भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 756

तृतीय तरंग ५७३ जगद्विलक्षणं यस्य शङ्खमुद्राङ्कितं शिरः । अपूर्वशर्वरीशान्तर्लीनभानुश्रियं दधे ॥ ३८७ ॥ ३८७. जिसका जगद्विलक्षण शङ्ख¹ मुद्रांकित शिर (भाल) चन्द्रान्तर्लीन सूर्य की अभूत पूर्व शोभा धारण करता था । रिपुकण्ठाटवीष्वासीत् यस्य धाराधरः पतन् । तद्वधूनेत्रकुण्डैस्तु जलाधिक्यमधार्यत ॥ ३८८ ॥ ३८८. जिसका खङ्ग शत्रु कण्ठ रूपी अटवी पर पतित होता था और उनकी लल- नाओं के नेत्रकुण्ड जल बाहुल्य धारण¹ करते थे (अश्रुपूर्ण होते थे ।) अपूर्वो यत्प्रतापाग्निः प्रविश्योर्वी द्विषां न्यधात् । नारोनेत्रेषु नीरोर्मीन् मन्दिरेषु तृणाङ्कुरान् ॥ ३८९ ॥ ३८९. जिसकी अपूर्व प्रतापाग्नि शत्रु भूमि में प्रवेश कर नारी नेत्रों में जलतरंगों एवं गृहों पर तृणाङ्कुर स्थिर कर देते थे । यस्य पाणिप्रणयितां कृपाणे समुपायते । कवन्धेभ्यः परो नृत्तं न व्यधत्त द्विपद्बले ॥ ३९० ॥ ३९०. जिसके पाणि में कृपाण आ जाने पर शत्रु सेना में कवन्धों¹ के अतिरिक्त अन्य नृत्य नहीं करता था । ३८७ (१) शंख की खोल तुल्य मस्तक की नीलमत के तत तथा आनद्ध वाद्य वितत के उपमा यहाँ सुन्दरता के विचार से दी गयी है। वर्गीकरण में आ जाता है। शशि तथा शंख की उपमा उज्ज्वलता के लिये दी गयी हैं। राजा का दैवी चिह्न शंख समझा जाता है। प्रत्येक राजा तथा शूर के पास अपना शंख होता था। गीता का प्रथम अध्याय ही विभिन्न प्रकार के शंख घोषों के वर्णन से आरम्भ होता है। विष्णु भगवान् के चार हाथों में से एक हाथ में शंख दिखा कर उसे दैवी विभूतियों तथा गुणों से युक्त किया गया है। शंख की गणना सुषिर वाद्य में की गयी है। वाद्यों का वर्गीकरण—घन, वितत, तत, सुषिर में किया गया है। नीलमत पुराण में वाद्य, वादित्र तथा वाद्य भाण्ड शब्दों का प्रयोग वाद्ययन्त्रो के लिये किया गया है। कामसूत्र उन्हें आनद्ध तथा तन्त्री वाद्यों में वर्गीकरण करता है। तन्त्री वाद्य शंख का उल्लेख ऋग्वेद में नही मिलता । रामायण, महाभारत तथा पुराणो में यह रणवाद्य रूप घोष हेतु प्रयुक्त किया गया है। नीलमत में इसका दो बार उल्लेख कौमुदी महोत्सव तथा राज्याभिषेक के प्रसंग में किया गया है। (नी० 386, 816) ३८८ (१) धारण—यह शब्द यहां श्लिष्ट हैं। इसका अर्थ कृपाण तथा मेघ दोनो होता है। ३९० (१) कबन्ध—दण्डकारण्य का एक राक्षस था। इसका मस्तक इसके वक्षस्थल में था। शिरविरहित होने के कारण इसका नाम कबन्ध पड़ा था। महाभारत वनपर्व अ० २६३ तथा वाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड ५९-६७ में इसकी कथा का