भारतकोश
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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

५८० राजतरंगिणी देवी जगाद तं 'भद्र' कोऽयं ते' मनसि भ्रमः । देवी वां स्यांमदेवी वा वरीतुं त्वां तु शक्नुयाम् ॥४२१॥ ४२१. देवी ने उससे कहा—"भद्र ! तुम्हारे मन में यह कैसा भ्रम हो गया है ? मैं देवी हूं अथवा अदेवी, तुम्हें वर प्रदान में समर्थ हूं ।" इति सोऽभीष्टसम्प्राप्तौ कारयित्वा प्रतिश्रवम् । दूरमुत्क्रान्तमर्यादः संगमं तामयाचत ॥ २२॥ ४२२. इस प्रकार अभीष्ट सम्प्राप्ति की प्रतिज्ञा कराकर, मर्यादा हीन हो, उस देवी से संगम की याचना की । तमभ्यधात्सा दुर्बुद्धे कोऽयं तेऽनुचितो विधिः । प्रार्थयस्वेतरद्यस्मात् साऽहं भ्रमरवासिनी ॥४२३॥ ४२३. उस देवी ने उससे कहा—'दुर्बुद्धे ! तुम्हारा यह कैसा अनुचित आचरण (विधि) है ? अपना इतर वर माँगो । क्योंकि मैं ही भ्रमरवासिनी देवी हूँ ।' देवीं तां जानतोऽप्यस्य नाभूदद्वहितं मनः । निरुद्धा वासदाः केन जन्मान्तरनिबन्धनाः ॥४२४॥ ४२४. उसे देवी जानकर भी उसका मन विचलित नहीं हुआ । जन्मान्तरीय वास- नाओं' को कौन दूर कर सकता है । स तामुवाच सत्यां चेद्देवि स्वां गिरमिच्छसि । प्रमाणीकुरु मद्वार्णीमहमन्द्यन्न कामये ॥४२५॥ ४२५. उसने उस देवी से कहा—'देवि ! यदि अपनी वाणी सत्य करना चाहत' हो तो मेरी वाणी (याचना) पूरी करो । मैं दूसरी कामना नहीं करता हूँ ।' पूर्वमेव हि जन्तूनां योऽधिवासो निलीयते । तिलानामिव तेषां स पर्यन्तेऽपि न शीर्यते' ॥४२६॥ ४२६. प्राणियों में जो संस्कार पूर्व में स्थित हो जाते हैं, वे उनके (शारीरिक) तिलों२ के सदृश मृत्यु पर्यन्त नष्ट नहीं होते । पादटिप्पणियाँ : ४२४ (१) वासनाः इस पद में अधिवागा शब्द पद ४२४ में वासना शब्द को समृद्धिश्र् करता है । ४२६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ८२ वाँ श्लोक है ।
(२) तिल : शरीर पर कुछ तिल जन्म-जात होते हैं और कुछ तिल कालान्तर में बन जाते हैं । यह तिल त्वचा पर मृत्यु काल पर्यन्त रहते हैं । ये नष्ट नही होते । इसी प्रकार प्राणियो का पूर्व संस्कार उनके साथ जैसे तिल शरीर के साथ मिलकर नष्ट नही होता उसी प्रकार सस्कार नष्ट नही होते ।

तृतीय तरंग ५८१ देवी वा भव कान्ता वा भीमा वा शोभनाऽपि वा । यादृशीं पूर्वमद्राक्षं तादृश्येवाऽवभासि मे ॥४२७॥ ४२७. 'आप देवी हों अथवा कान्ता, भयंकर हों अथवा सुन्दर, जिस प्रकार पहले देखा था, उसी प्रकार अब भी मुझे लग रही हो।' तमित्थं कथयन्तं सा ज्ञात्वा निश्चलनिश्चयम् । एवं जन्मान्तरे भावोत्यभ्यधादनुरोधतः ॥४२८॥ ४२८. इस प्रकार सानुरोध करते हुए, उसे दृढनिश्चयी जानकर उस (देवी) ने कहा—'ऐसा जन्मान्तर में होगा।' उत्सहन्ते हि संस्प्रष्टुं न दिव्या मर्त्यधर्मिणः । तद्गच्छ क्रूरसंकल्पेत्युक्त्वा सान्तर्दधे ततः ॥४२९॥ ४२९. 'दिव्य (शरीरी) मरणशील प्राणियों का स्पर्श नहीं करते हैं। अतएव हे क्रूर संकल्प ! तुम जाओ।' कहकर देवी अन्तर्ध्यान हो गयी। अशून्यजन्मा भूयासं तया देव्येति चिन्तयन् । प्रयागवटशाखाग्रादहसीत्स वपुस्ततः ॥४३०॥ ४३०. तदनन्तर 'उस देवी के साथ दिव्य जन्म की प्राप्ति होगी' ऐसा सोचते हुए उसने प्रयाग के वट¹ के शाखाग्र से शरीर त्याग कर दिया। सोऽजायत रणादित्यो रणारम्भा च सा भुवि । मर्त्यभावेऽपि या नैव जहौ जन्मान्तरस्मृतिम् ॥४३१॥ ४३१. वह पृथ्वी पर रणादित्य हुआ। वह (देवी) रणारम्भा हुई जिसने मानव योनि में भी जन्मान्तर की स्मृति नहीं त्यागी। पाठभेद : तथा पश्चिम भारत में इस वृक्ष को वड़ तथा उत्तर श्लोक संख्या ४२९ में 'सस्प्रष्टु' का पाठभेद भारत में बरगद कहते हैं। 'संस्प्रष्टु' 'दिव्या' का 'देव्यो' तथा 'धर्मिण.' का पुराणों में वर्णन मिलता है। प्रलय काल में पाठभेद 'धर्मिणाम्' मिलता है। जब सब कुछ जलमय हो जाता है उस समय श्लोक संख्या ४३० में 'स' का पाठभेद 'स्व' वट का एक वृक्ष बच जाता है। उसके एक पत्ता मिलता है। पर भगवान् बाल रूप धारण कर रहते हैं। वहां पादटिप्पणियाँ : से सृष्टि के अनादि रहस्य का अवलोकन करते हैं। यह वट प्रयाग संगम पर है। कालिदास ने रघुवंश ४३० (१) वट : 'अक्षय वट' प्रयाग में में इसका उल्लेख किया है। गंगा-यमुना संगम पर किला में है। स्वर्ग में सुख पाठभेद : की प्राप्ति से स्वतः शरीर विसर्जन का उल्लेख श्लोक संख्या ४३१ में 'नैव' का पाठभेद 'मत्रेव' हुएन्त्सांग ने किया है। (रा०त० १:२३२) दक्षिण मिलता है।

५८२ राजतरंगिणी रतिसेनाभिधश्चोलराजः सज्जॊऽब्धिपूजने । तां तरङ्गान्तरान्लेभे रत्नराजिमिवोज्ज्वलाम् ॥४३२॥ ४३२. समुद्र पूजन में लग्न चोलराज १ रतिसेन ने तरंगमध्य से उज्ज्वल रत्नराशि तुल्य उसे प्राप्त किया था । आ बाल्याद्व्यक्तदिव्योक्तिं तामलंकृतयौवनाम् । दिव्यार्हां पृथिवीशेभ्यो नार्थिभ्योऽपि ददौ नृपः ॥४३३॥ ४३३. बाल्यपन से ही दिव्य लक्षणों से युक्त एवं यौवन से अलंकृत करते उस दिव्या- र्हा (दिव्य पुरुष के योग्य) को नृपति ने प्रार्थी पृथिवीशों (राजाओं) को भी नहीं प्रदान किया । रणादित्यनृपामात्ये दूत्यायाते तथैव तम् । प्रत्याख्यानेच्छुमाचख्यौ सैव तद्वरणं वरम् ॥४३४॥ ४३४. राजा रणादित्य के दूतरूप में आये अमात्य को भी पूर्ववत्-प्रत्याख्यान के लिए इच्छुक (पिता से) उसने (कन्या ने) ही उसी का वरण श्रेष्ठ कहा । तदर्थमेव कथितस्वोत्पत्तिं तां ततः पिता । द्रुतं कुलूतभर्तुः सुहृदः प्राहिणोद् गृहम् ॥४३५॥ ४३५. उसी के निमित्त अपनी उत्पत्ति कहने पर पिता ने उस (कन्या) को१ शीघ्र ही सुहृद् कुलूत पति२ के गृह प्रेषित कर दिया । प्रहृष्टोऽविप्रकृष्टं तं देशं गत्वा व्यधत्त ताम् । परिणीय रणादित्यः शुद्धान्तस्याधिदेवताम् ॥४३६॥ ४३६. दूरस्थ उस देश में बिना गये ही प्रसन्न रणादित्य ने उसे परिणीत कर अन्तः- पुर में (अधिदेवता) प्रधान रानी बना दिया । पादटिप्पणियाँ : वैवाहिक सम्बन्ध था । शशि शेखर तथा राजाधिराज ४३२ (१) चोल : पाद टिप्पणी त० १ : चोल का विवाह कश्मीर की राजकन्याओं से ३०० पृष्ठ द्रष्टव्य है । हुआ था । पादटिप्पणियाँ : (२) कुलूत : यह हिमाचल प्रदेश कुल्लू प्रदेश के लिये आया है जो व्यास किंवा विपाशा ४३५ (१) कन्या : दक्षिण में एक आख्यायिका नदी का ऊर्ध्वभाग स्थित भूखण्ड है । बृहद् संहिता प्रचलित है । चोलराज तथा कश्मीरराज में से भी यही बात स्पष्ट होती है ।

