भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 758, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 758

तृतीय सर्ग ५७५ भ्रमरैः शङ्कुपुच्छाद्यैः खण्ड्यमानस्य देहिनः । तदास्पदं हि विशतो दुर्लङ्घ्या पञ्चयोजनी ॥ ३६५ ॥ ३९५: भ्रमरों एवं शङ्कुपुच्छ आदि से दंशित होते देहधारियों के लिये जो उस स्थान में प्रवेश कर रहे हों-पाँच योजन मार्ग (नितान्त) दुर्लङ्घ्य था । स वज्रशङ्कुपुच्छानां धीमांस्तेषां प्रतिक्रियाम् । देहेऽवश्यपरित्याज्ये मन्वानोऽभूददुष्कराम् ॥ ३६६ ॥ ३९६. उस बुद्धिमान् ने अवश्यमेव त्याज्य देह के लिये, उन वज्र तुल्य शंकु, पुच्छ - धारियों की प्रतिक्रिया को दुष्कर नहीं माना । प्रागयोवर्मणा देहं ततो महिषचर्मणा । तेन छादयता दत्तो मृल्लेपोऽथ सगोमयः ॥ ३६७ ॥ ३९७. सर्व प्रथम उसने लोह वर्म से, तदनन्तर महिष चर्म से, देह को आच्छादित कर गोमय¹ मिश्रित मृत्तिका लेप किया । अथ भानुकरोच्छुष्कमृल्लेपाम्रेडिताङ्गकः । स लोष्ट इव संचारी प्रतस्थे क्रूरनिश्चयः ॥ ३६८ ॥ ३९८. अंग पर बारंबार किये मृत्तिका लेपको सूर्य किरणों में सुखाकर संचरणशील लोष्टवत् उस क्रूर निश्चयी ने प्रस्थान किया । सरलां सरणिं त्यक्त्वा जीवितस्पृहया समम् । गुहा तेन ततः सान्द्रतमोभीमा व्यगाहत ॥ ३९९ ॥ ३९९. तदनन्तर जीवन की आकांक्षा के साथ-साथ सरल सरणि (मार्ग) को त्यागकर उसने घने अन्धकार से भयंकर गुहा में प्रवेश किया । असंख्य भौंरो का रूप धारण कर महादैत्य का वध किया था । तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसंख्येयषट्पदम् । त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥ (११ : ५३) भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः । इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ॥ (११ : ५४) तदा तदाऽवतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ॥ ॐ ॥ (११ - ५५) दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय का विनियोग भ्रामरी का उल्लेख करता है । ॐ अस्य श्री उत्तमचरितस्य रुद्र ऋषिः महा- सरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम् सूर्यस्तत्त्वं सामवेदः स्वरूपं महासरस्वती- प्रीत्यर्थे उत्तमचरित्र पाठे विनियोगः । ३९७ (१) गोमय-आज भी ग्रामो में भौंरा काटने के स्थान पर गोबर लगा दिया जाता है । उससे दर्द तथा जलन कम हो जाती है । , पाठभेद : श्लोक संख्या ३९८ में 'म्रेडिताङ्कक' का पाठभेद 'प्रेङिताङ्ककः' तथा 'पीडिताङ्गकः' मिलता है ।