलता है । इन दोनों मुद्राओं तथा अन्य मुद्रा मिहिर कुल तथा हिरण्यकुल में अत्यन्त साम्य है। नरेन्द्रादित्य का अपर नाम खिलिखल कल्हण ने क्यो लिखा वह विचारणीय है । (३) नरेन्द्रस्वामी : जनरल कनिघम ने 'पवार' के मन्दिर को नरेन्द्रस्वामी का मन्दिर माना है । किन्तु यह बात ठीक नही मालूम पड़ती । पयार शिव मन्दिर है । मंगलपुर से यह स्थान २ मिल और दूर है । इसमें भैरव ; ताण्डवशील शिव तथा पार्वती की मूर्तियाँ बनी है। अतएव यह शैव मन्दिर है । यह वैष्णव मन्दिर नही हो सकता । स्वामी शब्द इस बात का प्रमाण है कि नरेन्द्रस्वामी का मन्दिर विष्णु मन्दिर था । इस मन्दिर के सम्बन्ध में एक और मत है । श्री पण्डित आनन्द कौल का मत है कि वितस्ता के द्वितीय तथा तृतीय पुल के मध्य तथा वितस्ता के दक्षिण तट से १०० गज दूर श्रीनगर में नरेन्द्रस्वामी का मन्दिर था । इस समय यह मन्दिर ज़ियारत में परिणत हो गया है । इसका नाम नरपरिस्तान रख दिया गया है (अर्कियोलोजिकल दि रेमेन्स इन कश्मीर : २८) । मैं इस स्थान को खोजता पहुँचा । इस समय

५७२ राजतरंगिणी स विधायाधिकरणं लिखितस्थितये निजम् । द्यां त्रयोदशभिर्वर्षैरारुरोह महाभुजः ॥ ३८५ ॥ ३८५. उस महाभुज ने स्व लेख¹ की सुरक्षा अधिकरण स्थापित कर तेरह वर्ष अनन्तर स्वर्गारोहण किया। तस्याऽनुजो धरणिभृद् रणादित्यस्ततोऽभवत् । तुञ्जीनापरनामानं यं जनाः प्राहुरञ्जसा ॥ ३८६ ॥ रणादित्य—तुंजीन ३८६. तदनन्तर उसका अनुज रणादित्य भूपति हुआ। जिसे अपर नाम से लोग तुंजीन कहते थे।¹

यह अत्यन्त घनी आबादी के बीच में है। सड़क के किनारे कुछ वृक्ष समूहों का एक छोटा चहार दीवारी से घिरा स्थान है। सड़क की तरफ ईंटों की जालियां लगी हैं। एक द्वार भी है। द्वार बन्द था। हिन्दू लोग सड़क की तरफ लगी एक खुली खिड़की से फूल तथा पूजन सामग्री भीतर डाल देते हैं। मैने इस खिड़की से झांक कर देखा। भीतर ईंटों तथा पत्थरो का समूह ऊबड़-खाबड़ पड़ा था। कुछ सूखे फूल तथा बुझे दीपक पड़े थे।

३८५ (१) लेख : कश्मीर में इस समय से राजकीय तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कागजो के रखने की सुव्यवस्थित व्यवस्था आरम्भ होती है। आज कल जैसे प्रचलित 'रिकार्ड' रूम तथा पुरातत्त्वलेखसंग्र- हालय स्थापित करने की ध्वनि इस श्लोक से निकलती है। राजा लहान नरेन्द्रदित्य ने, प्रतीत होता है, आन्तरिक राज व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने पर विशेष जोर दिया था।

३८६ (१) आइने अकबरी में इसका नाम 'जेथुन' तथा राज्य काल ३०० वर्ष दिया गया है। श्री विल्सन ने राज्याभिषेक काल सन् २३७ ई० ५ मास तथा समोदन्त काल सन् ५४५ दिया है। राज्य- काल ३०० वर्ष दिया है; श्री एस. पी. पण्डित ने सन् २१५ ई० दिया है। राज्यकाल ३०० देते है। श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३२९९ मास २ तथा दिन प्रथम दिया है तथा राज्यकाल ३०० वर्ष दिया है। श्री वाली ने यह समय सप्तर्षि संवत् ४१४६ तथा सन् ३७६ ई० दिया है। कलि गतांक ३६१७ वर्ष ११ मास १३ दिन, ट्रायर के मत से सन् २१७ ई० ११ मास तथा कनिंघम के अनुसार सन् ४९० ई० आता है।