तृतीय तरंग ५८३ मर्त्यसंस्पर्शभीरुः सा महादेवीभवन्त्यपि । तं मायया मोहयन्ती न पस्पर्श कदाचन ॥४३७॥ ४३७. मनुष्य स्पर्श से भीरु वह राजपत्नी होती हुई भी, उसे माया मोहित कर, उसका कभी स्पर्श नहीं किया । व्यधान्मायामयीं राज्ञस्तल्पे स्वसदृशीं स्त्रियम् । स्वयं सा भ्रमरीरूपा निर्जगाम वहिर्निशि ॥४३८॥ ४३८. राजा के तल्प पर अपनी तरह मायामयी स्त्री बना देती थी और भ्रमर रूपा वह स्वयं रात्रि में बाहर चला जाती थी । स नाम्ना स्वस्य देव्याश्च कृत्वा सुरगृहद्वयम् । माहेश्वरः शैललिङ्गे कारयामास कारुभिः ॥४३९॥ ४३९. उसने अपने और देवी (रानी) के नाम से दो देव मन्दिर निर्मित करा, शिल्पियों द्वारा शैल लिंग१ पर माहेश्वर२ (शिव) बनवाया । श्वः प्रतिष्ठाप्रसङ्गेऽथ सज्जे तल्लिङ्गयोर्द्वयम् । देशान्तरागतः कश्चित् दूषयामास दैववित् ॥४४०॥ ४४०. दूसरे दिन प्रतिष्ठा अवसर पर देशान्तर से आये किसी दैवविद् से (ज्योतिषी) ने उन दोनों लिंगों को दोष पूर्ण कहा— स दृष्टप्रत्ययः शश्वत् तयोर्घटितलिङ्गयोः । अश्मखण्डैः समण्डूकैः बभाषे गर्भमावृतम् ॥४४१॥ ४४१. शश्वत् दृष्ट प्रत्यय उसने कहा-'निर्मित उन दोनों लिंगों का गर्भ मण्डूक सहित अश्म खण्डों से आवृत है।


[पादटिप्पणियाँ एवं पाठभेद - बायाँ स्तम्भ] पाठभेद : श्लोक संख्या ४३९ में 'स' का 'स्व', 'सुर' का 'स्वर', 'पर' एवं 'माहेश्वरः' का पाठभेद 'माहेश्वरे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४३९ (१) शैल लिंग : इसका अर्थ होता है कि विशाल पाषाण खण्ड पर शिव लिंग का निर्माण कराया । (२) माहेश्वर : वायुपुराण (अ० २३) तथा लिंग पुराण (अ० २४) में एक कथा वर्णित है । उसके अनुसार माहेश्वर ने ब्रह्म देव से कहा था कि युगों के अठाईसवें प्रत्यावर्तन में कृष्ण द्वैपायन के समय जब व्यासदेव जन्म लेंगे तब

[पादटिप्पणियाँ एवं पाठभेद - दायाँ स्तम्भ] वे श्मशान में पड़े हुए एक मृत शरीर में प्रविष्ट होकर 'सकुलिन्' नामक ब्रह्मचारी के रूप में अवतार लेंगे। यह घटना कायावतार किंवा काया- रोहण में घटित होगी । उनके चार शिष्य (१) कुशिक (२) गर्ग (३) मित्र और (४) कौरुष्य होंगे । अन्त में पाशुपत शरीर में भस्म लगाकर माहेश्वर योग करते रुद्र लोक में जायेंगे । माहेश्वर नाम अति प्राचीन है । विम कदफिसस और वलभी वंश के राजा स्वयं को महेश्वर कहते थे । ह्वेनत्सांग ने माहेश्वर मन्दिरो का उल्लेख किया है। उनमें पाशुपत पूजा करते थे । मध्य भारत में माहेश्वर तीर्थ है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४४१ में 'शश्वत्' का ...

५८२ राजतरंगिणी रतिसेनामिधश्चोलराजः सज्जोऽब्धिपूजने । तां तरङ्गान्तरान्लेभे रत्नराजिमिवोज्जलाम् ॥४३२॥ ४३२. समुद्र पूजन में लग्न चोलराज¹ रतिसेन ने तरङ्गमध्य से उज्ज्वल रत्नराशि तुल्य उसे प्राप्त किया था । आ बाल्याद्व्यक्तदिव्योक्तिं तामलंकृतयौवनाम् । दिव्यार्हा पृथिवीशेभ्यो नार्थिभ्योऽपि ददौ नृपः ॥४३३॥ ४३३. बाल्यपन से ही दिव्य लक्षणों से युक्त एवं यौवन से अलंकृत करते उस दिव्या- र्हा (दिव्य पुरुष के योग्य) को नृपति ने प्रार्थी पृथिवीशों (राजाओं) को भी नहीं प्रदान किया। रणादित्यनृपामात्ये दूत्यायाते तथैव तम् । प्रत्याख्यानेच्छुमाचख्यौ सैव तद्वरणं वरम् ॥४३४॥ ४३४. राजा रणादित्य के दूतरूप में आये अमात्य को भी पूर्ववत् प्रत्याख्यान के लिए इच्छुक (पिता से) उसने (कन्या ने) ही उसी का वरण श्रेष्ठ कहा। तदर्थमेव कथितस्वोत्पत्तिं तां ततः पिता । द्रुतं कुलूतभर्तुः सुहृदः प्राहिणोद् गृहम् ॥४३५॥ ४३५. उसी के निमित्त अपनी उत्पत्ति कहने पर पिता ने उस (कन्या) को¹ शीघ्र ही सुहृद् कुलूत पति² के गृह प्रेषित कर दिया । प्रहृष्टोऽविप्रकृष्टं तं देशं गत्वा न्यधत्त ताम् । परिणीय रणादित्यः शुद्धान्तस्याधिदेवताम् ॥४३६॥ ४३६. दूरस्थ उस देश में बिना गये ही प्रसन्न रणादित्य ने उसे परिणीत कर अन्तः- पुर में (अधिदेवता) प्रधान रानी बना दिया । पादटिप्पणियाँ : वैवाहिक सम्बन्ध था । शशि शेखर तथा राजाधिराज ४३२ (१) चोल : पाद टिप्पणी त० १ : चोल का विवाह कश्मीर की राजकन्याओं से १०० पृष्ठ द्रष्टव्य है । हुआ था । पादटिप्पणियाँ : (२) कुलूत : यह हिमाचल प्रदेश कुल्लू ४३५ (१) कन्या : दक्षिण में एक आख्यायिका प्रदेश के लिये आया है जो ब्यास किंवा विपासा प्रचलित है । चोलराज तथा कश्मीरराज में नदी का ऊर्ध्वभाग स्थित भूखण्ड है । बृहद् संहिता से भी यही बात स्पष्ट होती है ।

