राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
तृतीय सर्ग ५७५ भ्रमरैः शङ्कुपुच्छाद्यैः खण्ड्यमानस्य देहिनः । तदास्पदं हि विशतो दुर्लङ्घ्या पञ्चयोजनी ॥ ३६५ ॥ ३९५: भ्रमरों एवं शङ्कुपुच्छ आदि से दंशित होते देहधारियों के लिये जो उस स्थान में प्रवेश कर रहे हों-पाँच योजन मार्ग (नितान्त) दुर्लङ्घ्य था । स वज्रशङ्कुपुच्छानां धीमांस्तेषां प्रतिक्रियाम् । देहेऽवश्यपरित्याज्ये मन्वानोऽभूददुष्कराम् ॥ ३६६ ॥ ३९६. उस बुद्धिमान् ने अवश्यमेव त्याज्य देह के लिये, उन वज्र तुल्य शंकु, पुच्छ - धारियों की प्रतिक्रिया को दुष्कर नहीं माना । प्रागयोवर्मणा देहं ततो महिषचर्मणा । तेन छादयता दत्तो मृल्लेपोऽथ सगोमयः ॥ ३६७ ॥ ३९७. सर्व प्रथम उसने लोह वर्म से, तदनन्तर महिष चर्म से, देह को आच्छादित कर गोमय¹ मिश्रित मृत्तिका लेप किया । अथ भानुकरोच्छुष्कमृल्लेपाम्रेडिताङ्गकः । स लोष्ट इव संचारी प्रतस्थे क्रूरनिश्चयः ॥ ३६८ ॥ ३९८. अंग पर बारंबार किये मृत्तिका लेपको सूर्य किरणों में सुखाकर संचरणशील लोष्टवत् उस क्रूर निश्चयी ने प्रस्थान किया । सरलां सरणिं त्यक्त्वा जीवितस्पृहया समम् । गुहा तेन ततः सान्द्रतमोभीमा व्यगाहत ॥ ३९९ ॥ ३९९. तदनन्तर जीवन की आकांक्षा के साथ-साथ सरल सरणि (मार्ग) को त्यागकर उसने घने अन्धकार से भयंकर गुहा में प्रवेश किया । असंख्य भौंरो का रूप धारण कर महादैत्य का वध किया था । तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसंख्येयषट्पदम् । त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥ (११ : ५३) भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः । इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ॥ (११ : ५४) तदा तदाऽवतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ॥ ॐ ॥ (११ - ५५) दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय का विनियोग भ्रामरी का उल्लेख करता है । ॐ अस्य श्री उत्तमचरितस्य रुद्र ऋषिः महा- सरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम् सूर्यस्तत्त्वं सामवेदः स्वरूपं महासरस्वती- प्रीत्यर्थे उत्तमचरित्र पाठे विनियोगः । ३९७ (१) गोमय-आज भी ग्रामो में भौंरा काटने के स्थान पर गोबर लगा दिया जाता है । उससे दर्द तथा जलन कम हो जाती है । , पाठभेद : श्लोक संख्या ३९८ में 'म्रेडिताङ्कक' का पाठभेद 'प्रेङिताङ्ककः' तथा 'पीडिताङ्गकः' मिलता है ।
५७६ राजतरगिणी अथोदतिष्ठन गर्तेभ्यो घोरा भ्रमरमण्डलाः । पक्षशब्दैः श्रुतिं घ्नन्तो मृत्युतूर्यरवैरिव ॥ ४०० ॥ ४००. मृत्यु के तूर्य ध्वनि तुल्य पक्ष शब्दों से कान को फाड़ते हुए भयंकर भ्रमर मण्डल गर्तों से निकले । ते तमुच्छुष्कमुल्लेपरेणुव्रणितलोचनाः । सहसा नाक्रमन्ते स्म प्रहरन्तोऽपि बाधितुम् ॥ ४०१ ॥ ४०१. सूखे मृत्तिका लेप कणों से व्रणित लोचन ( घायल नेत्र ) वे भ्रमर सहसा आक्र- मण न किये और प्रहार करने पर भी उसे पीड़ित न कर सके। रेणुभिर्येऽन्धितास्त्वंशः ते न्यवर्तन्त षट्पदाः । तेऽखण्डयंस्तु मृन्लेपं न्यपतन् ये नवा नवाः ॥ ४०२ ॥ ४०२. रेणुओं से अंधित नेत्र भ्रमर निवर्तित हो गये और जो नवीन-नवीन भ्रमर आये, वे मृत्तिका लेप खण्डित किये । तैः खण्ड्यमान मुचण्डैः व्रजतो योजनत्रयीम् । क्रमान्मृत्कवचं तस्य पथि संक्षयमाययौ ॥ ४०३ ॥ ४०३. तीन योजन मार्ग तय करते हुए उसका मृत्तिका-कवच प्रचण्ड उन भ्रमरों द्वारा क्रम से खण्डित होकर पथ में ही नष्ट हो गया । ततो मुहुः प्रहरतां तेषां महिषचर्मणि । घारघटघटाघोषः प्रादुरासीद्भयंकरः ॥४०४॥ ४०४. तदनन्तर पुनः महिष चर्म पर उनके प्रहार करने पर भयंकर घट घट का घोष प्रादुर्भूत हुआ। चतुर्थयोजनस्यार्धमतिक्रम्य विवेद सः । रणत्कारैर्द्विरेफांस्तान् अयोवर्माण पातिनः ॥४०५॥ ४०५. चौथे योजन का अर्धांश पार करने पर लौह वर्म पर गिरते उन भ्रमरों को झंकारों से जाना । धावंस्ततोऽतिवेगेन खण्ड्यमानेन षट्पदैः । स शस्त्रवर्मणामोचि चित्तं धैर्येण नो पुनः ॥४०६॥ ४०६. तदनन्तर वह अति वेग से दौड़ने लगा। भ्रमरों से खण्ड्यमान शस्त्र वर्म ने उसे त्याग दिया, परंतु धैर्य ने चित्त को नही त्यागा । श्लोक संख्या ४०३ में 'संक्षियन' का पाठभेद श्लोक संख्या ४०६ में 'वित्तं' का पाठभेद 'संक्षिप' मिलता है । 'चित्तं' तथा 'पुनः' का 'पुरः' मिलता है ।
तृतीय तरंग ५७७ गव्यूतिमात्रमासन्ने देवीधामनि धैर्यवान् । धुन्वन् कराभ्यां मधुपान् धावति स्म स धीरधीः ॥४०७॥ ४०७. देवी मन्दिर के गव्यूति मात्र शेष रह जाने पर धीरधी एवं धैर्यशाली वह हाथों से मधुपों (भ्रमरों) को हटाते हुए दौड़ने लगा । अथ स्नाय्वस्थिशेषाङ्गो लूनमांसः षडङ्घ्रिभिः । कराभ्यामक्षिणी रक्षन् देव्यायतनमापदत् ॥४०८॥ ४०८. अनन्तर स्नायु एवं अस्थि मात्र शेष षट्चरणों (भ्रमरों) से खण्डित मांस वाला हाथों से आँखों की रक्षा करते हुए देवी आयतन में पहुँचा । प्रशान्ते भृङ्गसंपाते प्रकाशमवलोकयत् । स देव्याः पादयोरग्रे पपातोद्भ्रान्तजीवितः ॥४०९॥ ४०९. भृंग (भ्रमर) संपात (गिरना—आक्रमण) शान्त होने पर उद्भ्रान्त जीवित (प्राण शंकित) प्रकाश देखते हुए वह देवी के चरणों के गिर पड़ा । स्तोकावशेषप्राणं तं देव्याश्वासयितुं ततः । अभिरामं वपुः कृत्वा प्रस्पर्शङ्गेषु पाणिना ॥४१०॥ ४१०. तदनन्तर देवी ने स्वल्प अवशिष्ट प्राण वाले उसे अभिराम शरीर प्रदान कर आश्वासन.हेतु, अंगों पर पाणि-स्पर्श किया । दिव्येन पाणिस्पर्शेन तेन पीयूषवर्षिणा । स क्षिप्रासादितस्वास्थ्यो दिक्षु चिक्षेप चक्षुषी ॥४११॥ ४११. उस पीयूषवर्षी दिव्य पाणि स्पर्श से वह शीघ्र ही स्वास्थ्य प्राप्त कर दिशाओं में उसने दृष्टिपात किया । प्रविष्टमात्रः प्रैक्षिष्ट सिंहविष्टरसीम्नि याम् । घोराकारां स तां देवीं तदाऽद्राक्षीन्न तां पुनः ॥४१२॥ ४१२. उस समय प्रवेश करते ही उसने सिंह विष्टरासीन घोराकृति जिस देवी को देखा, उसे पुनः नहीं देखा । ददर्श पुनरुद्यानलतावासे विलासिनीम् । स्थितां पुष्करिणीतीरे श्यामां पुष्करलोचनाम् ॥४१३॥ ४१३. (उसने) पुष्करिणी तट पर उद्यान लता गृह में विलासिनी, पुष्करलोचनी श्यामा स्त्री (षोडश वर्षीया) को स्थित देखा । ७३
