राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७२ राजतरंगिणी स विधायाधिकरणं लिखितस्थितये निजम् । द्यां त्रयोदशभिर्वर्षैरारुरोह महाभुजः ॥ ३८५ ॥ ३८५. उस महाभुज ने स्व लेख¹ की सुरक्षा अधिकरण स्थापित कर तेरह वर्ष अनन्तर स्वर्गारोहण किया। तस्याऽनुजो धरणिभृद् रणादित्यस्ततोऽभवत् । तुञ्जीनापरनामानं यं जनाः प्राहुरञ्जसा ॥ ३८६ ॥ रणादित्य—तुंजीन ३८६. तदनन्तर उसका अनुज रणादित्य भूपति हुआ। जिसे अपर नाम से लोग तुंजीन कहते थे।¹
यह अत्यन्त घनी आबादी के बीच में है। सड़क के किनारे कुछ वृक्ष समूहों का एक छोटा चहार दीवारी से घिरा स्थान है। सड़क की तरफ ईंटों की जालियां लगी हैं। एक द्वार भी है। द्वार बन्द था। हिन्दू लोग सड़क की तरफ लगी एक खुली खिड़की से फूल तथा पूजन सामग्री भीतर डाल देते हैं। मैने इस खिड़की से झांक कर देखा। भीतर ईंटों तथा पत्थरो का समूह ऊबड़-खाबड़ पड़ा था। कुछ सूखे फूल तथा बुझे दीपक पड़े थे।
३८५ (१) लेख : कश्मीर में इस समय से राजकीय तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कागजो के रखने की सुव्यवस्थित व्यवस्था आरम्भ होती है। आज कल जैसे प्रचलित 'रिकार्ड' रूम तथा पुरातत्त्वलेखसंग्र- हालय स्थापित करने की ध्वनि इस श्लोक से निकलती है। राजा लहान नरेन्द्रदित्य ने, प्रतीत होता है, आन्तरिक राज व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने पर विशेष जोर दिया था।
३८६ (१) आइने अकबरी में इसका नाम 'जेथुन' तथा राज्य काल ३०० वर्ष दिया गया है। श्री विल्सन ने राज्याभिषेक काल सन् २३७ ई० ५ मास तथा समोदन्त काल सन् ५४५ दिया है। राज्य- काल ३०० वर्ष दिया है; श्री एस. पी. पण्डित ने सन् २१५ ई० दिया है। राज्यकाल ३०० देते है। श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३२९९ मास २ तथा दिन प्रथम दिया है तथा राज्यकाल ३०० वर्ष दिया है। श्री वाली ने यह समय सप्तर्षि संवत् ४१४६ तथा सन् ३७६ ई० दिया है। कलि गतांक ३६१७ वर्ष ११ मास १३ दिन, ट्रायर के मत से सन् २१७ ई० ११ मास तथा कनिंघम के अनुसार सन् ४९० ई० आता है।
हसन लिखता है—राजा तुंजीन पिसर दोयम राजा जदिस्तर ने ५४८ विक्रमी में राजगढ़ी का ताज सरपर रखकर शरतूल पिसर नरेन्द्र को वजीर बनाया। कुछ अरसा के बाद उनके मा बैन निकाफ की आग मुस्तअल हो गयी। और सरदूल मारा गया। उसका बेटा सरबसेन सात साला था। वह राजा के खोफ से अपनी मां के हमराह नगरकोट में भाग गया। राजा नगर- कोट ने उसे दामादी में कबूल करके निकाह रखा। जब सिन तमीज को पहुंचा तो एक भारी लश्कर जमा करके और राजा जम्मू से इमदाद लेकर कश्मीर पर हमलावर हुआ। तुंजीन उसके मुकाविला में निकला। कोहिस्तान बनिहाल मे जंग व जदेल की आग रोशन की। तुंजीन मारा गया। उसकी हकूमत तेंतीस साल थी।
यह श्लोक कल्हण के इसी तरंग में वर्णित ९७ श्लोक से मिलता है जिसे उसने श्रेष्ठसेन के सम्बन्ध में लिखा है।