हसन लिखता है—राजा तुंजीन पिसर दोयम राजा जदिस्तर ने ५४८ विक्रमी में राजगढ़ी का ताज सरपर रखकर शरतूल पिसर नरेन्द्र को वजीर बनाया। कुछ अरसा के बाद उनके मा बैन निकाफ की आग मुस्तअल हो गयी। और सरदूल मारा गया। उसका बेटा सरबसेन सात साला था। वह राजा के खोफ से अपनी मां के हमराह नगरकोट में भाग गया। राजा नगर- कोट ने उसे दामादी में कबूल करके निकाह रखा। जब सिन तमीज को पहुंचा तो एक भारी लश्कर जमा करके और राजा जम्मू से इमदाद लेकर कश्मीर पर हमलावर हुआ। तुंजीन उसके मुकाविला में निकला। कोहिस्तान बनिहाल मे जंग व जदेल की आग रोशन की। तुंजीन मारा गया। उसकी हकूमत तेंतीस साल थी।

यह श्लोक कल्हण के इसी तरंग में वर्णित ९७ श्लोक से मिलता है जिसे उसने श्रेष्ठसेन के सम्बन्ध में लिखा है।

तृतीय तरंग ५७३ जगद्विलक्षणं यस्य शङ्खमुद्राङ्कितं शिरः । अपूर्वशर्वरीशान्तर्लीनभानुश्रियं दधे ॥ ३८७ ॥ ३८७. जिसका जगद्विलक्षण शङ्ख¹ मुद्रांकित शिर (भाल) चन्द्रान्तर्लीन सूर्य की अभूत पूर्व शोभा धारण करता था । रिपुकण्ठाटवीष्वासीत् यस्य धाराधरः पतन् । तद्वधूनेत्रकुण्डैस्तु जलाधिक्यमधार्यत ॥ ३८८ ॥ ३८८. जिसका खङ्ग शत्रु कण्ठ रूपी अटवी पर पतित होता था और उनकी लल- नाओं के नेत्रकुण्ड जल बाहुल्य धारण¹ करते थे (अश्रुपूर्ण होते थे ।) अपूर्वो यत्प्रतापाग्निः प्रविश्योर्वी द्विषां न्यधात् । नारोनेत्रेषु नीरोर्मीन् मन्दिरेषु तृणाङ्कुरान् ॥ ३८९ ॥ ३८९. जिसकी अपूर्व प्रतापाग्नि शत्रु भूमि में प्रवेश कर नारी नेत्रों में जलतरंगों एवं गृहों पर तृणाङ्कुर स्थिर कर देते थे । यस्य पाणिप्रणयितां कृपाणे समुपायते । कवन्धेभ्यः परो नृत्तं न व्यधत्त द्विपद्बले ॥ ३९० ॥ ३९०. जिसके पाणि में कृपाण आ जाने पर शत्रु सेना में कवन्धों¹ के अतिरिक्त अन्य नृत्य नहीं करता था । ३८७ (१) शंख की खोल तुल्य मस्तक की नीलमत के तत तथा आनद्ध वाद्य वितत के उपमा यहाँ सुन्दरता के विचार से दी गयी है। वर्गीकरण में आ जाता है। शशि तथा शंख की उपमा उज्ज्वलता के लिये दी गयी हैं। राजा का दैवी चिह्न शंख समझा जाता है। प्रत्येक राजा तथा शूर के पास अपना शंख होता था। गीता का प्रथम अध्याय ही विभिन्न प्रकार के शंख घोषों के वर्णन से आरम्भ होता है। विष्णु भगवान् के चार हाथों में से एक हाथ में शंख दिखा कर उसे दैवी विभूतियों तथा गुणों से युक्त किया गया है। शंख की गणना सुषिर वाद्य में की गयी है। वाद्यों का वर्गीकरण—घन, वितत, तत, सुषिर में किया गया है। नीलमत पुराण में वाद्य, वादित्र तथा वाद्य भाण्ड शब्दों का प्रयोग वाद्ययन्त्रो के लिये किया गया है। कामसूत्र उन्हें आनद्ध तथा तन्त्री वाद्यों में वर्गीकरण करता है। तन्त्री वाद्य शंख का उल्लेख ऋग्वेद में नही मिलता । रामायण, महाभारत तथा पुराणो में यह रणवाद्य रूप घोष हेतु प्रयुक्त किया गया है। नीलमत में इसका दो बार उल्लेख कौमुदी महोत्सव तथा राज्याभिषेक के प्रसंग में किया गया है। (नी० 386, 816) ३८८ (१) धारण—यह शब्द यहां श्लिष्ट हैं। इसका अर्थ कृपाण तथा मेघ दोनो होता है। ३९० (१) कबन्ध—दण्डकारण्य का एक राक्षस था। इसका मस्तक इसके वक्षस्थल में था। शिरविरहित होने के कारण इसका नाम कबन्ध पड़ा था। महाभारत वनपर्व अ० २६३ तथा वाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड ५९-६७ में इसकी कथा का