५७८ राजतरंगिणी गृहीतहारमुक्तार्घा बद्ध्वा पीनस्तनाञ्जलिम् । महार्हैः कान्तिकुसुमैः यौवनेनार्चिताङ्गकाम् ॥ ४१४ ॥ ४१४. यौवन मुक्ता'हार रूपी अर्घ्य से एवं पीन स्तन रूपी कुसुमों से (जिसके) अंगों को पूजित (अर्चिता) कर रहा था। यावकाहारिणौ पादौ दधतीं कृच्छ्रचारिणौ । स्तनच्छन्नमुखं द्रष्टुं तपस्यन्ताविवाऽन्वहम् ॥ ४१५ ॥ ४१५. दुष्कर आचरणशील' उसके चरण जो कि यव के आहारी अथवा यावक² (महावर—अलक्तक—अलता) से सुन्दर थे, स्तन की ओट में स्थित मुख को देखने के लिये मानो प्रतिदिन तपस्या कर रहे थे । श्लोकसंख्या ४१४ में 'गृहीत' का 'गृहीत्वा' ; लाषी चरण मुख का दर्शन नही कर पाते थे । 'क्तार्घा' का 'क्तार्घान्' ; 'बद्ध्वा' का 'बद्धा', इसका एक भाव यह भी है—उसके अलता से एवं 'बद्ध' पाठभेद मिलता है । रंगे सुन्दर चरण जो मालूम पड़ते थे कि कठिनता से चल पाते थे और इस कामना से तपस्या कर रहे पादटिप्पणियाँ : थे कि उसका मुख जो उसके स्तनों से छिपाया ४१४ (१) यौवन : कल्हण ने अपनी उपमा का देखा जा सके । उत्कृष्ट उदाहरण उपस्थित किया है। यौवन को (२) यावक यह शब्द श्लिष्ट है। इसका उसने मुक्ताहार बनाया है; दोनों स्तनों को अंजलि दोनों अर्थ होता है। यव का आहार तथा महावर के दोनों हाथ तथा दोनों स्तन के मध्य गहरे स्थान होता है। यव का आहार कुछ व्रतों पर करने की को बद्ध अंजलि का गहरा स्थान एवं कान्ति को प्रथा कश्मीर मे थी । पुष्प बनाकर उसने अंजलि में रखकर दुर्गा की श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अर्थ अद्भुत पूजा का रूपक बाँधा है। दुर्गा को पूजा दिया है— तण्डुल की अपेक्षा मुक्ता से करना उत्तम माना Pink like new barley were her two जाता है। दोनों का वर्ण उज्ज्वल है। feet which suffered distress and were practising austerities for the sight of ४१५ (१) एक तपस्वी का चित्र चित्रित किया her face hidden by breasts' (Page 90.) गया है। यव का आहार कर किसी इष्ट की प्राप्ति स्टीन निम्नलिखित अनुवाद किया है : हेतु आचरण पूर्ण तपस्या करता है। उसी प्रकार She had feet which were most उस कामिनी के मुख दर्शन हेतु उसके चरण तपस्या charmingly (coloured) with red lac कर रहे थे। यह कवि के उत्प्रेक्षालंकार का एक (यावकाहारिणौ), which seemed to move उदाहरण है। with difficulty and which appeared daily to perform austerities in their desire to इसका एक भाव यह भी है कि उत्तुंग पयो- see her face hidden by her breasts. धर के बीच में पड़ जाने के कारण मुख के दर्शनाभि- (Page 109)
तृतीय तरंग ५७९ भास्वद्विम्बाधरां कृष्णकेशीं सितकराननाम् । हरिमध्यां शिवाकारां सर्वदेवमयीमिव१ ॥ ४१६ ॥ ४१६. रविविम्ब अधर, कृष्ण रूप केश, शशि रूप आनन, हरि रूप मध्य, शिव रूप आकृति से मानो वह सर्वदेव मयी थी२ । तां विभाव्यानवद्याङ्गीं निर्जने यौवनोर्जिताम् । निन्येऽवारितवामेन स कामेन विधेयताम् ॥ ४१७ ॥ ४१७. निर्जन में यौवन पूर्ण उस सर्वांग सुन्दरी को देखकर वह अवारित (प्रतिरोध रहित) कुटिल काम के वशीभूत हो गया । दधती रूपमाधुर्यपूरच्छन्नामधृष्यताम् । अप्सराः प्रत्यभात्तस्य सा हि चित्ते न देवता ॥ ४१८ ॥ ४१८. रूप की अत्यधिक माधुरी से पूर्ण एवं असंयत वह, उसके चित्त में (उसे) अप्सरा प्रतीत हुई न कि देवता । कृपामृदुरवादीत्तं व्यथितोऽसि चिरं पथि । मुहुः सौम्य समाश्वस्य प्रार्थ्यतामुचितो वरः ॥ ४१९ ॥ ४१९. (देवी ने) उससे कृपापूर्ण मृदुवचन कहा—'सौम्य ! मार्ग में चिरकाल कष्ट प्राप्त किये आश्वस्त होकर उचित वर की प्रार्थना करो।' स तां बभाषे शान्तो मे भवत्या दर्शनाच्छ्रमः । अदेवी किं तु भवती वरं दातुं कथं क्षमा ॥४२०॥ ४२०. वह उस (देवी) से बोला—'आपने दर्शन द्वारा मेरा श्रम शान्त कर दिया । किन्तु आप देवी नहीं है । अतएव वर प्रदान में कैसे समर्थ होंगी।' ४१६ (१) इस पद के तुल्य बाण के हर्ष चरित में पद मिलता है— 'भास्वद् बिम्बाधारेण प्रसन्नावलोकितेन चन्द्र- मुखेन कृष्णवकेशेन, वपुषा सर्वदेवावतारइव.।' ४१६ (२) इसका अर्थ सभी अनुवादको ने भिन्न भिन्न किया है । उनमें केवल भावार्थ मिलता है । कल्हण कवि के श्लोक से शरीर मात्र का दर्शन होता है । आत्मा का नहीं । उक्त अनुवाद मूल के अत्यन्त निकट है । इसमें कवि ने अद्भुत काव्य व्यञ्जना प्रकट की है । यहाँ कवि ने सूर्य, कृष्ण, राम, हरि तथा शिव सबसे निर्मित शरीर का उल्लेख किया है । उक्त श्लोक का निम्नलिखित अर्थ भी होता है । “भास्वद्विम्बाधरा, कृष्णकेशी, शितकरानना हरिमध्या, शिवाकारा वह मानों सर्वदेवमयी (सर्व देवनिर्मित ) थी ।” श्लोक का भावार्थ निम्न प्रकार से होगा : उसके अधर बिम्बतुल्य रक्तवर्ण, केश काले; आनन शशीतुल्य सुन्दर, सुन्दर कर एवं आनन, मध्य (कटि) सिंह सदृश कृश एवं आकार सुन्दर था ।” इसी प्रकार का वर्णन भवभूति के मालतीमाधव नाटक के प्रथम अंक तथा कालिदास के मेघदूत में मिलता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४१९ में 'सौम्य' का पाठभेद 'सोम्य' मिलता है ।
५८० राजतरंगिणी
देवी जगाद तं 'भद्र' कोऽयं ते' मनसि भ्रमः ।
देवी वां स्यांमदेवी वा वरीतुं त्वां तु शक्नुयाम् ॥४२१॥
४२१. देवी ने उससे कहा—"भद्र ! तुम्हारे मन में यह कैसा भ्रम हो गया है ? मैं
देवी हूं अथवा अदेवी, तुम्हें वर प्रदान में समर्थ हूं ।"
इति सोऽभीष्टसम्प्राप्तौ कारयित्वा प्रतिश्रवम् ।
दूरमुत्क्रान्तमर्यादः संगमं तामयाचत ॥ २२॥
४२२. इस प्रकार अभीष्ट सम्प्राप्ति की प्रतिज्ञा कराकर, मर्यादा हीन हो, उस देवी से
संगम की याचना की ।
तमभ्यधात्सा दुर्बुद्धे कोऽयं तेऽनुचितो विधिः ।
प्रार्थयस्वेतरद्यस्मात् साऽहं भ्रमरवासिनी ॥४२३॥
४२३. उस देवी ने उससे कहा—'दुर्बुद्धे ! तुम्हारा यह कैसा अनुचित आचरण (विधि)
है ? अपना इतर वर माँगो । क्योंकि मैं ही भ्रमरवासिनी देवी हूँ ।'