तृतीय तरंग ५८३ मर्त्यसंस्पर्शभीरुः सा महादेवीभवन्त्यपि । तं मायया मोहयन्ती न पस्पर्श कदाचन ॥४३७॥ ४३७. मनुष्य स्पर्श से भीरु वह राजपत्नी होती हुई भी, उसे माया मोहित कर, उसका कभी स्पर्श नहीं किया । व्यधान्मायामयीं राज्ञस्तल्पे स्वसदृशीं स्त्रियम् । स्वयं सा भ्रमरीरूपा निर्जगाम वहिर्निशि ॥४३८॥ ४३८. राजा के तल्प पर अपनी तरह मायामयी स्त्री बना देती थी और भ्रमर रूपा यह स्वयं रात्रि में बाहर चला जाती थी । स नाम्ना स्वस्य देव्याश्च कृत्वा सुरगृहद्वयम् । माहेश्वरः शैललिङ्गे कारयामास कारुभिः ॥४३९॥ ४३९. उसने अपने और देवी (रानी) के नाम से दो देव मन्दिर निर्मित करा, शिल्पियों द्वारा शैल लिंग१ पर माहेश्वर२ (शिव) बनवाया । श्वः प्रतिष्ठाप्रसङ्गेऽथ सज्जे तल्लिङ्गयोर्द्वयम् । देशान्तरागतः कश्चित् दूषयामास दैववित् ॥४४०॥ ४४०. दूसरे दिन प्रतिष्ठा अवसर पर देशान्तर से आये किसी दैवविद् से (ज्योतिषी) ने उन दोनों लिंगों को दोष पूर्ण कहा— स दृष्टप्रत्ययः शश्वत् तयोर्घटितलिङ्गयोः । अश्मखण्डैः समण्डूकैः बभाषे गर्भमावृतम् ॥४४१॥ ४४१. शश्वत् दृष्ट प्रत्यय उसने कहा—'निर्मित उन दोनों लिंगों का गर्भ मण्डूक सहित अश्म खण्डों से आवृत है। पाठभेद : श्लोक संख्या ४३९ में 'स' का 'स्व', 'सुर' का 'स्वर', 'पर' एवं 'माहेश्वरः' का पाठभेद 'माहेश्वरे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४३९ (१) शैल लिंग : इसका अर्थ होता है कि विशाल पाषाण खण्ड पर शिव लिंग का निर्माण कराया । (२) माहेश्वर : वायुपुराण (अ० २३) तथा लिंग पुराण (अ० २४) में एक कथा वर्णित है। उसके अनुसार माहेश्वर ने ब्रह्मा देव से कहा था कि युगों के अठाईसवें प्रत्यावर्तन में कृष्ण द्वैपायन के समय जब वासुदेव जन्म लेंगे तब वे श्मशान में पड़े हुए एक मृत शरीर में प्रविष्ट होकर 'लकुलिन्' नामक ब्रह्मचारी के रूप में अवतार लेंगे। यह घटना कायावतार किंवा काया- रोहण में घटित होगी। उनके चार शिष्य (१) कुशिक (२) गर्ग (३) मित्र और (४) कौरुष्य होंगे । अन्त में पाशुपत शरीर में भस्म लगाकर माहेश्वर योग करते रुद्र लोक में जायेंगे । माहेश्वर नाम अति प्राचीन है। विम कदफिसस और वलभी वंश के राजा स्वयं को महेश्वर कहते थे । ह्वेनत्सांग ने माहेश्वर मन्दिरों का उल्लेख किया है। उनमें पाशुपत पूजा करते थे । मध्य भारत में माहेश्वर तीर्थ है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४४१ में 'अश्म' का पाठभेद

५८४ राजतरंगिणी किंर्त्तव्यंतया मूढं प्रतिष्ठांविघ्नविह्वलम् । दिव्यदृष्टिः स्वयं देवी ततो राजानमंब्रवीत् ॥४४२॥ ४४२. किंकर्तव्य विमूढ एवं प्रतिष्ठा के विघ्न 'से विह्वल राजा से दिव्य दृष्टि स्वयं देवी ने कहा— राजन्गिरिसुतोद्वाहे पौरोहित्यं पुरा भजन् । स्वमर्चादेवमादत्त पूजाभाण्डात्प्रजापतिः ॥४४३॥ ४४३. 'राजन् ! प्राचीन काल में गिरिसुता परिणय में पौरोहित्य कर्म करते प्रजापति ने पूजा पात्र से अपने अर्चा देव को लिया । तां विष्णोः प्रतिमां वीक्ष्य पूजितां तेन धूर्जटिः । शून्यामिव तदा मेने शक्तिरूपां विना शिवम् ॥४४४॥ ४४४. 'उन (ब्रह्मा) से पूजित शक्ति रूपा उस विष्णु' प्रतिमा को शिव रहित देख कर धूर्जटी (शिव) ने शून्य (अनुपयोगी) माना । निमन्त्रितैर्ढौकितानि रत्नान्यथ सुरासुरैः । पिण्डीकृत्य स्वयं चक्रे लिङ्गं भुवनवन्दितम् ॥४४५॥ ४४५. 'निमन्त्रित सुरों एवं असुरों द्वारा प्रदत्त रत्नों को एक में (पिण्डी कृत) करके स्वयं भुवन वन्दित लिंग निर्मित किया । 'अश्व' मिलता है । दिया था । पादटिप्पणियां : पूर्वकाल में पार्वती कृष्ण वर्ण की थी । ४४२ (१) विघ्न : किसी प्रकार शुभ, अमरकेश्वर तीर्थ में स्नान कर इन्होंने शिव को पवित्र, तथा यात्रादि में किसी प्रकार का अवरोध दीप दान किया था । उसके पश्चात् वह गौर वर्ण उत्पन्न करना, उसमें अड़ंगा लगाना, उसके नष्ट हो गयी थी । करने की चेष्टा करना विघ्न कहा जाता है। पर्वत की कन्या होने के कारण नाम पार्वती धार्मिक कृत्यों में यदि विघ्न पड़ता है तो समझा पड़ा था । पर्वतों की अधिष्ठात्री देवी होने के जाता है कि क्रिया करने वाले का अनिष्ट होगा । कारण भी नाम पार्वती पड़ा था । यह नृत्यों में पाठभेद : लास्य नृत्य की प्रवर्तिका मानी जाती हैं । श्लोक संख्या ४४३ में 'स्वमर्चादेवमादत्त' का पाठभेद : 'तद्योर्हेशमादित्य' तथा 'दत्त' का पाठभेद 'धत्त' श्लोक संख्या ४४४ में 'शून्यामिव' का पाठभेद मिलता है । 'शून्यामेव' मिलता है । पादटिप्पणियां : पादटिप्पणियां ; ४४३ (१) गिरिसुता : हिमालय तथा मेना ४४४ (१) शक्तिरूपा विष्णो : वायुपुराण की कन्या पार्वती थी । नारद के सुझाव पर २५ : २३ तथा कूर्म पुराण २ : ४ के अनुसार विष्णु हिमालय ने पार्वती का विवाह शिव के साथ कर भगवान् शिव शक्ति की मूर्ति माने जाते हैं ।

तृतीय तरंग ४८५ तां विष्णुप्रतिमां तच्च लिङ्गमीशानपूजितम् । स्वयं प्रजासृजः पूज्यं कालेनादत्त रावणः ॥४४६॥ ४४६. 'स्वयं प्रजापति का पूज्य (एवं) ईशान पूजित उस लिंग तथा उस विष्णु प्रतिमा को समय से रावण ने प्राप्त किया । तेनाप्यभ्यर्च्यमानं तत् लङ्कायामभवच्चिरम् । देवद्वयं रावणान्ते नीतमासीच्च वानरैः ॥४४७॥ ४४७. 'लंका में वह (लिंग) चिरकाल तक उससे पूजित हुआ। रावण के पश्चात् वानरों ने देव-द्वय (दोनों लिंगों) को ले लिया । तिर्यक्तया ते कपयो मुग्धा हिमनगौकसः । शान्तौत्सुक्या शनैः देवौ न्यधुरुत्तरमानसे ॥४४८॥ ४४८. 'हिमालय निवासी उन मुग्ध कपियों ने (तिर्यक) पशु स्वभाव के कारण उत्सुकता समाप्त हो जाने पर दोनों देवों को उत्तर मानस' में रख दिया । पाठभेद : सर्वपापविनिर्मुक्तो वारुणं लोकमश्नुते । श्लोकसंख्या ४४८ में 'हिमनगौकसः' का मानसस्योत्तरे कूले महापद्मजलाशये ॥ 'हिमानसौकसः' तथा 'देवौ' का पाठभेद 'देव्यौ' 1005 = ११७६ मिलता है । * * * पादटिप्पणियाँ : तत्र संस्थापयन्तिस्म ज्येष्ठेशं ते सदैव तु । ४४८ (१) उत्तरमानस : कश्मीर में उत्तर अहन्न् दिव्येन तोयेन शुभेनोत्तरमानसम् ॥1112 मानस गंग बल को कहते है । हरमुख पर्वत की = १३१२-१३१३ पूर्वोव हिमानी के अधोभाग में वह सरोवर * * * स्थित है। हरमुकुट माहात्म्य तथा हरचरित तेषां तपःप्रभावेण भक्त्या च मम पार्षद । चिन्तामणि (४:८७) से भी यह बात प्रमाणित होती सोदरस्य च नागस्य स्नानं कृत्वा विधानतः ॥ है । 'नीलमत पुराण (श्लोक ९१०, ९९०, तथा 1113 = १३१३-१३१४ १२६३) में भी इसका उल्लेख है । पृष्ठ १०० भी * * * द्रष्टव्य है । मृत्युं विसर्जयामास सान्त्वयित्वा सुरारिहा । उत्तर मानस से नीचे एक दूसरा सर है नन्दिनं च समादाय दृष्ट्वा चोत्तरमानसम् ॥ उसमे भी जल हिमानी अर्थात् ग्लेसियर से आता 1117 = १३२० है। इसे गुन्द कोल कहते हैं । प्राचीन नाम × × × कालोदक है । नन्दिसर भी कहा जाता है । हर- उत्तरे मानसे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । चरित चिन्तामणि तथा नीलमत पुराण में इसका पितरस्तर्पितास्तत्र कामान्यच्छन्त्यभीप्सितान् ॥ उल्लेख मिलता है : 1241 = १४५४ १४५५ नारायणो निरुद्धश्च वासुदेवो जलान्धसः । महाभारत अनुशासनपर्व में कालोदक, नन्दिकुण्ड, पात्रश्च मानसश्चैव तथैवोत्तरमानसः ॥ नन्दीश्वर तीर्थों का इतना सुन्दर वर्णन मिलता है . 890 = १०६० ७४