५७४ राजतरंगिणी तस्यान्यपोह्यमाहात्म्य देवी दिव्याकृतेः प्रिया । विष्णुशक्तिः क्षितिं प्राप्ता रणारम्भाभिधाऽभवत् ॥ ३९१ ॥ ३९१. उस दिव्याकृति की प्रिया अनश्वर माहात्म्य वाली देवी रणारम्भा नाम्नी हुई थी, जो पृथ्वी पर उत्पन्न विष्णु शक्ति¹ थी । स हि जन्मान्तरे पूर्वं द्यूतकारोऽभवत्किल । कदाऽपि प्राप निर्वेदं सर्वस्वं कितवैर्जितः ॥ ३९२ ॥ ३९२. वह पहले जन्मान्तर में द्यूतकार ( जुआड़ी ) था । किसी समय कितव ( धूर्त जुआड़ी ) के सर्वस्व विजित करने पर वह निर्वेद ( विरक्ति ) प्राप्त किया । देहत्यागोद्यतोऽप्यासीत् प्राप्य किंचिद्विचिन्तयन् । न पर्यन्तेऽप्युपेक्षन्ते कितवाः स्वार्थसाधनम् ॥ ३९३ ॥ ३९३. देह त्याग हेतु उद्यत भी प्राप्य ( लाभ ) का चिन्तन कर रहा था। कितव जन¹ अन्त काल में भी स्वार्थ साधन की उपेक्षा नहीं करते । अवन्ध्यदर्शनां विन्ध्ये देवीं भ्रमरवासिनीम् । द्रष्टुमैच्छद्वराकाङ्क्षी निर्व्यपेक्षः स्वजीविते ॥ ३९४ ॥ ३९४. उसने प्राण से निरपेक्ष होकर वर की आकांक्षा से विन्ध्य में अवन्ध्य (सफल) दर्शना देवी भ्रमरवासिनी¹ के दर्शन की इच्छा की । उल्लेख है । देखो सीता के अन्वेषण में जटायु वध के पश्चात् राम लक्ष्मण वन में घूम रहे थे । क्रौंच वन के पूर्व घोर तीन कोस पर स्थित मातंग मुनि का आश्रम था । वहां उन्होंने भयंकर ध्वनि सुनी । यह ध्वनि कबंध की थी। उसने एक कोस दूर से ही राम लक्ष्मण को देखा। कबन्ध उन्हें भक्षण करने के लिये बढ़ा । रामने बायां तथा लक्ष्मण ने दाहिना हाथ कबंध का पकड़कर तोड़ दिया । गतप्राण होकर वह गिर पड़ा । उसके शरीर से देदीप्यमान पुरुष निकला । वह आकाश में स्थित हो गया। राम के प्रश्नपर उत्तर दिया, 'मैं विश्वावसु नामक गन्धर्व हूँ । शाप के कारण राक्षस योनि प्राप्त हुई थी।' ३९१ (१) विष्णु शक्ति—विष्णु की क्रियात्मक शक्ति से यहाँ तात्पर्य है। यह शक्ति स्वयं लक्ष्मी है। ३९३ (१) कितव जन : यह सूक्ति है । कल्हण ने यहाँ जुआड़ियो के विषय में उक्त सूक्ति कही है । मरते दम तक जुआड़ी अपने दाव तथा लाभ की चिन्ता करते रहते हैं । ३९४ (१) भ्रमर वासिनी—यह दुर्गा का ही एक रूप है। इनको विन्ध्यवासिनी भी एक मत मानता है । कवि वाक्पति ने अपनी प्राकृत कविता में इस भ्रमरवासिनी देवी से मिलता जुलता वर्णन किया है। दुर्गासप्तशती में भ्रामरी देवी का वर्णन मिलता है । कल्हण ने निस्सन्देह भ्रमरवासिनी देवी का यहाँ उल्लेख उसी के सन्दर्भ में किया है । दुर्गा ने स्वयं तीनों लोकों के हित के लिये ६ पदों वाले