देवीं तां जानतोऽप्यस्य नाभूदद्वहितं मनः ।
निरुद्धा वासदाः केन जन्मान्तरनिबन्धनाः ॥४२४॥
४२४. उसे देवी जानकर भी उसका मन विचलित नहीं हुआ । जन्मान्तरीय वास-
नाओं' को कौन दूर कर सकता है ।
स तामुवाच सत्यां चेद्देवि स्वां गिरमिच्छसि ।
प्रमाणीकुरु मद्वार्णीमहमन्द्यन्न कामये ॥४२५॥
४२५. उसने उस देवी से कहा—'देवि ! यदि अपनी वाणी सत्य करना चाहत' हो तो
मेरी वाणी (याचना) पूरी करो । मैं दूसरी कामना नहीं करता हूँ ।'
पूर्वमेव हि जन्तूनां योऽधिवासो निलीयते ।
तिलानामिव तेषां स पर्यन्तेऽपि न शीर्यते' ॥४२६॥
४२६. प्राणियों में जो संस्कार पूर्व में स्थित हो जाते हैं, वे उनके (शारीरिक) तिलों२
के सदृश मृत्यु पर्यन्त नष्ट नहीं होते ।
पादटिप्पणियाँ :
४२४ (१) वासनाः इस पद में अधिवागा
शब्द पद ४२४ में वासना शब्द को समृद्धिश्र्
करता है ।
४२६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
८२ वाँ श्लोक है ।
(२) तिल : शरीर पर कुछ तिल जन्म-जात
होते हैं और कुछ तिल कालान्तर में बन जाते हैं ।
यह तिल त्वचा पर मृत्यु काल पर्यन्त रहते हैं । ये
नष्ट नही होते । इसी प्रकार प्राणियो का पूर्व संस्कार
उनके साथ जैसे तिल शरीर के साथ मिलकर नष्ट
नही होता उसी प्रकार सस्कार नष्ट नही होते ।
तृतीय तरंग ५८१ देवी वा भव कान्ता वा भीमा वा शोभनाऽपि वा । यादृशीं पूर्वमद्राक्षं तादृश्येवाऽवभासि मे ॥४२७॥ ४२७. 'आप देवी हों अथवा कान्ता, भयंकर हों अथवा सुन्दर, जिस प्रकार पहले देखा था, उसी प्रकार अब भी मुझे लग रही हो।' तमित्थं कथयन्तं सा ज्ञात्वा निश्चलनिश्चयम् । एवं जन्मान्तरे भावोत्यभ्यधादनुरोधतः ॥४२८॥ ४२८. इस प्रकार सानुरोध करते हुए, उसे दृढनिश्चयी जानकर उस (देवी) ने कहा—'ऐसा जन्मान्तर में होगा।' उत्सहन्ते हि संस्प्रष्टुं न दिव्या मर्त्यधर्मिणः । तद्गच्छ क्रूरसंकल्पेत्युक्त्वा सान्तर्दधे ततः ॥४२९॥ ४२९. 'दिव्य (शरीरी) मरणशील प्राणियों का स्पर्श नहीं करते हैं। अतएव हे क्रूर संकल्प ! तुम जाओ।' कहकर देवी अन्तर्ध्यान हो गयी। अशून्यजन्मा भूयासं तया देव्येति चिन्तयन् । प्रयागवटशाखाग्रादहसीत्स वपुस्ततः ॥४३०॥ ४३०. तदनन्तर 'उस देवी के साथ दिव्य जन्म की प्राप्ति होगी' ऐसा सोचते हुए उसने प्रयाग के वट¹ के शाखाग्र से शरीर त्याग कर दिया। सोऽजायत रणादित्यो रणारम्भा च सा भुवि । मर्त्यभावेऽपि या नैव जहौ जन्मान्तरस्मृतिम् ॥४३१॥ ४३१. वह पृथ्वी पर रणादित्य हुआ। वह (देवी) रणारम्भा हुई जिसने मानव योनि में भी जन्मान्तर की स्मृति नहीं त्यागी। पाठभेद : तथा पश्चिम भारत में इस वृक्ष को वड़ तथा उत्तर श्लोक संख्या ४२९ में 'सस्प्रष्टु' का पाठभेद भारत में बरगद कहते हैं। 'संस्प्रष्टु' 'दिव्या' का 'देव्यो' तथा 'धर्मिण.' का पुराणों में वर्णन मिलता है। प्रलय काल में पाठभेद 'धर्मिणाम्' मिलता है। जब सब कुछ जलमय हो जाता है उस समय श्लोक संख्या ४३० में 'स' का पाठभेद 'स्व' वट का एक वृक्ष बच जाता है। उसके एक पत्ता मिलता है। पर भगवान् बाल रूप धारण कर रहते हैं। वहां पादटिप्पणियाँ : से सृष्टि के अनादि रहस्य का अवलोकन करते हैं। यह वट प्रयाग संगम पर है। कालिदास ने रघुवंश ४३० (१) वट : 'अक्षय वट' प्रयाग में में इसका उल्लेख किया है। गंगा-यमुना संगम पर किला में है। स्वर्ग में सुख पाठभेद : की प्राप्ति से स्वतः शरीर विसर्जन का उल्लेख श्लोक संख्या ४३१ में 'नैव' का पाठभेद 'मत्रेव' हुएन्त्सांग ने किया है। (रा०त० १:२३२) दक्षिण मिलता है।
५८२ राजतरंगिणी रतिसेनाभिधश्चोलराजः सज्जॊऽब्धिपूजने । तां तरङ्गान्तरान्लेभे रत्नराजिमिवोज्ज्वलाम् ॥४३२॥ ४३२. समुद्र पूजन में लग्न चोलराज १ रतिसेन ने तरंगमध्य से उज्ज्वल रत्नराशि तुल्य उसे प्राप्त किया था । आ बाल्याद्व्यक्तदिव्योक्तिं तामलंकृतयौवनाम् । दिव्यार्हां पृथिवीशेभ्यो नार्थिभ्योऽपि ददौ नृपः ॥४३३॥ ४३३. बाल्यपन से ही दिव्य लक्षणों से युक्त एवं यौवन से अलंकृत करते उस दिव्या- र्हा (दिव्य पुरुष के योग्य) को नृपति ने प्रार्थी पृथिवीशों (राजाओं) को भी नहीं प्रदान किया । रणादित्यनृपामात्ये दूत्यायाते तथैव तम् । प्रत्याख्यानेच्छुमाचख्यौ सैव तद्वरणं वरम् ॥४३४॥ ४३४. राजा रणादित्य के दूतरूप में आये अमात्य को भी पूर्ववत्-प्रत्याख्यान के लिए इच्छुक (पिता से) उसने (कन्या ने) ही उसी का वरण श्रेष्ठ कहा । तदर्थमेव कथितस्वोत्पत्तिं तां ततः पिता । द्रुतं कुलूतभर्तुः सुहृदः प्राहिणोद् गृहम् ॥४३५॥ ४३५. उसी के निमित्त अपनी उत्पत्ति कहने पर पिता ने उस (कन्या) को१ शीघ्र ही सुहृद् कुलूत पति२ के गृह प्रेषित कर दिया । प्रहृष्टोऽविप्रकृष्टं तं देशं गत्वा व्यधत्त ताम् । परिणीय रणादित्यः शुद्धान्तस्याधिदेवताम् ॥४३६॥ ४३६. दूरस्थ उस देश में बिना गये ही प्रसन्न रणादित्य ने उसे परिणीत कर अन्तः- पुर में (अधिदेवता) प्रधान रानी बना दिया । पादटिप्पणियाँ : वैवाहिक सम्बन्ध था । शशि शेखर तथा राजाधिराज ४३२ (१) चोल : पाद टिप्पणी त० १ : चोल का विवाह कश्मीर की राजकन्याओं से ३०० पृष्ठ द्रष्टव्य है । हुआ था । पादटिप्पणियाँ : (२) कुलूत : यह हिमाचल प्रदेश कुल्लू प्रदेश के लिये आया है जो व्यास किंवा विपाशा ४३५ (१) कन्या : दक्षिण में एक आख्यायिका नदी का ऊर्ध्वभाग स्थित भूखण्ड है । बृहद् संहिता प्रचलित है । चोलराज तथा कश्मीरराज में से भी यही बात स्पष्ट होती है ।
तृतीय तरंग ५८३ मर्त्यसंस्पर्शभीरुः सा महादेवीभवन्त्यपि । तं मायया मोहयन्ती न पस्पर्श कदाचन ॥४३७॥ ४३७. मनुष्य स्पर्श से भीरु वह राजपत्नी होती हुई भी, उसे माया मोहित कर, उसका कभी स्पर्श नहीं किया । व्यधान्मायामयीं राज्ञस्तल्पे स्वसदृशीं स्त्रियम् । स्वयं सा भ्रमरीरूपा निर्जगाम वहिर्निशि ॥४३८॥ ४३८. राजा के तल्प पर अपनी तरह मायामयी स्त्री बना देती थी और भ्रमर रूपा वह स्वयं रात्रि में बाहर चला जाती थी । स नाम्ना स्वस्य देव्याश्च कृत्वा सुरगृहद्वयम् । माहेश्वरः शैललिङ्गे कारयामास कारुभिः ॥४३९॥ ४३९. उसने अपने और देवी (रानी) के नाम से दो देव मन्दिर निर्मित करा, शिल्पियों द्वारा शैल लिंग१ पर माहेश्वर२ (शिव) बनवाया । श्वः प्रतिष्ठाप्रसङ्गेऽथ सज्जे तल्लिङ्गयोर्द्वयम् । देशान्तरागतः कश्चित् दूषयामास दैववित् ॥४४०॥ ४४०. दूसरे दिन प्रतिष्ठा अवसर पर देशान्तर से आये किसी दैवविद् से (ज्योतिषी) ने उन दोनों लिंगों को दोष पूर्ण कहा— स दृष्टप्रत्ययः शश्वत् तयोर्घटितलिङ्गयोः । अश्मखण्डैः समण्डूकैः बभाषे गर्भमावृतम् ॥४४१॥ ४४१. शश्वत् दृष्ट प्रत्यय उसने कहा-'निर्मित उन दोनों लिंगों का गर्भ मण्डूक सहित अश्म खण्डों से आवृत है।