५८६ राजतरंगिणी प्रागेव सरसस्तस्मात्कुशलैः शिल्पिभिर्मया । तावुद्धृतौ प्रातरत्र प्राप्तौ द्रक्ष्यस्यसंशयम् ॥४४९॥ ४४९. 'मैंने पहले ही उस सरोवर से कुशल शिल्पियों द्वारा उन दोनों को निकलवा लिया है। निश्चय ही प्रातः यहाँ देखोगे। तयोः प्रतिष्ठा क्रियतामित्युक्त्वा पृथिवीभुजम् । देवी प्रयाता शुद्धान्तं सिद्धान्सस्मार खेचरान् ॥४५०॥ ४५०. उन दोनों की प्रतिष्ठा करें।' इस प्रकार पृथिवीपति से कह कर देवी शुद्धान्त (अन्तःपुर) में गयी और सिद्ध खेचरों' (आकाशचारी) का स्मरण किया। ते ध्यातमात्राः संप्राप्ता देव्यादेशेन पाथसः । उद्धृत्य नृपतेर्धाम्नि देवौ हरिहरौ न्यधुः ॥४५१॥ ४५१. ध्यान करते ही, वे उपस्थित हो गये और देवी के आदेश से जल से निकालकर, हरि-हर दे को नृप धाम में लाये। दिव्यैः प्रसूनैः संवीतौ हरनारायणौ जनः । प्रातर्नृपगृहे दृष्ट्वा परं विस्मयमाययौ ॥४५२॥ ४५२. दिव्य प्रसूनों से संवीत (आच्छादित) हर तथा रि को प्रातः राजगृह में देखकर लोग अत्यन्त विस्मित हुए। सज्जे प्रतिष्ठालग्नेऽथ माहेश्वरतया नृपः । रणेश्वरप्रतिष्ठायां पूर्वं यावत्समुद्यतः ॥४५३॥ ४५३. माहेश्वर होने के कारण नृप प्रतिष्ठा सज्ज (उपस्थित) होने पर पहले रणेश्वर की प्रतिष्ठा हेतु जबतक उद्यत हो रहा था —


कि प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने स्वयं वहाँ नन्दीश्वर की मूर्ति का दर्शन करके कश्मीर जाकर अपनी आँखों से इन तीर्थों को मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। स्वर्गमार्ग में देखा था। स्नान करने पर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम् । पाठभेद : अभ्येत्य योजनशताद् भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥२५:६० श्लोक संख्या ४४९ में 'द्धृतौ' का पाठभेद 'द्यतो' मिलता है। × × × श्लोक संख्या ४५१ में 'न्यधुः' का पाठभेद नन्दीश्वरस्य मूर्तिं तु दृष्ट्वा मुच्येत किल्बिषैः । यधुः' मिलता है। स्वर्गमार्गे नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥२५:६० श्लोक संख्या ४५३ में 'लग्ने' का पाठभेद सौ योजन दूरसे आकर कालोदक, नन्दि कुण्ड 'लिङ्गे' मिलते हैं। तथा उत्तरमानम तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य पादटिप्पणियाँ : यदि भ्रूण हत्या भी किया हो तो वह पाप मुक्त श्री स्टीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित हो जाते हैं। एवं अन्य अनुवादको ने श्लोक संख्या ४५३ तथा

तृतीय तरंग ५८७ रणारम्भानुभावेन तावदेवाद्भुतावहः । स्वयं पीठे रणस्वामी भित्त्वा यन्त्रमुपाविशत् ॥४५४॥ ४५४. तब तक रणारम्भा के प्रभाव से विस्मय करने वाले स्वयं रण स्वामी१ यन्त्र भेदन कर पीठ पर बैठ गये ।

४५४ का अनुवाद एक ही साथ किया है। परन्तु दोनो श्लोको को युग्मक श्री कल्हण ने नही लिखा है अतएव उसी का अनुकरण कर यहाँ दोनो का अनुवाद अलग अलग दिया गया है ।

४५३ (१) रणेश्वर : यह देवस्थान श्रीनगर में अथवा उसके समीप था । रणस्वामी से दूर नहीं था वे एक दूसरे के समीप थे । रणेश किंवा रणेश्वर का पुनः उल्लेख कल्हण ने नहीं किया है । यह मन्दिर कहाँ था इसका निश्चयात्मक पता नहीं चलता ।

श्री आनन्द कौल इस मन्दिर के सम्बन्ध में श्री स्टीन के मत का उल्लेख करते हैं। वह रणेश्वर के मन्दिर के विषय में इतना कहते हैं कि विचार नाग से दो मिल दक्षिण रणेश्वर का मन्दिर रणादित्य ने निर्माण कराया था । उनके मत से इस मन्दिर के लिये मदनी साहब की ज़ियारत की गवेषणा करनी चाहिए ।

४५४ ( १ ) रणस्वामी : यह मन्दिर श्री- नगर में अथवा उसके और रणेश्वर के समीप स्थित था । रणस्वामी का देवस्थान अधिक प्रसिद्ध मालूम होता है । इस स्थान का पता अन्य उल्लेखों से लगाया जा सकता है । तरंग ५ : ३९४ में इसका पुनः उल्लेख चक्रवर्मा की रानी का माघ मास में यहाँ आनेका मिलता है। यह समय कश्मीर उपत्यका में भयंकर तुषारपात होता है । इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस देवस्थान का मार्ग अत्यधिक तुषार पात के समय भी सुगम तथा सरल रहा होगा ।

मंख ने श्रीकंठचरित ( ३:६८ ) में वर्णन किया है कि उसके पिता इस मन्दिर में पूजा करने के लिये जाया करते थे। श्री जोनराज ने भी इस के सम्बन्ध में लिखा है—‘श्री प्रवरपुर प्रधान देवता’ श्रीप्रवरपुर का अर्थ श्रीनगर है। श्रीनगर के प्रधान देवता का श्रीनगर मे होना स्वाभाविक प्रतीत होता है ।

जोनराज ने अपनी राजतरंगिणी में लिखा है (श्लोक ८७२) कि बड़शाह जैनुल आबदीन ने 'जैन गंगा' नहर को अपने नवीन नगर जैन नगरी में रण स्वामी तक बनवाकर ले आया था ।

जोनराज के वर्णन ( ८७० ) से प्रतीत होता है कि जैन नगरी प्रद्युम्न नगरी ( हर पर्वत ) तथा अमरेशपुर ( अम्बरहर तरंग १:२८७ ) उसकी अन्तिम सीमा थी । इससे प्रतीत होता है कि जैन गंगा ही वर्तमान नहर लछम कुल अर्थात् लक्ष्मण कुल्या है। यह नहर सिन्धु नदी से जल अम्बरहर से होती नौशहर तथा संगीन दरवाजा तक पानी लाती है । हरपर्वत के पश्चिम तरफ संगीन दरवाजा है । यह नहर दक्षिण दिशा की ओर चलती जामा मसजिद तक जाती है मार नहर में कादी कदल पुल के पास मिल जाती है ।

जोनराज ने अपनी तरंगिणी सन् १४४६— १४५९ ई० में लिखी थी । जैनुल आबदीन के समय लछमकल यह वही है जिसे जोनराज ने देखा था । श्री स्टीन का मत है कि रणस्वामी का मन्दिर मार तथा लछम कुल नहर के कोने पर टूटा पड़ा मन्दिर है । यह अब तक इसलिये वर्तमान है कि मुसलमानों ने इस मन्दिर को ज़ियारत पीर हाजी मुहम्मद साहेब में परिवर्तित कर लिया है ।