तृतीय सर्ग ५७५ भ्रमरैः शङ्कुपुच्छाद्यैः खण्ड्यमानस्य देहिनः । तदास्पदं हि विशतो दुर्लङ्घ्या पञ्चयोजनी ॥ ३६५ ॥ ३९५: भ्रमरों एवं शङ्कुपुच्छ आदि से दंशित होते देहधारियों के लिये जो उस स्थान में प्रवेश कर रहे हों-पाँच योजन मार्ग (नितान्त) दुर्लङ्घ्य था । स वज्रशङ्कुपुच्छानां धीमांस्तेषां प्रतिक्रियाम् । देहेऽवश्यपरित्याज्ये मन्वानोऽभूददुष्कराम् ॥ ३६६ ॥ ३९६. उस बुद्धिमान् ने अवश्यमेव त्याज्य देह के लिये, उन वज्र तुल्य शंकु, पुच्छ - धारियों की प्रतिक्रिया को दुष्कर नहीं माना । प्रागयोवर्मणा देहं ततो महिषचर्मणा । तेन छादयता दत्तो मृल्लेपोऽथ सगोमयः ॥ ३६७ ॥ ३९७. सर्व प्रथम उसने लोह वर्म से, तदनन्तर महिष चर्म से, देह को आच्छादित कर गोमय¹ मिश्रित मृत्तिका लेप किया । अथ भानुकरोच्छुष्कमृल्लेपाम्रेडिताङ्गकः । स लोष्ट इव संचारी प्रतस्थे क्रूरनिश्चयः ॥ ३६८ ॥ ३९८. अंग पर बारंबार किये मृत्तिका लेपको सूर्य किरणों में सुखाकर संचरणशील लोष्टवत् उस क्रूर निश्चयी ने प्रस्थान किया । सरलां सरणिं त्यक्त्वा जीवितस्पृहया समम् । गुहा तेन ततः सान्द्रतमोभीमा व्यगाहत ॥ ३९९ ॥ ३९९. तदनन्तर जीवन की आकांक्षा के साथ-साथ सरल सरणि (मार्ग) को त्यागकर उसने घने अन्धकार से भयंकर गुहा में प्रवेश किया । असंख्य भौंरो का रूप धारण कर महादैत्य का वध किया था । तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसंख्येयषट्पदम् । त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥ (११ : ५३) भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः । इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ॥ (११ : ५४) तदा तदाऽवतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ॥ ॐ ॥ (११ - ५५) दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय का विनियोग भ्रामरी का उल्लेख करता है । ॐ अस्य श्री उत्तमचरितस्य रुद्र ऋषिः महा- सरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम् सूर्यस्तत्त्वं सामवेदः स्वरूपं महासरस्वती- प्रीत्यर्थे उत्तमचरित्र पाठे विनियोगः । ३९७ (१) गोमय-आज भी ग्रामो में भौंरा काटने के स्थान पर गोबर लगा दिया जाता है । उससे दर्द तथा जलन कम हो जाती है । , पाठभेद : श्लोक संख्या ३९८ में 'म्रेडिताङ्कक' का पाठभेद 'प्रेङिताङ्ककः' तथा 'पीडिताङ्गकः' मिलता है ।