[पादटिप्पणियाँ एवं पाठभेद - बायाँ स्तम्भ] पाठभेद : श्लोक संख्या ४३९ में 'स' का 'स्व', 'सुर' का 'स्वर', 'पर' एवं 'माहेश्वरः' का पाठभेद 'माहेश्वरे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४३९ (१) शैल लिंग : इसका अर्थ होता है कि विशाल पाषाण खण्ड पर शिव लिंग का निर्माण कराया । (२) माहेश्वर : वायुपुराण (अ० २३) तथा लिंग पुराण (अ० २४) में एक कथा वर्णित है । उसके अनुसार माहेश्वर ने ब्रह्म देव से कहा था कि युगों के अठाईसवें प्रत्यावर्तन में कृष्ण द्वैपायन के समय जब व्यासदेव जन्म लेंगे तब
[पादटिप्पणियाँ एवं पाठभेद - दायाँ स्तम्भ] वे श्मशान में पड़े हुए एक मृत शरीर में प्रविष्ट होकर 'सकुलिन्' नामक ब्रह्मचारी के रूप में अवतार लेंगे। यह घटना कायावतार किंवा काया- रोहण में घटित होगी । उनके चार शिष्य (१) कुशिक (२) गर्ग (३) मित्र और (४) कौरुष्य होंगे । अन्त में पाशुपत शरीर में भस्म लगाकर माहेश्वर योग करते रुद्र लोक में जायेंगे । माहेश्वर नाम अति प्राचीन है । विम कदफिसस और वलभी वंश के राजा स्वयं को महेश्वर कहते थे । ह्वेनत्सांग ने माहेश्वर मन्दिरो का उल्लेख किया है। उनमें पाशुपत पूजा करते थे । मध्य भारत में माहेश्वर तीर्थ है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४४१ में 'शश्वत्' का ...
५८२ राजतरंगिणी रतिसेनामिधश्चोलराजः सज्जोऽब्धिपूजने । तां तरङ्गान्तरान्लेभे रत्नराजिमिवोज्जलाम् ॥४३२॥ ४३२. समुद्र पूजन में लग्न चोलराज¹ रतिसेन ने तरङ्गमध्य से उज्ज्वल रत्नराशि तुल्य उसे प्राप्त किया था । आ बाल्याद्व्यक्तदिव्योक्तिं तामलंकृतयौवनाम् । दिव्यार्हा पृथिवीशेभ्यो नार्थिभ्योऽपि ददौ नृपः ॥४३३॥ ४३३. बाल्यपन से ही दिव्य लक्षणों से युक्त एवं यौवन से अलंकृत करते उस दिव्या- र्हा (दिव्य पुरुष के योग्य) को नृपति ने प्रार्थी पृथिवीशों (राजाओं) को भी नहीं प्रदान किया। रणादित्यनृपामात्ये दूत्यायाते तथैव तम् । प्रत्याख्यानेच्छुमाचख्यौ सैव तद्वरणं वरम् ॥४३४॥ ४३४. राजा रणादित्य के दूतरूप में आये अमात्य को भी पूर्ववत् प्रत्याख्यान के लिए इच्छुक (पिता से) उसने (कन्या ने) ही उसी का वरण श्रेष्ठ कहा। तदर्थमेव कथितस्वोत्पत्तिं तां ततः पिता । द्रुतं कुलूतभर्तुः सुहृदः प्राहिणोद् गृहम् ॥४३५॥ ४३५. उसी के निमित्त अपनी उत्पत्ति कहने पर पिता ने उस (कन्या) को¹ शीघ्र ही सुहृद् कुलूत पति² के गृह प्रेषित कर दिया । प्रहृष्टोऽविप्रकृष्टं तं देशं गत्वा न्यधत्त ताम् । परिणीय रणादित्यः शुद्धान्तस्याधिदेवताम् ॥४३६॥ ४३६. दूरस्थ उस देश में बिना गये ही प्रसन्न रणादित्य ने उसे परिणीत कर अन्तः- पुर में (अधिदेवता) प्रधान रानी बना दिया । पादटिप्पणियाँ : वैवाहिक सम्बन्ध था । शशि शेखर तथा राजाधिराज ४३२ (१) चोल : पाद टिप्पणी त० १ : चोल का विवाह कश्मीर की राजकन्याओं से १०० पृष्ठ द्रष्टव्य है । हुआ था । पादटिप्पणियाँ : (२) कुलूत : यह हिमाचल प्रदेश कुल्लू ४३५ (१) कन्या : दक्षिण में एक आख्यायिका प्रदेश के लिये आया है जो ब्यास किंवा विपासा प्रचलित है । चोलराज तथा कश्मीरराज में नदी का ऊर्ध्वभाग स्थित भूखण्ड है । बृहद् संहिता से भी यही बात स्पष्ट होती है ।
तृतीय तरंग ५८३ मर्त्यसंस्पर्शभीरुः सा महादेवीभवन्त्यपि । तं मायया मोहयन्ती न पस्पर्श कदाचन ॥४३७॥ ४३७. मनुष्य स्पर्श से भीरु वह राजपत्नी होती हुई भी, उसे माया मोहित कर, उसका कभी स्पर्श नहीं किया । व्यधान्मायामयीं राज्ञस्तल्पे स्वसदृशीं स्त्रियम् । स्वयं सा भ्रमरीरूपा निर्जगाम वहिर्निशि ॥४३८॥ ४३८. राजा के तल्प पर अपनी तरह मायामयी स्त्री बना देती थी और भ्रमर रूपा यह स्वयं रात्रि में बाहर चला जाती थी । स नाम्ना स्वस्य देव्याश्च कृत्वा सुरगृहद्वयम् । माहेश्वरः शैललिङ्गे कारयामास कारुभिः ॥४३९॥ ४३९. उसने अपने और देवी (रानी) के नाम से दो देव मन्दिर निर्मित करा, शिल्पियों द्वारा शैल लिंग१ पर माहेश्वर२ (शिव) बनवाया । श्वः प्रतिष्ठाप्रसङ्गेऽथ सज्जे तल्लिङ्गयोर्द्वयम् । देशान्तरागतः कश्चित् दूषयामास दैववित् ॥४४०॥ ४४०. दूसरे दिन प्रतिष्ठा अवसर पर देशान्तर से आये किसी दैवविद् से (ज्योतिषी) ने उन दोनों लिंगों को दोष पूर्ण कहा— स दृष्टप्रत्ययः शश्वत् तयोर्घटितलिङ्गयोः । अश्मखण्डैः समण्डूकैः बभाषे गर्भमावृतम् ॥४४१॥ ४४१. शश्वत् दृष्ट प्रत्यय उसने कहा—'निर्मित उन दोनों लिंगों का गर्भ मण्डूक सहित अश्म खण्डों से आवृत है। पाठभेद : श्लोक संख्या ४३९ में 'स' का 'स्व', 'सुर' का 'स्वर', 'पर' एवं 'माहेश्वरः' का पाठभेद 'माहेश्वरे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४३९ (१) शैल लिंग : इसका अर्थ होता है कि विशाल पाषाण खण्ड पर शिव लिंग का निर्माण कराया । (२) माहेश्वर : वायुपुराण (अ० २३) तथा लिंग पुराण (अ० २४) में एक कथा वर्णित है। उसके अनुसार माहेश्वर ने ब्रह्मा देव से कहा था कि युगों के अठाईसवें प्रत्यावर्तन में कृष्ण द्वैपायन के समय जब वासुदेव जन्म लेंगे तब वे श्मशान में पड़े हुए एक मृत शरीर में प्रविष्ट होकर 'लकुलिन्' नामक ब्रह्मचारी के रूप में अवतार लेंगे। यह घटना कायावतार किंवा काया- रोहण में घटित होगी। उनके चार शिष्य (१) कुशिक (२) गर्ग (३) मित्र और (४) कौरुष्य होंगे । अन्त में पाशुपत शरीर में भस्म लगाकर माहेश्वर योग करते रुद्र लोक में जायेंगे । माहेश्वर नाम अति प्राचीन है। विम कदफिसस और वलभी वंश के राजा स्वयं को महेश्वर कहते थे । ह्वेनत्सांग ने माहेश्वर मन्दिरों का उल्लेख किया है। उनमें पाशुपत पूजा करते थे । मध्य भारत में माहेश्वर तीर्थ है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४४१ में 'अश्म' का पाठभेद