४६८ राजतरंगिणी कर्तुं प्रभावजिज्ञासां राज्ञा दत्तधनस्ततः । सं स्वयंभूः स्वयं भक्तैः तांस्तान्ग्रामानदापयत् ॥४५५॥ ४५५. प्रभाव के जिज्ञासा हेतु उन्हें धन अर्पित किया। तदनन्तर स्वयं उन स्वयंभू ने भक्तों को तत्तत् ग्राम प्रदात कराया। कुम्भदासत्या छन्नः सिद्धो ब्रह्मभिधो वसन् । परिज्ञाय तयोर्देव्या प्रतिष्ठाकर्म कारितः ॥४५६॥ ४५६. कुम्भदास' (जल लाने वाला) के रूप में छिपकर रहते हुए ब्रह्म नामक सिद्ध को जान कर रानी ने उसके द्वारा दोनों (मूर्तियों) का प्रतिष्ठा कर्म कराया। स वृत्तप्रत्यभिज्ञः सन्प्रतिष्ठाप्य रणेश्वरम् । व्योम्ना व्रजन् रणस्वामिप्रतिष्ठां गूढमादधे ॥४५७॥ ४५७. रणेश्वर की प्रतिष्ठा करके परिचय ज्ञात हो जाने पर आकाश से जाते हुए रण स्वामी की प्रतिष्ठा गुप्त रूप से की। दीवालों के अतिरिक्त जो अष्टकोणीय कक्षा पर बनी है तथा दो सीढ़ियां जो इसके दोनो द्वारों पर गयी हैं। मन्दिर के प्रांगण के प्राकार की दीवारें भी आज तक खड़ी हैं। किसी का ध्यान इस ओर नही गया है। कश्मीर के पुरातत्व के कागजों में भी इसका उल्लेख नही किया गया है। श्री स्टीन ने एक दूसरा विकल्प भी दिया है। वे कहते हैं— लछम कुल प्राचीन समय में यदि ओर उत्तर दिशा में उस शाखा में मिली होती जो डल लेक में जाकर कूट कदल के पास जाकर मिल जाती है तो रणस्वामी के मन्दिर का ध्वंन्सावशेष संगीन दरवाजा के उत्तरौद भाग में मादिन साहब की मसजिद में बिखरे प्राचीन मन्दिरो के ध्वंसावशेष में खोजना होगा। श्री पण्डित साहेबराम ने अपने तीर्थों में केवल इतना ही लिखा है। रणस्वामी का मन्दिर हर पर्वत के पश्चिम में था। उन्होंने कोई निश्चित स्थान नहीं बताया है। 'पाठभेद' श्लोक संख्या ४५५ में 'भक्तै' का पाठभेद 'मरुता' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४५५ (१) स्वयंभू : यह मानव निर्मित प्रतिमा तथा स्थान नही होता था अपितु स्वयं प्रजापति का कर्तृत्व समझा जाता था। रा. तं. १ : ३४, पृष्ठ ७३ द्रष्टव्य है। श्री स्टीन, श्री रणजीत सीताराम पण्डित एवं अन्य अनुवादकों ने श्लोक संख्या ४५६-४५८ का एक ही साथ अनुवाद 'तिलकम्' के रूप में किया है। किन्तु श्री कल्हण ने उन्हें 'तिलकम्' नहीं लिखा है। अतएव उनका अनुवाद अलग अलग किया गया है। ४५६ (१) कुम्भदास : कुम्भकार का अर्थ कुम्हार होता है। अर्थात् घड़ा बनाने वाले का नाम कुम्भकार होता है। कुम्भ दास का अर्थ होगा कुम्भ-घड़ा का दास। यह शब्द यहाँ पर कर्म का बोधक है। कुम्भ की सेवा का तात्पर्य कुम्भ से जल ले जाना ही हो सकता है। वाटर पाइप लगने के पूर्व कश्मीरी हिन्दू ब्राह्मणो के घर में क्षत्रिय तथा उनकी स्त्रियां घड़ों अर्थात् कुम्भ से जल भरती थी। वे मासिक पारिश्रामिक पाती थी। पुरुष जल भरने वाले को कुम्भदास तथा जल भरने वाली स्त्री को कुम्भदासी कहा जाता था। कल्हण ने कुम्भदासी का पुनः उल्लेख त० ८ : १७३६ में किया है।

: तृतीय तरंग ५८९ जनास्त्वलखयन् यत्स स्वयं पीठमवातरत् । इति केषामपि हृदि प्रवादोऽद्यापि वर्तते ॥४५८॥ ४५८. लोगों ने देखा कि वे स्वयं पीठ पर अवतरित हुए-यह प्रवाद आज भी किसी-किसी के हृदय में (स्थित) है। सा ब्रह्मप्रतिमं सिद्धं देवी ब्रह्मविदां वरम् । अकारयत्समुद्दिश्य परार्ध्यं ब्रह्ममण्डपम् ॥४५६॥ ४५९. ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मप्रतिम उस सिद्ध को उद्देश्य कर उस देवी ने बहुमूल्य ब्रह्म मण्डप निर्मित कराया । रणारम्भास्वामिदेवौ दंपत्तिभ्यां व्यधीयत । मठः पाशुपतानां च ताभ्यां प्रद्युम्नमूर्धनि ॥४६०॥ ४६०. रणारम्भा स्वामी एवं रणारम्भादेव को दम्पति ने बनवाया । प्रद्युम्न मूर्धा (शिखर) पर पाशुपतों के लिये मठ निर्मित कराया । पाठभेद : जोड़ा है । प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध थे । श्लोक संख्या ४५८ में 'प्रवादो' का पाठभेद इस पर्वत के पूर्वीय ढाल पर बहुत पैमाने में 'प्रवचो' मिलता है । फैली मुसलिम जियारतें मुरुद्दम साहित्य तथा श्लोकसंख्या ४५९ में 'परार्ध्य' का 'परार्द्धं' आखूनमुल्ला शाह की है । यह सब प्राचीन मन्दिर तथा 'मण्डपम्' का पाठभेद 'सत्तमम्' मिलता है । मठो तथा विहारों के स्थानों पर बनी है। यद्यपि श्लोकसंख्या ४६० में 'देवो' का 'देवी' रणस्वामी एवं रणेश्वर के मन्दिरों की तरह यह 'दम्पतिभ्यां' का 'दम्पतीभ्यां' तथा 'प्रद्युम्नमूर्धनि' भी समीप ही स्थित है परन्तु निश्चयात्मक रूप से का पाठभेद 'शारिकागिरौ' मिलता है । नहीं कहा जा सकता कि वे रणस्वामी एवं रणेश्वर पादटिप्पणियाँ : के ही स्थान थे । पता नहीं जब मैने इस स्थानों ४६० (१) प्रद्युम्न मूर्धा: प्रद्युम्न मूर्धा किंवा को देखा तो भावुकतावश यह धारणा हो गयी कि शिखर हर अथवा शारिका पर्वत के लिये प्रयुक्त रणस्वामी तथा रणेश्वर के ध्वन्सावशेष यही थे । किया गया है। इसे हर पर्वत भी कहते हैं। परन्तु वह मेरे मन का भ्रम ही हो सकता है । इसका उल्लेख प्रद्युम्न पीठ, प्रद्युम्न गिरि, तथा इसका कोई प्रमाण नहीं प्रतीत होता । किन्तु न प्रद्युम्नशिखर नाम से किया गया है (त. ७:१६- जाने वहाँ आनेपर मुझे क्यों हार्दिक सन्ताप जैसा १६; विक्रमांक देव चरित, विल्हण ; १८।१५; हुआ । मन रोने लगा । आंखो के सम्मुख जोनराज; ५८७, ८७०; श्रीवर १:६३१, २:८८, जैसे मूर्तियां थाने लगीं। मुझे अच्छी तरह स्मरण तथा महादेव माहात्म्य २।७)। है मूर्तियों के मुख से करुणा जैसे झलक रही थी । सोमदेव ने कथासरित्सागर (७३:१०९) में वे कह रही थीं-क्या था ? क्या होगया ? मै उस इस पर्वत को उषा और अनिरुद्ध की प्रेम कथा से समय के अपने भाव को व्यक्त करने में सर्वथा असमर्थ पाता हूँ।

५९० राजतरंगिणी आरोग्यशाला निरघाऽप्युल्लाघत्वाय रोगिणाम् । तेन सेनामुखीदेवीभयशान्त्यै च कारिता ॥४६१॥ ४६१. उसने रोगियों के आरोग्य एवं सेनामुखी देवी के भय शान्ति हेतु सुन्दर आरोग्यशाला' स्थापित किया । नीलमत पुराण में प्रद्युम्न नाग का उल्लेख मिलता है । सूनौ द्वौ सुपाश्र्वेश्च सुनासः पञ्चहस्तकः । प्रद्युम्नश्चाम्धकः शम्भुः साल्वो मूलेश्वरो घपः ॥ 888 = १०५८ योग वासिष्ठ रामायण में हरपर्वत शिखर किंवा शारिका पर्वत शिखर को प्रद्युम्न शिखर कहा गया है । ( स्थिति प्रकरण : सर्ग : ३२ : श्लोक : १२ ) पुराणों में तीन प्रद्युम्न नामक व्यक्तियों का वर्णन मिलता है । भागवत पुराण ( ४ : १३ : १६) के अनुसार प्रद्युम्न एक राजा था। वह चक्षुर्मनु के बारह पुत्रों में से एक था । इसकी माता का नाम नड्वला था । सुद्युम्न भी इसका एक नामान्तर है । वायुपुराण के अनुसार प्रद्युम्न एक राजा था । यह भानुमत् राजा का पुत्र था । महाभारत अनुशासन पर्व के अनुसार प्रद्युम्न श्रीकृष्ण का पुत्र था । उसकी माता का नाम रुक्मिणी था । सनत्कुमार का अंश था । यह पूर्व जन्म में मदन था। शम्बरासुरका वध करने के लिये अवतार लिया था । शम्बरासुर की स्त्री मायावती पूर्व जन्म में प्रद्युम्न की पत्नी रति थी । पूर्व जन्म में मदन की मृत्यु के पश्चात् उसकी स्त्री रति को शम्बरासुर हर ले गया था । शम्बरा- सुर से बदला लेने के लिये प्रद्युम्न का अवतार लिया था । शम्बरासुर तथा प्रद्युम्न की कथा विष्णु, भागवत, हरिवंश तथा ब्रह्मवैवर्त पुराणों में भिन्न भिन्न रूप से दी गयी है। प्रद्युम्न-शाल्व युद्ध का भागवत १०:९०:३३ तथा महाभारत वनपर्व १५:१०-३२; १७:२५; १८:३; १५, १६६; २०:; १०; ७६; १३ में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । यादव वंश संहार के समय भोजों के सम्म प्रद्युम्न मृत हुआ । ( म० मो० : ४ : ३३; भा ११ : ३० : १६; गणेश : १ : ४९ ) मृत्युके अनन्तर वह सनत्कुमार के स्वरूप में प्रविष्ट हो गया । प्रद्युम्न की मायावती पत्नी के अतिरिक्त रुक्मिन की कन्या रुक्मावती अथवा शुभांगी से इसने विवाह किया था। ( भा० १० : ६१ : १८; ८० : १६ ; ) शुभांगी से इसको अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ था । ४६१ (१) आरोग्यशाला : अस्पताल का अर्थ आरोग्यशाला है । कल्हण प्राचीन काल में सार्व- जनिक आरोग्यशाला होने का उल्लेख करता है । कल्हण के इस वर्णन ने इतिहास को एक टूटी श्रृंखला की कड़ी को जोड़ा है । आयुर्वेद एवं आयुर्विज्ञान भारत में अत्यन्त विकसित था । तक्षशिला तथा काशी इस विद्या के केन्द्र थे । बौद्ध काल में समस्त भारतवर्ष तथा विदेश से विद्यार्थी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति सीखने तथा ज्ञान प्राप्त करने के लिये तक्षशिला जाते थे । भगवान् बुद्ध का प्रसिद्ध चिकित्सक जीवक राजगृह से तक्षशिला में आकर शिक्षा प्राप्त किया था । उस समय आजकल के समान सार्वजनिक अस्पताल भी होते थे यह बात कल्हण के उक्त उल्लेख से स्पष्ट होती है। राजतरंगिणी में आरोग्य- शाला स्थापित करने का यह प्रथम उल्लेख मिलता है ।

