राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० राजतरंगिणी
देवी जगाद तं 'भद्र' कोऽयं ते' मनसि भ्रमः ।
देवी वां स्यांमदेवी वा वरीतुं त्वां तु शक्नुयाम् ॥४२१॥
४२१. देवी ने उससे कहा—"भद्र ! तुम्हारे मन में यह कैसा भ्रम हो गया है ? मैं
देवी हूं अथवा अदेवी, तुम्हें वर प्रदान में समर्थ हूं ।"
इति सोऽभीष्टसम्प्राप्तौ कारयित्वा प्रतिश्रवम् ।
दूरमुत्क्रान्तमर्यादः संगमं तामयाचत ॥ २२॥
४२२. इस प्रकार अभीष्ट सम्प्राप्ति की प्रतिज्ञा कराकर, मर्यादा हीन हो, उस देवी से
संगम की याचना की ।
तमभ्यधात्सा दुर्बुद्धे कोऽयं तेऽनुचितो विधिः ।
प्रार्थयस्वेतरद्यस्मात् साऽहं भ्रमरवासिनी ॥४२३॥
४२३. उस देवी ने उससे कहा—'दुर्बुद्धे ! तुम्हारा यह कैसा अनुचित आचरण (विधि)
है ? अपना इतर वर माँगो । क्योंकि मैं ही भ्रमरवासिनी देवी हूँ ।'
देवीं तां जानतोऽप्यस्य नाभूदद्वहितं मनः ।
निरुद्धा वासदाः केन जन्मान्तरनिबन्धनाः ॥४२४॥
४२४. उसे देवी जानकर भी उसका मन विचलित नहीं हुआ । जन्मान्तरीय वास-
नाओं' को कौन दूर कर सकता है ।
स तामुवाच सत्यां चेद्देवि स्वां गिरमिच्छसि ।
प्रमाणीकुरु मद्वार्णीमहमन्द्यन्न कामये ॥४२५॥
४२५. उसने उस देवी से कहा—'देवि ! यदि अपनी वाणी सत्य करना चाहत' हो तो
मेरी वाणी (याचना) पूरी करो । मैं दूसरी कामना नहीं करता हूँ ।'
पूर्वमेव हि जन्तूनां योऽधिवासो निलीयते ।
तिलानामिव तेषां स पर्यन्तेऽपि न शीर्यते' ॥४२६॥
४२६. प्राणियों में जो संस्कार पूर्व में स्थित हो जाते हैं, वे उनके (शारीरिक) तिलों२
के सदृश मृत्यु पर्यन्त नष्ट नहीं होते ।
पादटिप्पणियाँ :
४२४ (१) वासनाः इस पद में अधिवागा
शब्द पद ४२४ में वासना शब्द को समृद्धिश्र्
करता है ।
४२६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
८२ वाँ श्लोक है ।
(२) तिल : शरीर पर कुछ तिल जन्म-जात
होते हैं और कुछ तिल कालान्तर में बन जाते हैं ।
यह तिल त्वचा पर मृत्यु काल पर्यन्त रहते हैं । ये
नष्ट नही होते । इसी प्रकार प्राणियो का पूर्व संस्कार
उनके साथ जैसे तिल शरीर के साथ मिलकर नष्ट
नही होता उसी प्रकार सस्कार नष्ट नही होते ।