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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय तरंग ५७१ पद्मावत्यां सुतस्तस्य नरेन्द्रादित्य इत्यभूत् । लःखणापरनामा यो नरेन्द्रस्वामिनं व्यधात् ॥ ३८३ ॥ लखण—नरेन्द्रादित्य १: ३८३. पद्मावती से उत्पन्न उसका पुत्र नरेन्द्रादित्य अपर नाम लखण २ था जिसने नरेन्द्रस्वामी ३ की स्थापना की । वज्रेन्द्रतनयौ वज्रकनकौ यस्य मन्त्रिणौ । अभूतां सुकृतोदन्तौ राज्ञी च विमलप्रभा ॥ ३८४ ॥ ३८४. सुकृति प्रख्यात वज्रेन्द्रतनय वज्र तथा कनक जिसके मन्त्री हुए और रानी विमलप्रभा थी । पादटिप्पणियाँ : ३८३ (१) श्री विल्सन ने राज्याभिषेक काल सन् २२४ ई० ५ मास तथा समीकृतकाल सन् ५४४ ई० और राज्य काल १३ वर्ष दिया है श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय सन् २०४ ई० तथा राज्यकाल १३ वर्ष दिया है । श्री स्टीन राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३२८६, मास २ दिन प्रथम तथा राज्यकाल १३ वर्ष देते हैं । श्री वालो ने यह समय सप्तर्षि संवत् ४१०६ तथा सन् ३३६ ई० दिया है । कलिगताब्द ३३१७ वर्ष ११ मास १३ दिन ड्रायर के अनुसार सन् २०४ ई० ११ मास तथा कनिघम के मत से सन् ४८३ ई० आता है । हसन—राजा नरेन्द्रादित्य संवत् २३४ विक्रमी में बाप की जगह पर सर पर ताज रखकर मुहकमा असनाय अपनी तरफ से जारी किया और तेरह साल हकूमत में मशगूल रहा । (२) लखण : जनरल कनिघम ने एक मुद्रा का उल्लेख किया है। जिसपर (रा) जा राखण उदयादित्य टंकित है। उसे कश्मीर की मुद्रा कहा है। (लेटर इण्डोसीथियन पृष्ठ १११, और प्लेट ७ तथा १२) यह 'देव शाही' शिवगेल शैली की मुद्रा से मिलता है। (प्लेट ७ : ११) यह मुद्रा राजतरंगिणी में वर्णित (१ ; ३४७) खिलिखल किंवा नरेन्द्रादित्य से मिलता है । इन दोनों मुद्राओं तथा अन्य मुद्रा मिहिर कुल तथा हिरण्यकुल में अत्यन्त साम्य है। नरेन्द्रादित्य का अपर नाम खिलिखल कल्हण ने क्यो लिखा वह विचारणीय है । (३) नरेन्द्रस्वामी : जनरल कनिघम ने 'पवार' के मन्दिर को नरेन्द्रस्वामी का मन्दिर माना है । किन्तु यह बात ठीक नही मालूम पड़ती । पयार शिव मन्दिर है । मंगलपुर से यह स्थान २ मिल और दूर है । इसमें भैरव ; ताण्डवशील शिव तथा पार्वती की मूर्तियाँ बनी है। अतएव यह शैव मन्दिर है । यह वैष्णव मन्दिर नही हो सकता । स्वामी शब्द इस बात का प्रमाण है कि नरेन्द्रस्वामी का मन्दिर विष्णु मन्दिर था । इस मन्दिर के सम्बन्ध में एक और मत है । श्री पण्डित आनन्द कौल का मत है कि वितस्ता के द्वितीय तथा तृतीय पुल के मध्य तथा वितस्ता के दक्षिण तट से १०० गज दूर श्रीनगर में नरेन्द्रस्वामी का मन्दिर था । इस समय यह मन्दिर ज़ियारत में परिणत हो गया है । इसका नाम नरपरिस्तान रख दिया गया है (अर्कियोलोजिकल दि रेमेन्स इन कश्मीर : २८) । मैं इस स्थान को खोजता पहुँचा । इस समय

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