तृतीय तरंग ५९१ ख्यातिं रणपुरस्वामिसंज्ञया सर्वतो गतम् । स सिंहरोत्सिकाग्रामे मार्ताण्डं प्रत्यपादयत् ॥४६२॥ ४६२. उसने सिंहरोत्सिका ग्राम में रणपुरस्वामी नाम से प्रख्यात मार्तण्ड मन्दिर का निर्माण कराया । अमृतप्रभया तस्य राज्ञः पत्न्याऽन्यया कृतः । दक्षिणेऽस्मिन् रणेशस्य पार्श्वे देवोऽमृतेश्वरः ॥४६३॥ ४६३. उस नृप की अपर पत्नी अमृतप्रभा ने रणेश्वर के दक्षिण पार्श्व में अमृतेश्वर देव की स्थापना की । मेघवाहनभूभर्तृ पत्न्या भिन्नाऽऽख्यया कृते । विहारेऽपि तया बुद्धबिम्बं साधु निवेशितम् ॥४६४॥ ४६४. मेघवाहन नृप पत्नी भिन्ना¹ द्वारा निर्मित विहार में भी उसने सुन्दर बुद्ध प्रतिमा निविष्ट किया । राज्ञे देव्यनुरक्ताय सानुकक्रोशाय सैकदा । पातालसिद्धिदं मन्त्रं प्रददौ हाटकेश्वरम् ॥४६५॥ ४६५. एक बार उस (रणारम्भा स्वयं) ने देवी में अनुरक्त ए सहानुभूति पूर्ण नृपति को पाताल¹ ( विजय ) सिद्धिप्रद हाटकेश्वर मन्त्र प्रदान किया । पाठभेद : कल्हण ने कहीं भी इस प्रकार का गौण रूप से संकेत श्लोक संख्या ४६२ में 'मार्ताण्डं' का पाठभेद भी नहीं किया है। 'मार्तण्डं' मिलता है । ४६४ (१) अमृतेश्वर : इस मन्दिर के स्थान पादटिप्पणियाँ : तथा रूप का पता नहीं चलता । ४६२ (१) सिंहरोत्सिका : इस स्थान का (१) भिन्ना विहार : इसका भी पता नहीं पता नहीं चलता । कल्हण ने पुनः कहीं नहीं वर्णन चलता । किया है कि विष्णु का मन्दिर सूर्य किंवा मार्तण्ड दोनों का पुनः उल्लेख नहीं आया है जिससे रूप में कहीं स्थापित किया था । श्री जनरल इनके स्थान का पता लगाया जा सके । यह अनु- कनिंघम का यह मत कि मार्तण्ड का मध्यवर्ती सन्धान का विषय है । मन्दिर ही यह मन्दिर था और ललितादित्य ने केवल चारों ओर का स्तम्भावलोमय प्राकार का निर्माण ४६५ (१) पाताल : यूनानी लोग पाताल को कराया था । विद्वानों ने, मुख्यतः श्री फरगुसन और 'हेड्स' कहते हैं। वह नागों तथा आंशिक देवी श्री स्टीन ने, अमान्य किया है। यदि मार्तण्ड मन्दिर प्राणियों का स्थान माना जाता है। धारणा है कि रणादित्य का निर्माण कराया होता तो यह बात पाताल लोक नीचे था। कल्हण के काल में लोगों की स्मृति में अवश्य होती ।

५६२ राजतरंगिणी

मा भून्मोघाऽस्य मत्प्राप्तिरिति मत्वा तयाऽर्पितम् । असाधयत्तस् तं प्राप्य वशाम्तं वत्सरान् बहून् ॥४६६॥

४६६. 'मेरी प्राप्ति इसके लिये निष्फल न हो' यह समझकर उसके अर्पित उस वशीमन्त्र को प्राप्त ( राजा ने ) उसे बहुत वर्षों तक सिद्ध किया ।

कृत्वेष्टिकापथे कष्टं तपो नन्दिशिलां गतः । भूरिभिर्वत्सरैर्मन्त्रसिद्धेः प्रणयितां ययौ ॥४६७॥

४६७. 'इष्टिका पथ' में कष्ट साध्य तपस्या कर नन्द शिला२ गया और बहुत वर्षों के था मन्त्र सिद्धि प्राप्त की ।

पाठभेद : श्लोक संख्या ४६६ 'वशाम्तं' का पाठभेद 'वसन्तं', 'वसन्तु, घोर 'धंशान्त' मिलता है । श्लोक संख्या ४६७ में 'कृत्वेष्टि' का 'कृत्वष्टि' तथा 'तपो' का पाठभेद 'ततो' मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ : ४६७ (१) इष्टिका पथ : पवित्र हरमुकुट पर्वत की दिशा में इष्टिका पथ का नाम आता है। यह वह स्थान है जिसका वर्णन नीलमत पुराण (१०८१) में 'पयेश्वर इष्टाः' रूप में किया गया है। यह लार परगना में रामरादन स्थान है। यही से हरमुकुट यात्रा की चडान आरम्भ होती है ।

नीलमत पुराण में उल्लेख मिलता है : गुहेश्वरः शतमुखो यष्टिकापथ एव च । कन्दर्पबलस्तथा पुण्यं क्षेत्रे चैव समन्ततः ॥ 118 = १६०-१६१

(२) नन्दशिला : कल्हण से स्पष्ट नही होता कि उसका नन्दशिला से क्या तात्पर्य है। श्री स्टीन का मत है कि सम्भवतः नन्द शिला नन्दी की गाथा से सम्बन्धित नन्दिक्षेत्र में हरमुकुट पर्वत पर होना चाहिये । नन्दी की उत्पत्ति शिलाद अर्थात् शिलानूर्ण से हुई थी । उसने तपस्या नन्दिनगर में मूर्धापर शिला रखकर किया था। हमान परगना में नन्हेल ग्राम का पुराना नाम नन्दिशिला था। ( वितस्ता माहात्म्य : २४।३३) किन्तु स्थान को पुण्य किया पवित्र रूप में वर्णन नहीं किया गया है। नीलमत में उल्लेख मिलता है।

तस्य मूलमथासाद्य देव्यै वचनमब्रवीत् । इहैव तिष्ठ तावत्त्वमहं यास्याम्यतः परम् ॥ 1057 = १२४१

x x x धूपेन सहितो देवीपर्वतेऽस्मिन् हि यः पथा । करोत्यारोहणं तस्य महत्पुण्यफलं स्मृतम् ॥ 1058 = ११४२

x x x यथा त्वं न समर्थाऽसि सुकुमाराऽसि देवि यत् । आरोढुं तेन यास्येऽहमेक एवाथ सत्वरः ॥ 1069 = १२४३

x x x तस्माद्देशात् प्रवृत्तस्तु गन्तुं देववरः पथा । पार्थाश्वराख्यस्तत्रेष्टो देवस्यायतनोऽभवत् ॥ 1060 = १२४४-१२४५

x ... x आरुरोह यथा शैलं यदा देवो महेश्वरः । तदा वृद्धि मगाच्छैलो महतीं भूरिदक्षिणः ॥ 1061 = १२४५-१२४६