५८४ राजतरंगिणी किंर्त्तव्यंतया मूढं प्रतिष्ठांविघ्नविह्वलम् । दिव्यदृष्टिः स्वयं देवी ततो राजानमंब्रवीत् ॥४४२॥ ४४२. किंकर्तव्य विमूढ एवं प्रतिष्ठा के विघ्न 'से विह्वल राजा से दिव्य दृष्टि स्वयं देवी ने कहा— राजन्गिरिसुतोद्वाहे पौरोहित्यं पुरा भजन् । स्वमर्चादेवमादत्त पूजाभाण्डात्प्रजापतिः ॥४४३॥ ४४३. 'राजन् ! प्राचीन काल में गिरिसुता परिणय में पौरोहित्य कर्म करते प्रजापति ने पूजा पात्र से अपने अर्चा देव को लिया । तां विष्णोः प्रतिमां वीक्ष्य पूजितां तेन धूर्जटिः । शून्यामिव तदा मेने शक्तिरूपां विना शिवम् ॥४४४॥ ४४४. 'उन (ब्रह्मा) से पूजित शक्ति रूपा उस विष्णु' प्रतिमा को शिव रहित देख कर धूर्जटी (शिव) ने शून्य (अनुपयोगी) माना । निमन्त्रितैर्ढौकितानि रत्नान्यथ सुरासुरैः । पिण्डीकृत्य स्वयं चक्रे लिङ्गं भुवनवन्दितम् ॥४४५॥ ४४५. 'निमन्त्रित सुरों एवं असुरों द्वारा प्रदत्त रत्नों को एक में (पिण्डी कृत) करके स्वयं भुवन वन्दित लिंग निर्मित किया । 'अश्व' मिलता है । दिया था । पादटिप्पणियां : पूर्वकाल में पार्वती कृष्ण वर्ण की थी । ४४२ (१) विघ्न : किसी प्रकार शुभ, अमरकेश्वर तीर्थ में स्नान कर इन्होंने शिव को पवित्र, तथा यात्रादि में किसी प्रकार का अवरोध दीप दान किया था । उसके पश्चात् वह गौर वर्ण उत्पन्न करना, उसमें अड़ंगा लगाना, उसके नष्ट हो गयी थी । करने की चेष्टा करना विघ्न कहा जाता है। पर्वत की कन्या होने के कारण नाम पार्वती धार्मिक कृत्यों में यदि विघ्न पड़ता है तो समझा पड़ा था । पर्वतों की अधिष्ठात्री देवी होने के जाता है कि क्रिया करने वाले का अनिष्ट होगा । कारण भी नाम पार्वती पड़ा था । यह नृत्यों में पाठभेद : लास्य नृत्य की प्रवर्तिका मानी जाती हैं । श्लोक संख्या ४४३ में 'स्वमर्चादेवमादत्त' का पाठभेद : 'तद्योर्हेशमादित्य' तथा 'दत्त' का पाठभेद 'धत्त' श्लोक संख्या ४४४ में 'शून्यामिव' का पाठभेद मिलता है । 'शून्यामेव' मिलता है । पादटिप्पणियां : पादटिप्पणियां ; ४४३ (१) गिरिसुता : हिमालय तथा मेना ४४४ (१) शक्तिरूपा विष्णो : वायुपुराण की कन्या पार्वती थी । नारद के सुझाव पर २५ : २३ तथा कूर्म पुराण २ : ४ के अनुसार विष्णु हिमालय ने पार्वती का विवाह शिव के साथ कर भगवान् शिव शक्ति की मूर्ति माने जाते हैं ।
तृतीय तरंग ४८५ तां विष्णुप्रतिमां तच्च लिङ्गमीशानपूजितम् । स्वयं प्रजासृजः पूज्यं कालेनादत्त रावणः ॥४४६॥ ४४६. 'स्वयं प्रजापति का पूज्य (एवं) ईशान पूजित उस लिंग तथा उस विष्णु प्रतिमा को समय से रावण ने प्राप्त किया । तेनाप्यभ्यर्च्यमानं तत् लङ्कायामभवच्चिरम् । देवद्वयं रावणान्ते नीतमासीच्च वानरैः ॥४४७॥ ४४७. 'लंका में वह (लिंग) चिरकाल तक उससे पूजित हुआ। रावण के पश्चात् वानरों ने देव-द्वय (दोनों लिंगों) को ले लिया । तिर्यक्तया ते कपयो मुग्धा हिमनगौकसः । शान्तौत्सुक्या शनैः देवौ न्यधुरुत्तरमानसे ॥४४८॥ ४४८. 'हिमालय निवासी उन मुग्ध कपियों ने (तिर्यक) पशु स्वभाव के कारण उत्सुकता समाप्त हो जाने पर दोनों देवों को उत्तर मानस' में रख दिया । पाठभेद : सर्वपापविनिर्मुक्तो वारुणं लोकमश्नुते । श्लोकसंख्या ४४८ में 'हिमनगौकसः' का मानसस्योत्तरे कूले महापद्मजलाशये ॥ 'हिमानसौकसः' तथा 'देवौ' का पाठभेद 'देव्यौ' 1005 = ११७६ मिलता है । * * * पादटिप्पणियाँ : तत्र संस्थापयन्तिस्म ज्येष्ठेशं ते सदैव तु । ४४८ (१) उत्तरमानस : कश्मीर में उत्तर अहन्न् दिव्येन तोयेन शुभेनोत्तरमानसम् ॥1112 मानस गंग बल को कहते है । हरमुख पर्वत की = १३१२-१३१३ पूर्वोव हिमानी के अधोभाग में वह सरोवर * * * स्थित है। हरमुकुट माहात्म्य तथा हरचरित तेषां तपःप्रभावेण भक्त्या च मम पार्षद । चिन्तामणि (४:८७) से भी यह बात प्रमाणित होती सोदरस्य च नागस्य स्नानं कृत्वा विधानतः ॥ है । 'नीलमत पुराण (श्लोक ९१०, ९९०, तथा 1113 = १३१३-१३१४ १२६३) में भी इसका उल्लेख है । पृष्ठ १०० भी * * * द्रष्टव्य है । मृत्युं विसर्जयामास सान्त्वयित्वा सुरारिहा । उत्तर मानस से नीचे एक दूसरा सर है नन्दिनं च समादाय दृष्ट्वा चोत्तरमानसम् ॥ उसमे भी जल हिमानी अर्थात् ग्लेसियर से आता 1117 = १३२० है। इसे गुन्द कोल कहते हैं । प्राचीन नाम × × × कालोदक है । नन्दिसर भी कहा जाता है । हर- उत्तरे मानसे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । चरित चिन्तामणि तथा नीलमत पुराण में इसका पितरस्तर्पितास्तत्र कामान्यच्छन्त्यभीप्सितान् ॥ उल्लेख मिलता है : 1241 = १४५४ १४५५ नारायणो निरुद्धश्च वासुदेवो जलान्धसः । महाभारत अनुशासनपर्व में कालोदक, नन्दिकुण्ड, पात्रश्च मानसश्चैव तथैवोत्तरमानसः ॥ नन्दीश्वर तीर्थों का इतना सुन्दर वर्णन मिलता है . 890 = १०६० ७४
५८६ राजतरंगिणी प्रागेव सरसस्तस्मात्कुशलैः शिल्पिभिर्मया । तावुद्धृतौ प्रातरत्र प्राप्तौ द्रक्ष्यस्यसंशयम् ॥४४९॥ ४४९. 'मैंने पहले ही उस सरोवर से कुशल शिल्पियों द्वारा उन दोनों को निकलवा लिया है। निश्चय ही प्रातः यहाँ देखोगे। तयोः प्रतिष्ठा क्रियतामित्युक्त्वा पृथिवीभुजम् । देवी प्रयाता शुद्धान्तं सिद्धान्सस्मार खेचरान् ॥४५०॥ ४५०. उन दोनों की प्रतिष्ठा करें।' इस प्रकार पृथिवीपति से कह कर देवी शुद्धान्त (अन्तःपुर) में गयी और सिद्ध खेचरों' (आकाशचारी) का स्मरण किया। ते ध्यातमात्राः संप्राप्ता देव्यादेशेन पाथसः । उद्धृत्य नृपतेर्धाम्नि देवौ हरिहरौ न्यधुः ॥४५१॥ ४५१. ध्यान करते ही, वे उपस्थित हो गये और देवी के आदेश से जल से निकालकर, हरि-हर दे को नृप धाम में लाये। दिव्यैः प्रसूनैः संवीतौ हरनारायणौ जनः । प्रातर्नृपगृहे दृष्ट्वा परं विस्मयमाययौ ॥४५२॥ ४५२. दिव्य प्रसूनों से संवीत (आच्छादित) हर तथा रि को प्रातः राजगृह में देखकर लोग अत्यन्त विस्मित हुए। सज्जे प्रतिष्ठालग्नेऽथ माहेश्वरतया नृपः । रणेश्वरप्रतिष्ठायां पूर्वं यावत्समुद्यतः ॥४५३॥ ४५३. माहेश्वर होने के कारण नृप प्रतिष्ठा सज्ज (उपस्थित) होने पर पहले रणेश्वर की प्रतिष्ठा हेतु जबतक उद्यत हो रहा था —
