राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 753, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें५७० राजतरङ्गिणी दिक्कामिनीमुखोत्कीर्णकीर्तिचन्दनचित्रकाः। आसन् कुमारसेनाद्याः तस्यान्येऽप्यग्रमन्त्रिणः ॥ ३८२ ॥ ३८२. दिशा रूपी कामिनियों के मुख को कीर्ति रूपी चन्दन¹ से चित्रित² करने वाले कुमारसेन आदि अन्य भी उसके अग्रय मन्त्री थे ।
दिवश्चक्रधरः श्वश्रो मद्यो देहारको गृहः । अन्धः पङ्गुस्तथा कुष्टी काणो बधिरषण्ढकौ 900 : १०६९-१०७० x x x तैत्तिरीयेस्वरं देयं दण्डकस्वामिनं तथा । मवस्य च तथा पार्श्वे रामस्वामिजनाईनम् ॥ 1157 : ११६८-११६९ ॥ x x x भवेश : शङ्खेश्वरं नृसिंहेशं मवेशं धनदेश्वरम् । सदा सन्निहितो राजन् ज्ञेयो भूतेश्वरो हरः ॥ 1026: ११९८-११९९ ॥ x x x भवोत्स : स्नात्वा नारायणस्थाने विष्णुलोके महीयते । रामतीर्थे भवोत्से च फलमेतत् प्रकीर्तितम् ॥ 1312 : १५२६ ॥ x x x पाठभेदः श्लोकसंख्या ३८२ मे 'चित्र' का पाठभेद 'चन्द्र' तथा 'चन्द्रि' मिलता है ।
केसर आदि से चित्र बनाना यह अत्यन्त प्राचीन प्रथा है। प्रायः संस्कृत के सभी काव्य एवं शृंगार ग्रन्थों में इसका उल्लेख मिलता है । विवाह के समय बंगाल की स्त्रियों का मुख चन्दन आदि की बिन्दियों से आज भी चित्रित किया जाता है । मैं सन् १९४६ में कमीशन का सदस्य होकर ब्रिटिश सरकार की तरफ से संविधान सम्बन्धी सलाह देने के लिये नेपाल गया था। उस समय यातायात इतना सुगम नही था । भीम फेडी से काठमाण्डू तक डाँड़ी से या पैदल जाना पड़ता था। इस लम्बे मार्ग में मैंने नेपाली स्त्रियो का चित्रित मुखमण्डल देखा । उज्ज्वल एवं लाल रग से मुख तथा अधर रंगती थीं। आँखें तथा भौंहें काजल या काले रंग से रंगती थी । कुछ तो इस प्रकार के चित्रण के कारण अत्यन्त फूहड़ लगने लगती थीं। उनका नैसगिक सौन्दर्य निखरने के स्थान पर दब जाता था। इस दो दिन वाले प्राकृतिक दृश्यो से मनोहर मार्ग में मानव शरीर पर यह कृत्रिमता देखकर जगत् की विषमता पर अनायास ध्यान चला जाता था । अकृत्रिमता में कृत्रिमता की पराकाष्ठा मिलती थी । पद का तात्पर्य यह है कि कुमारसेन तथा अन्य मन्त्रियो ने राजा का यश दिगंत में फैलाया । यहाँ कल्हण ने मन्त्रियो को नारियो के चित्रित करनेवाले कलाकार के रूप में प्रस्तुत किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३८३ में 'सल्लणा' का पाठभेद 'लक्षणा', 'भल्लणा', 'लल्लणा' तथा 'लूखणा' मिलता है ।
३८२ (१) चन्दन : मुखपर चन्दन लगाने का तत्कालीन प्रथा का कल्हण यहाँ उल्लेख करता है । दक्षिण में महिलायें मुखपर हल्दी तथा नेपाल में श्वेतचूर्ण लगाती हैं। चन्दन तीन प्रकार यथा रक्त श्वेत एवं कालेयक होता है । चन्दन लगाने की प्रथा कश्मीर में अत्यन्त प्राचीन है । नीलमत इसका उल्लेख करता है। (नी० 417, 423, 787) (२) चित्रित : मुखमण्डलपर चन्दन, रोरी,