तृतीय तरंग ५९३ स्वप्नैश्च सिद्धिचिह्नश्च जाताभङ्गुरनिश्चयः । चन्द्रभागाजलं भित्त्वा नमुचेः प्राविशद्विलम् ॥४६८॥ ४६८. स्वप्नों एवं सिद्धि सूचक चिह्नों से दृढ़ निश्चय हो (वह) चन्द्रभागा¹ जल का भेदन कर नमुचि² के बिल में प्रवेश किया। ४६८ (१) चन्द्रभागा : काश्मीर तथा पंजाब शतद्रू च विपाशां च पुण्यतोयामिरावतीम् । में प्रवाहित चिनाव नदी । चनाव नदी का संस्कृत देविकां चन्द्रभागां च तथा विष्णुपदं सरः ॥ नाम चन्द्रभागा है। चन्द्रभागा का ही अपभ्रंश 1155 = १२३९ चिनाव तथा चनाव है। वितस्ता से सम्बन्धित कुछ नदियो का नाम राजतरंगिणी तरंग ४:६३८ में वर्णित चन्द्रभागा नीलमत पुराण में आया है। वितस्ता नदी यदि स्रोतस्विनी इससे भिन्न है। चन्द्रभागा का वर्णन उमा की अवतार अर्थात् उमास्वरूप है तो दैत्य नीलमत पुराण में ११६, ११७, १२०, १२१, माता दिति कश्यप की पत्नी ने कश्मीर की १५४, तथा १०५५ में आता है। कल्हण ने चन्द्रभागा चन्द्रावती नदी का रूप धारण कर लिया है। का वर्णन त० ८:५५४ तथा ६२६ में किया है। दितिश्चन्द्रवती जाता कश्यपवचनानुकारिणी । नीलमत पुराण में चन्द्रभागा का निम्नलिखित उल्लेख मिलता है । इस नदी का अभीतक पता नहीं लग सका है। आपगा च नदी पुण्या तोषी तोषितभास्करा । नीलमत पुराण में इसका वर्णन त्रिकोटि तथा हपं चन्द्रांशुशीतलजला चन्द्रभागा सरिद्वरा ॥ पथा के साथ आता है। निर्विवाद है कि यह नदी 116 = १५८-१५६ वितस्ता की सहायक नदी थी । द्रष्टव्य नी० २८९ ४८५, १२९७, १३८९, १३०० ॐ ॐ ॐ पुण्यं च चन्द्रभागायास्तीर्थं वै षष्टिलामुखम् । अनन्त नाग के समीप चार ओर स्रोतस्विनियां दीक्षमण्डलनामा च तथा पापनिसूदनः ॥ आकर वितस्ता में मिल जाती हैं। उनके नाम 117 = १५९-१६० हैं; सन्द्रन, ब्रिङ्ग, अरिपथ तथा लिदर । सन्द्रन

    • ॐ नदी दक्षिण में बहती है और शाहिबाबाद क्षेत्र अर्थात् सर्वत्रैव सदा पुण्या चन्द्रभागा महानदी । प्राचीन वेर परगना का पानी लेकर वितस्ता में माघशुक्लत्रयोदश्यां पुष्ययोगे विशेषतः ॥ मिलती है। वह अनेक पवित्र स्रोतस्विनियों का 120 = १६२-१६३ जल भी लाती है। इस नदी का प्राचीन नाम क्या ॐ ॐ ॐ था कहना कठिन है । पृथिव्यां यानि तीर्थानि ह्रासमुद्रसरांसि च । ब्रिङ्ग नदी ब्रिङ्ग परगना का जल लाती है। चन्द्रभागां गमिष्यन्ति माघशुक्लत्रयोदशीम् ।। वितस्ता माहात्म्य में इसका नाम भृगो दिया गया है। 121 = १६३ १६४ यह सन्देहात्मक है। इस नदी में प्रसिद्ध त्रिसन्ध्या तथा
      • अर्धनारीश्वर अर्थात् नारू स्रोतस्विनियो का जल अश्वारूढ़ा विपाशा च गजारूढ़ा इरावती । लाता है। इन्द्र की पत्नी शची देवी ने स्वयं हर्य- सिंहेन चन्द्रभागा च सिन्धुर्व्याघ्रेण पार्थिव ॥ पथा नदी का रूप धारण किया है। दक्षिण पूर्व से 154 = २०६ आकर वितस्ता में मिलती है। हर्यपथा नाम से ७५

५९४ राजतरंगिणी बिलेऽपावृत्ततां याते दिवसान्येकविंशतिम् । प्रवेश्य पौरान्प्राङ्निन्ये दैत्यस्त्रीभोगभागिताम् ॥४६९॥ ४६९. इक्कीस दिनों तक बिल के अनावृत रहने पर पुरवासियों को प्रविष्ट करके दैत्य स्त्रियों के भोग का पात्र बनाया । नीलमत पुराण में इसका वर्णन मिलता है । वर्तमान नीलमत पुराण में दैत्य का उल्लेख नाम अरिपथ है। यह कोयर परगना के जल को लाती निम्नलिखित रूप से किया गया है। है । कोयर शब्द कपटेश्वर सर का अपभ्रंश है । ससुताः पार्थिवश्रेष्ठ तासां नामानि मे शृणु । कपटेश्वर के पश्चिमो शैलबाहु पर यह तीर्थ स्थित अदितेस्तनया देवा दितेर्दैत्यास्तथैव च ॥ है । यहाँ से भक्षवाल अर्थात् अचवल का भव्य जल- 47 = ७०-७१ स्रोत निकलता है । जल स्रोतस्विनो का रूप धारण * * * कर हपंथा में प्रवाहित हो जाता है । (नी० २३२, लब्धमायस्तु दैत्येन्द्रो भक्षयामास मानवान् । २८९, ९९५ ) समीपे सरमस्तस्य नानादेशेष्ववस्थितान् ॥ अनवल ग्राम से कुछ अधोभाग जहाँ उक्त 70 = १२०-१२१ तीनों स्रोतस्विनियाँ मिलती हैं वहाँ उत्तर से लिदर * * * (प्राचीन) लेदरी नदी अपने जल के साथ आकर मिलती भगवन्विदितं सर्वं यथा पूर्वं मया शिशुः । है। उसमें सिन्ध उपत्यका के बहुत हिमानियों के पालितः संप्रह्रसुतो दैत्यो नाम्ना जलोद्भवः ॥ जल आकर मिलते हैं। दाछुनपुर तथा खेलुरपुर 136 = १०९ परगनो के पानी को लाती है । प्राचीन काल लेदरी * * * नदी से एक नहर द्वारा पानी मार्तण्ड अर्थात् मटन देवानुयात्रानिनदं श्रुत्वा दैत्योऽपि दुर्मतिः । पहुँचाया गया था जहाँ कृपा होती थी । जले व्यवध्यमात्मानं विदित्वा न विनिर्गतः ॥ पाठभेद : 162 = २१४ श्लोक संख्या ४६९ में 'दिवसान्येक' का * * * 'दिवसानेक' तथा 'भागिताम्' का पाठभेद 'भोगिताम्' ततश्चानन्तो गिरिसंनिकाशः मिलता है । समप्रचन्द्रस्य समानकान्तिः । पादटिप्पणियाँ : व्यवर्धतावृष्य महीं दिवं च ४६९ (१) दैत्य : असुरों में एक दैत्य है । संत्रासयन्दैत्यगणान्समन्तात् ॥ उनकी माता दिति थी । पिता कश्यप थे । गुरु 169 = २१९ शुक्राचार्य हैं। उनके देवता वरुण तथा वायु हैं । * * * हिरण्यकश्यप को दैत्यपति कहा गया है। दैत्यो ध्वस्तेऽन्धकारे हरिरप्रमेयो का युग देव मान से १२ हजार वर्षों का होता है । योगेन गत्वा स्वपरं शरीरम् । दक्ष प्रजापति की कन्या दैत्यसेना थी । उसका दैत्येन युद्धं स चकार सार्धं पति केशी दैत्य था । दैत्य का पर्यायवाची नाम देहेन चान्येन च युद्धमैक्षत् ॥ असुर—दैत्य, दैतेय, दनुज, इन्द्रारि, दानव, 172 = २२४-२२५ शुक्रशिष्य, दितिसुत, पूर्वदेव, एवं सुरद्विप हैं।

तृतीय तरंग ५९५ स एवं भूपतिर्भुक्त्वा भुवं वर्षशतत्रयम् । निर्वाणश्लाघ्यनिर्व्यूढि पातालेशैश्वर्यमासदत् ॥४७०॥ ४७०. इस प्रकार उस नृपति ने तीन सौ वर्षों तक पृथ्वी का भोगकर निर्वाण श्लाघ्य अन्तिम स्थिति (सर्वोच्च पद) प्राप्त किया¹। सानुगे नृपतौ याते दैतेयदयितान्तिकम् । देवी सा वैष्णवी शक्तिः श्वेतद्वीपमगाहत ॥४७१॥ ४७१. अनुचर सहित नृपति के पाताल प्रचारोपरान्त वह देवी वैष्णवी शक्ति श्वेत द्वीप¹ चली गयी। विष्णोश्च दैत्येन बभूव युद्धं दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह । घोरं द्रुमैः पर्वतमस्तकैश्च । वर्जयन्ति तदा मांसं मांसादा दिनपञ्चकम् ॥ युद्धं च ते देवगणाः समस्ताः 447 = ५५८ प्रहृष्टचित्ता ददृशुः समन्तात् ॥ * * * 172 = २२५-२२६ कुबेरो धर्मलटकौ दैत्यराजः पडङ्गकः । ततो हरिः क्रोधविवृत्तनेत्रः गन्धर्वो धृतराष्ट्रश्च कुसुमः कुहरः कुढः ॥ चक्रेण देवप्रवरः समान्ते । 903 = १०६९-१०७० चिच्छेद दैत्यस्य शिरः प्रसय * * * गङ्गा ततस्तोयमुपाजगाम । त्रिपुरारे नमस्तेऽस्तु नमस्त्वन्धकघातिने । 174 = २२६-२२७ शूलाप्रभिन्नदैत्यांशरुधिरार्द्र नमोऽस्तु ते ॥