कि प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने स्वयं वहाँ नन्दीश्वर की मूर्ति का दर्शन करके कश्मीर जाकर अपनी आँखों से इन तीर्थों को मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। स्वर्गमार्ग में देखा था। स्नान करने पर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम् । पाठभेद : अभ्येत्य योजनशताद् भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥२५:६० श्लोक संख्या ४४९ में 'द्धृतौ' का पाठभेद 'द्यतो' मिलता है। × × × श्लोक संख्या ४५१ में 'न्यधुः' का पाठभेद नन्दीश्वरस्य मूर्तिं तु दृष्ट्वा मुच्येत किल्बिषैः । यधुः' मिलता है। स्वर्गमार्गे नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥२५:६० श्लोक संख्या ४५३ में 'लग्ने' का पाठभेद सौ योजन दूरसे आकर कालोदक, नन्दि कुण्ड 'लिङ्गे' मिलते हैं। तथा उत्तरमानम तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य पादटिप्पणियाँ : यदि भ्रूण हत्या भी किया हो तो वह पाप मुक्त श्री स्टीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित हो जाते हैं। एवं अन्य अनुवादको ने श्लोक संख्या ४५३ तथा
तृतीय तरंग ५८७ रणारम्भानुभावेन तावदेवाद्भुतावहः । स्वयं पीठे रणस्वामी भित्त्वा यन्त्रमुपाविशत् ॥४५४॥ ४५४. तब तक रणारम्भा के प्रभाव से विस्मय करने वाले स्वयं रण स्वामी१ यन्त्र भेदन कर पीठ पर बैठ गये ।
४५४ का अनुवाद एक ही साथ किया है। परन्तु दोनो श्लोको को युग्मक श्री कल्हण ने नही लिखा है अतएव उसी का अनुकरण कर यहाँ दोनो का अनुवाद अलग अलग दिया गया है ।
४५३ (१) रणेश्वर : यह देवस्थान श्रीनगर में अथवा उसके समीप था । रणस्वामी से दूर नहीं था वे एक दूसरे के समीप थे । रणेश किंवा रणेश्वर का पुनः उल्लेख कल्हण ने नहीं किया है । यह मन्दिर कहाँ था इसका निश्चयात्मक पता नहीं चलता ।
श्री आनन्द कौल इस मन्दिर के सम्बन्ध में श्री स्टीन के मत का उल्लेख करते हैं। वह रणेश्वर के मन्दिर के विषय में इतना कहते हैं कि विचार नाग से दो मिल दक्षिण रणेश्वर का मन्दिर रणादित्य ने निर्माण कराया था । उनके मत से इस मन्दिर के लिये मदनी साहब की ज़ियारत की गवेषणा करनी चाहिए ।
४५४ ( १ ) रणस्वामी : यह मन्दिर श्री- नगर में अथवा उसके और रणेश्वर के समीप स्थित था । रणस्वामी का देवस्थान अधिक प्रसिद्ध मालूम होता है । इस स्थान का पता अन्य उल्लेखों से लगाया जा सकता है । तरंग ५ : ३९४ में इसका पुनः उल्लेख चक्रवर्मा की रानी का माघ मास में यहाँ आनेका मिलता है। यह समय कश्मीर उपत्यका में भयंकर तुषारपात होता है । इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस देवस्थान का मार्ग अत्यधिक तुषार पात के समय भी सुगम तथा सरल रहा होगा ।
मंख ने श्रीकंठचरित ( ३:६८ ) में वर्णन किया है कि उसके पिता इस मन्दिर में पूजा करने के लिये जाया करते थे। श्री जोनराज ने भी इस के सम्बन्ध में लिखा है—‘श्री प्रवरपुर प्रधान देवता’ श्रीप्रवरपुर का अर्थ श्रीनगर है। श्रीनगर के प्रधान देवता का श्रीनगर मे होना स्वाभाविक प्रतीत होता है ।
जोनराज ने अपनी राजतरंगिणी में लिखा है (श्लोक ८७२) कि बड़शाह जैनुल आबदीन ने 'जैन गंगा' नहर को अपने नवीन नगर जैन नगरी में रण स्वामी तक बनवाकर ले आया था ।
जोनराज के वर्णन ( ८७० ) से प्रतीत होता है कि जैन नगरी प्रद्युम्न नगरी ( हर पर्वत ) तथा अमरेशपुर ( अम्बरहर तरंग १:२८७ ) उसकी अन्तिम सीमा थी । इससे प्रतीत होता है कि जैन गंगा ही वर्तमान नहर लछम कुल अर्थात् लक्ष्मण कुल्या है। यह नहर सिन्धु नदी से जल अम्बरहर से होती नौशहर तथा संगीन दरवाजा तक पानी लाती है । हरपर्वत के पश्चिम तरफ संगीन दरवाजा है । यह नहर दक्षिण दिशा की ओर चलती जामा मसजिद तक जाती है मार नहर में कादी कदल पुल के पास मिल जाती है ।
जोनराज ने अपनी तरंगिणी सन् १४४६— १४५९ ई० में लिखी थी । जैनुल आबदीन के समय लछमकल यह वही है जिसे जोनराज ने देखा था । श्री स्टीन का मत है कि रणस्वामी का मन्दिर मार तथा लछम कुल नहर के कोने पर टूटा पड़ा मन्दिर है । यह अब तक इसलिये वर्तमान है कि मुसलमानों ने इस मन्दिर को ज़ियारत पीर हाजी मुहम्मद साहेब में परिवर्तित कर लिया है ।
४६८ राजतरंगिणी कर्तुं प्रभावजिज्ञासां राज्ञा दत्तधनस्ततः । सं स्वयंभूः स्वयं भक्तैः तांस्तान्ग्रामानदापयत् ॥४५५॥ ४५५. प्रभाव के जिज्ञासा हेतु उन्हें धन अर्पित किया। तदनन्तर स्वयं उन स्वयंभू ने भक्तों को तत्तत् ग्राम प्रदात कराया। कुम्भदासत्या छन्नः सिद्धो ब्रह्मभिधो वसन् । परिज्ञाय तयोर्देव्या प्रतिष्ठाकर्म कारितः ॥४५६॥ ४५६. कुम्भदास' (जल लाने वाला) के रूप में छिपकर रहते हुए ब्रह्म नामक सिद्ध को जान कर रानी ने उसके द्वारा दोनों (मूर्तियों) का प्रतिष्ठा कर्म कराया। स वृत्तप्रत्यभिज्ञः सन्प्रतिष्ठाप्य रणेश्वरम् । व्योम्ना व्रजन् रणस्वामिप्रतिष्ठां गूढमादधे ॥४५७॥ ४५७. रणेश्वर की प्रतिष्ठा करके परिचय ज्ञात हो जाने पर आकाश से जाते हुए रण स्वामी की प्रतिष्ठा गुप्त रूप से की। दीवालों के अतिरिक्त जो अष्टकोणीय कक्षा पर बनी है तथा दो सीढ़ियां जो इसके दोनो द्वारों पर गयी हैं। मन्दिर के प्रांगण के प्राकार की दीवारें भी आज तक खड़ी हैं। किसी का ध्यान इस ओर नही गया है। कश्मीर के पुरातत्व के कागजों में भी इसका उल्लेख नही किया गया है। श्री स्टीन ने एक दूसरा विकल्प भी दिया है। वे कहते हैं— लछम कुल प्राचीन समय में यदि ओर उत्तर दिशा में उस शाखा में मिली होती जो डल लेक में जाकर कूट कदल के पास जाकर मिल जाती है तो रणस्वामी के मन्दिर का ध्वंन्सावशेष संगीन दरवाजा के उत्तरौद भाग में मादिन साहब की मसजिद में बिखरे प्राचीन मन्दिरो के ध्वंसावशेष में खोजना होगा। श्री पण्डित साहेबराम ने अपने तीर्थों में केवल इतना ही लिखा है। रणस्वामी का मन्दिर हर पर्वत के पश्चिम में था। उन्होंने कोई निश्चित स्थान नहीं बताया है। 'पाठभेद' श्लोक संख्या ४५५ में 'भक्तै' का पाठभेद 'मरुता' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४५५ (१) स्वयंभू : यह मानव निर्मित प्रतिमा तथा स्थान नही होता था अपितु स्वयं प्रजापति का कर्तृत्व समझा जाता था। रा. तं. १ : ३४, पृष्ठ ७३ द्रष्टव्य है। श्री स्टीन, श्री रणजीत सीताराम पण्डित एवं अन्य अनुवादकों ने श्लोक संख्या ४५६-४५८ का एक ही साथ अनुवाद 'तिलकम्' के रूप में किया है। किन्तु श्री कल्हण ने उन्हें 'तिलकम्' नहीं लिखा है। अतएव उनका अनुवाद अलग अलग किया गया है। ४५६ (१) कुम्भदास : कुम्भकार का अर्थ कुम्हार होता है। अर्थात् घड़ा बनाने वाले का नाम कुम्भकार होता है। कुम्भ दास का अर्थ होगा कुम्भ-घड़ा का दास। यह शब्द यहाँ पर कर्म का बोधक है। कुम्भ की सेवा का तात्पर्य कुम्भ से जल ले जाना ही हो सकता है। वाटर पाइप लगने के पूर्व कश्मीरी हिन्दू ब्राह्मणो के घर में क्षत्रिय तथा उनकी स्त्रियां घड़ों अर्थात् कुम्भ से जल भरती थी। वे मासिक पारिश्रामिक पाती थी। पुरुष जल भरने वाले को कुम्भदास तथा जल भरने वाली स्त्री को कुम्भदासी कहा जाता था। कल्हण ने कुम्भदासी का पुनः उल्लेख त० ८ : १७३६ में किया है।
: तृतीय तरंग ५८९ जनास्त्वलखयन् यत्स स्वयं पीठमवातरत् । इति केषामपि हृदि प्रवादोऽद्यापि वर्तते ॥४५८॥ ४५८. लोगों ने देखा कि वे स्वयं पीठ पर अवतरित हुए-यह प्रवाद आज भी किसी-किसी के हृदय में (स्थित) है। सा ब्रह्मप्रतिमं सिद्धं देवी ब्रह्मविदां वरम् । अकारयत्समुद्दिश्य परार्ध्यं ब्रह्ममण्डपम् ॥४५६॥ ४५९. ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मप्रतिम उस सिद्ध को उद्देश्य कर उस देवी ने बहुमूल्य ब्रह्म मण्डप निर्मित कराया । रणारम्भास्वामिदेवौ दंपत्तिभ्यां व्यधीयत । मठः पाशुपतानां च ताभ्यां प्रद्युम्नमूर्धनि ॥४६०॥ ४६०. रणारम्भा स्वामी एवं रणारम्भादेव को दम्पति ने बनवाया । प्रद्युम्न मूर्धा (शिखर) पर पाशुपतों के लिये मठ निर्मित कराया । पाठभेद : जोड़ा है । प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध थे । श्लोक संख्या ४५८ में 'प्रवादो' का पाठभेद इस पर्वत के पूर्वीय ढाल पर बहुत पैमाने में 'प्रवचो' मिलता है । फैली मुसलिम जियारतें मुरुद्दम साहित्य तथा श्लोकसंख्या ४५९ में 'परार्ध्य' का 'परार्द्धं' आखूनमुल्ला शाह की है । यह सब प्राचीन मन्दिर तथा 'मण्डपम्' का पाठभेद 'सत्तमम्' मिलता है । मठो तथा विहारों के स्थानों पर बनी है। यद्यपि श्लोकसंख्या ४६० में 'देवो' का 'देवी' रणस्वामी एवं रणेश्वर के मन्दिरों की तरह यह 'दम्पतिभ्यां' का 'दम्पतीभ्यां' तथा 'प्रद्युम्नमूर्धनि' भी समीप ही स्थित है परन्तु निश्चयात्मक रूप से का पाठभेद 'शारिकागिरौ' मिलता है । नहीं कहा जा सकता कि वे रणस्वामी एवं रणेश्वर पादटिप्पणियाँ : के ही स्थान थे । पता नहीं जब मैने इस स्थानों ४६० (१) प्रद्युम्न मूर्धा: प्रद्युम्न मूर्धा किंवा को देखा तो भावुकतावश यह धारणा हो गयी कि शिखर हर अथवा शारिका पर्वत के लिये प्रयुक्त रणस्वामी तथा रणेश्वर के ध्वन्सावशेष यही थे । किया गया है। इसे हर पर्वत भी कहते हैं। परन्तु वह मेरे मन का भ्रम ही हो सकता है । इसका उल्लेख प्रद्युम्न पीठ, प्रद्युम्न गिरि, तथा इसका कोई प्रमाण नहीं प्रतीत होता । किन्तु न प्रद्युम्नशिखर नाम से किया गया है (त. ७:१६- जाने वहाँ आनेपर मुझे क्यों हार्दिक सन्ताप जैसा १६; विक्रमांक देव चरित, विल्हण ; १८।१५; हुआ । मन रोने लगा । आंखो के सम्मुख जोनराज; ५८७, ८७०; श्रीवर १:६३१, २:८८, जैसे मूर्तियां थाने लगीं। मुझे अच्छी तरह स्मरण तथा महादेव माहात्म्य २।७)। है मूर्तियों के मुख से करुणा जैसे झलक रही थी । सोमदेव ने कथासरित्सागर (७३:१०९) में वे कह रही थीं-क्या था ? क्या होगया ? मै उस इस पर्वत को उषा और अनिरुद्ध की प्रेम कथा से समय के अपने भाव को व्यक्त करने में सर्वथा असमर्थ पाता हूँ।
५९० राजतरंगिणी आरोग्यशाला निरघाऽप्युल्लाघत्वाय रोगिणाम् । तेन सेनामुखीदेवीभयशान्त्यै च कारिता ॥४६१॥ ४६१. उसने रोगियों के आरोग्य एवं सेनामुखी देवी के भय शान्ति हेतु सुन्दर आरोग्यशाला' स्थापित किया । नीलमत पुराण में प्रद्युम्न नाग का उल्लेख मिलता है । सूनौ द्वौ सुपाश्र्वेश्च सुनासः पञ्चहस्तकः । प्रद्युम्नश्चाम्धकः शम्भुः साल्वो मूलेश्वरो घपः ॥ 888 = १०५८ योग वासिष्ठ रामायण में हरपर्वत शिखर किंवा शारिका पर्वत शिखर को प्रद्युम्न शिखर कहा गया है । ( स्थिति प्रकरण : सर्ग : ३२ : श्लोक : १२ ) पुराणों में तीन प्रद्युम्न नामक व्यक्तियों का वर्णन मिलता है । भागवत पुराण ( ४ : १३ : १६) के अनुसार प्रद्युम्न एक राजा था। वह चक्षुर्मनु के बारह पुत्रों में से एक था । इसकी माता का नाम नड्वला था । सुद्युम्न भी इसका एक नामान्तर है । वायुपुराण के अनुसार प्रद्युम्न एक राजा था । यह भानुमत् राजा का पुत्र था । महाभारत अनुशासन पर्व के अनुसार प्रद्युम्न श्रीकृष्ण का पुत्र था । उसकी माता का नाम रुक्मिणी था । सनत्कुमार का अंश था । यह पूर्व जन्म में मदन था। शम्बरासुरका वध करने के लिये अवतार लिया था । शम्बरासुर की स्त्री मायावती पूर्व जन्म में प्रद्युम्न की पत्नी रति थी । पूर्व जन्म में मदन की मृत्यु के पश्चात् उसकी स्त्री रति को शम्बरासुर हर ले गया था । शम्बरा- सुर से बदला लेने के लिये प्रद्युम्न का अवतार लिया था । शम्बरासुर तथा प्रद्युम्न की कथा विष्णु, भागवत, हरिवंश तथा ब्रह्मवैवर्त पुराणों में भिन्न भिन्न रूप से दी गयी है। प्रद्युम्न-शाल्व युद्ध का भागवत १०:९०:३३ तथा महाभारत वनपर्व १५:१०-३२; १७:२५; १८:३; १५, १६६; २०:; १०; ७६; १३ में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । यादव वंश संहार के समय भोजों के सम्म प्रद्युम्न मृत हुआ । ( म० मो० : ४ : ३३; भा ११ : ३० : १६; गणेश : १ : ४९ ) मृत्युके अनन्तर वह सनत्कुमार के स्वरूप में प्रविष्ट हो गया । प्रद्युम्न की मायावती पत्नी के अतिरिक्त रुक्मिन की कन्या रुक्मावती अथवा शुभांगी से इसने विवाह किया था। ( भा० १० : ६१ : १८; ८० : १६ ; ) शुभांगी से इसको अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ था । ४६१ (१) आरोग्यशाला : अस्पताल का अर्थ आरोग्यशाला है । कल्हण प्राचीन काल में सार्व- जनिक आरोग्यशाला होने का उल्लेख करता है । कल्हण के इस वर्णन ने इतिहास को एक टूटी श्रृंखला की कड़ी को जोड़ा है । आयुर्वेद एवं आयुर्विज्ञान भारत में अत्यन्त विकसित था । तक्षशिला तथा काशी इस विद्या के केन्द्र थे । बौद्ध काल में समस्त भारतवर्ष तथा विदेश से विद्यार्थी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति सीखने तथा ज्ञान प्राप्त करने के लिये तक्षशिला जाते थे । भगवान् बुद्ध का प्रसिद्ध चिकित्सक जीवक राजगृह से तक्षशिला में आकर शिक्षा प्राप्त किया था । उस समय आजकल के समान सार्वजनिक अस्पताल भी होते थे यह बात कल्हण के उक्त उल्लेख से स्पष्ट होती है। राजतरंगिणी में आरोग्य- शाला स्थापित करने का यह प्रथम उल्लेख मिलता है ।
तृतीय तरंग ५९१ ख्यातिं रणपुरस्वामिसंज्ञया सर्वतो गतम् । स सिंहरोत्सिकाग्रामे मार्ताण्डं प्रत्यपादयत् ॥४६२॥ ४६२. उसने सिंहरोत्सिका ग्राम में रणपुरस्वामी नाम से प्रख्यात मार्तण्ड मन्दिर का निर्माण कराया । अमृतप्रभया तस्य राज्ञः पत्न्याऽन्यया कृतः । दक्षिणेऽस्मिन् रणेशस्य पार्श्वे देवोऽमृतेश्वरः ॥४६३॥ ४६३. उस नृप की अपर पत्नी अमृतप्रभा ने रणेश्वर के दक्षिण पार्श्व में अमृतेश्वर देव की स्थापना की । मेघवाहनभूभर्तृ पत्न्या भिन्नाऽऽख्यया कृते । विहारेऽपि तया बुद्धबिम्बं साधु निवेशितम् ॥४६४॥ ४६४. मेघवाहन नृप पत्नी भिन्ना¹ द्वारा निर्मित विहार में भी उसने सुन्दर बुद्ध प्रतिमा निविष्ट किया । राज्ञे देव्यनुरक्ताय सानुकक्रोशाय सैकदा । पातालसिद्धिदं मन्त्रं प्रददौ हाटकेश्वरम् ॥४६५॥ ४६५. एक बार उस (रणारम्भा स्वयं) ने देवी में अनुरक्त ए सहानुभूति पूर्ण नृपति को पाताल¹ ( विजय ) सिद्धिप्रद हाटकेश्वर मन्त्र प्रदान किया । पाठभेद : कल्हण ने कहीं भी इस प्रकार का गौण रूप से संकेत श्लोक संख्या ४६२ में 'मार्ताण्डं' का पाठभेद भी नहीं किया है। 'मार्तण्डं' मिलता है । ४६४ (१) अमृतेश्वर : इस मन्दिर के स्थान पादटिप्पणियाँ : तथा रूप का पता नहीं चलता । ४६२ (१) सिंहरोत्सिका : इस स्थान का (१) भिन्ना विहार : इसका भी पता नहीं पता नहीं चलता । कल्हण ने पुनः कहीं नहीं वर्णन चलता । किया है कि विष्णु का मन्दिर सूर्य किंवा मार्तण्ड दोनों का पुनः उल्लेख नहीं आया है जिससे रूप में कहीं स्थापित किया था । श्री जनरल इनके स्थान का पता लगाया जा सके । यह अनु- कनिंघम का यह मत कि मार्तण्ड का मध्यवर्ती सन्धान का विषय है । मन्दिर ही यह मन्दिर था और ललितादित्य ने केवल चारों ओर का स्तम्भावलोमय प्राकार का निर्माण ४६५ (१) पाताल : यूनानी लोग पाताल को कराया था । विद्वानों ने, मुख्यतः श्री फरगुसन और 'हेड्स' कहते हैं। वह नागों तथा आंशिक देवी श्री स्टीन ने, अमान्य किया है। यदि मार्तण्ड मन्दिर प्राणियों का स्थान माना जाता है। धारणा है कि रणादित्य का निर्माण कराया होता तो यह बात पाताल लोक नीचे था। कल्हण के काल में लोगों की स्मृति में अवश्य होती ।
५६२ राजतरंगिणी
मा भून्मोघाऽस्य मत्प्राप्तिरिति मत्वा तयाऽर्पितम् । असाधयत्तस् तं प्राप्य वशाम्तं वत्सरान् बहून् ॥४६६॥
४६६. 'मेरी प्राप्ति इसके लिये निष्फल न हो' यह समझकर उसके अर्पित उस वशीमन्त्र को प्राप्त ( राजा ने ) उसे बहुत वर्षों तक सिद्ध किया ।
कृत्वेष्टिकापथे कष्टं तपो नन्दिशिलां गतः । भूरिभिर्वत्सरैर्मन्त्रसिद्धेः प्रणयितां ययौ ॥४६७॥
४६७. 'इष्टिका पथ' में कष्ट साध्य तपस्या कर नन्द शिला२ गया और बहुत वर्षों के था मन्त्र सिद्धि प्राप्त की ।
पाठभेद : श्लोक संख्या ४६६ 'वशाम्तं' का पाठभेद 'वसन्तं', 'वसन्तु, घोर 'धंशान्त' मिलता है । श्लोक संख्या ४६७ में 'कृत्वेष्टि' का 'कृत्वष्टि' तथा 'तपो' का पाठभेद 'ततो' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ : ४६७ (१) इष्टिका पथ : पवित्र हरमुकुट पर्वत की दिशा में इष्टिका पथ का नाम आता है। यह वह स्थान है जिसका वर्णन नीलमत पुराण (१०८१) में 'पयेश्वर इष्टाः' रूप में किया गया है। यह लार परगना में रामरादन स्थान है। यही से हरमुकुट यात्रा की चडान आरम्भ होती है ।
नीलमत पुराण में उल्लेख मिलता है : गुहेश्वरः शतमुखो यष्टिकापथ एव च । कन्दर्पबलस्तथा पुण्यं क्षेत्रे चैव समन्ततः ॥ 118 = १६०-१६१
(२) नन्दशिला : कल्हण से स्पष्ट नही होता कि उसका नन्दशिला से क्या तात्पर्य है। श्री स्टीन का मत है कि सम्भवतः नन्द शिला नन्दी की गाथा से सम्बन्धित नन्दिक्षेत्र में हरमुकुट पर्वत पर होना चाहिये । नन्दी की उत्पत्ति शिलाद अर्थात् शिलानूर्ण से हुई थी । उसने तपस्या नन्दिनगर में मूर्धापर शिला रखकर किया था। हमान परगना में नन्हेल ग्राम का पुराना नाम नन्दिशिला था। ( वितस्ता माहात्म्य : २४।३३) किन्तु स्थान को पुण्य किया पवित्र रूप में वर्णन नहीं किया गया है। नीलमत में उल्लेख मिलता है।
तस्य मूलमथासाद्य देव्यै वचनमब्रवीत् । इहैव तिष्ठ तावत्त्वमहं यास्याम्यतः परम् ॥ 1057 = १२४१
x x x धूपेन सहितो देवीपर्वतेऽस्मिन् हि यः पथा । करोत्यारोहणं तस्य महत्पुण्यफलं स्मृतम् ॥ 1058 = ११४२
x x x यथा त्वं न समर्थाऽसि सुकुमाराऽसि देवि यत् । आरोढुं तेन यास्येऽहमेक एवाथ सत्वरः ॥ 1069 = १२४३
x x x तस्माद्देशात् प्रवृत्तस्तु गन्तुं देववरः पथा । पार्थाश्वराख्यस्तत्रेष्टो देवस्यायतनोऽभवत् ॥ 1060 = १२४४-१२४५
x ... x आरुरोह यथा शैलं यदा देवो महेश्वरः । तदा वृद्धि मगाच्छैलो महतीं भूरिदक्षिणः ॥ 1061 = १२४५-१२४६