      • 1092 = १२९० चक्रमर्पय मे देव दैत्यसंघविनाशनम् । * * * प्रहसन्नमुवाचाथ हरिं हास्येन शंकरः । पाठभेद : = 190 = २४६-२४८ श्लोक संख्या ४७० में 'स एवं' का 'एवं स';
      • 'निर्व्यूढि' का 'व्यूढ' तथा 'सैश्वर्य' का पाठभेद तत्र सन्ति पिशाचा ये दैत्यपक्षाः सुदारुणाः । 'लैश्वरं' मिलता है। तेषां तु निग्रहार्थाय पिशाचाधिपतिर्बली ॥ पादटिप्पणियाँ : 204 = २७७-२८८ ४७० (१) आइने अकबरी में उल्लेख है—
      • राजा न्यायप्रिय था। विजय भी किया। चनाब सतः शची शक्रपत्नी नाम्ना शक्रपथा नदी । नदी पर कुश्तवार के समीप यह अपने अनेक सतश्चन्द्रवती नाम दितितैत्यारिणिनृपः ॥ सम्बन्धियों तथा पार्षदों के साथ एक गुहा में चला 289 = ३८७-३८८ गया। उनके विषय में पुनः नहीं सुना गया कि
      • उनका क्या हुआ। उसके वीरतापूर्ण कार्यों के त्वया विनिहता दैत्या देवब्राह्मणकण्टकाः । सम्बन्ध में अनेक कहानियां प्रचलित है। वरदश्च वरेण्यश्च सुरारिसंघहृा विभो ।। 354 = ४५७ ४७१ (१) श्वेतद्वीप : शाब्दिक अर्थ उज्ज्वल
      • किंवा श्वेतद्वीप होता है। प्राचीन परम्परा के अनु-

५९६ राजतरंगिणी राजवंशेष्वनेकेषु राज्ञोर्वंशद्वये परम् । द्वयोरेवात्र निर्व्यूढिं प्रजावात्सल्यमागतम् ॥४७२॥ ४७२. अनेक राजवंशो में दो राजवंश के दो नृपति उत्कृष्ट हुए। दोनों का ही प्रजा वात्सल्य पराकाष्ठा को प्राप्त हुआ¹। रणादित्यस्य गोनन्दवंशे रामस्य राघवे । लोकान्तरसुखस्यापि ययोरंशभुजः प्रजाः ॥४७३॥ ४७३. गोनन्द वंश में रणादित्य ए रघु वंश में राम¹ (उत्कृष्ट) हुए जिनकी प्रजा लोकान्तर सुख की भागी हुई। विक्रमाक्रान्तदिश्वस्य विक्र्मेश्वरकृत्सुतः । तस्यासीत् विक्रमादित्यः त्रिविक्रमपराक्रमः ॥४७४॥ ४७४. त्रिविक्रम¹ तुल्य पराक्रमी विक्रमादित्य² उसका पुत्र था। जिसने अपने पराक्रम से विश्वविजय एवं विक्रमेश्वर³ का निर्माण किया।

सार द्वीप पार्थिव जगत् का विभाजन है। इस विभाजन की गणना में साम्य नहीं है। इसे चार, सात, नव तथा तेरह भी कहा गया है। नैषध चरित में १८ विभाजन किये गये हैं। पर सब द्वीप मेरु के चारो ओर स्थित कहे गये हैं। मेरु को सुवर्ण पर्वत प्रफुल्लित कमल तुल्य कहा गया है। उसके केन्द्र में जम्बू द्वीप है। इस जम्बूद्वीप में ही भारतवर्ष है। द्वीप का शाब्दिक अर्थ जल से आवृत भूमि होता है। कुछ लेखको के मतसे प्राचीन काल में श्वेत द्वीप से यूरोप का अर्थ लगाया गया है। ४७२ (१) श्री स्टीन ने श्लोक ४७२ तथा ४७३ का एक साथ अनुवाद किया है। वह श्लोक 'युग्मकम्' नहीं है अतएव मैंने दोनों का अलग अलग अनुवाद किया है ४७३ (१) राम : वाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड १०१-११० में रामचन्द्र के अयोध्या में सरयू नदी में शरीर विसर्जन की कथा हृदयस्पर्शी शब्दों में दी गयी है। वहाँ उल्लेख किया गया है कि भगवान् राम की अनुगामिनी उनकी प्रजा हुई थी। ४७४ (१) त्रिविक्रम : यहाँ पर विष्णु किंवा वामन हैं। तीन पग से वामन अवतार में भगवान् ने जगत् को नाप लिया था अतएव उन्हें त्रिविक्रम कहा गया है। (२) विक्रमादित्य : कतिपय लेखकों ने विक्रमादित्य किसका पुत्र था सन्देह प्रकट किया है। तरंग के श्लोक ३४२१ में स्पष्ट प्रकट होता है कि यह वास्तव में रणादित्य का ही पुत्र था। श्री विल्सन से विक्रमादित्य के राज्याभिषेक का समय सन् ५३७ ई० ५ मास तथा समीकृत काल सन् ५६८ ई० और राज्यकाल ४२ वर्ष दिया है। श्री एस. सी. पण्डित वह समय सन् ५१७ ई. देते हैं। तथा राज्यकाल ४२ वर्ष देते हैं। स्टीन यह समय लौकिक संवत् ३५९९ मास २ तथा एक दिन तथा राज्यकाल ४२ वर्ष देते हैं। कलि गताब्द ३६५९ वर्ष ११ मास १३ दिन तथा ट्रायेर के मत से सन् ५१७ ई० ११ मास और कनिघम के अनुसार वह समय सन ५५६ ई० ५ मास आता है।

तृतीय तरंग ५६७ राजा ब्रह्मगलूनाभ्यां सचिवाभ्यां समं महीम् । सोऽपासीद्वासवंसमो द्वाचत्वारिंशतिं समाः ॥४७५॥ ४७५. वासव (इन्द्र) समान उस राजा ने ब्रह्मा एवं गलून सचिवों के साथ बयालीस वर्ष पृथ्वी पर व्यतीत किया । चक्रे ब्रह्ममठं ब्रह्मा गलूनो लूनदुष्कृतः । रत्नावल्याख्यया वध्वा विहारं निरमापयत् ॥४७६॥ ४७६. ब्रह्मा ने ब्रह्ममठ एवं दुष्कृतच्छेत्ता गलून ने रत्नावली नाम्नी स्त्री के नाम से विहार निर्मित कराया । राज्ञोऽनन्तरजस्तस्य राजाऽभूत्तदनन्तरम् । तापितारातिभूपालो बालादित्यो बलोजितः ॥४७७॥ बालादित्य : ४७७. अनन्तर राजा का लघुभ्राता बलशाली बालादित्य राजा हुआ। जिसने शत्रु भूपालों को संतप्त किया । श्री स्तीन ने श्लोक ३४७५ में 'द्वाचत्वारिंशति' का अर्थ ४२ वर्ष किया है परन्तु श्रीरणजीत सीताराम पण्डित ने ४० वर्ष किया है । पं० रामतेज शास्त्री ने भी ४२ वर्ष अनुवाद किया है । श्री गोपीकृष्ण शास्त्री ने ४० वर्ष अर्थ लगाया है । श्री चन्द्रकान्त वाली ने ४२ वर्ष गणना की है । परिशेष में श्री स्तीन ने पुनः ४३ वर्ष दिया है । विक्रमादित्य के पश्चात् बालादित्य के राज्यारोहण काल से गणना करने पर भी ४२ वर्ष ही आता है । अतएव मैंने ४२ वर्ष ही रखा है । धी विदिउद्दीन ने एक विचित्र कपोलकल्पना इतिहास को अपने रंग में रंगने के लिये दी है । वह कहता है । राजा की आयु १६५ वर्ष की हुई थी । उसने ४० वर्ष से अधिक राज्य किया था । उसका राज्यकाल प्रथम हिजरी का समकालीन है । उसने पैगम्बर मुहम्मद साहब के पास राजदूत भेजा था । किन्तु कोई प्रमाण उपस्थित नहीं करता । आईने अकबरी में अबुल फजल ने नाम बलदूत दिया है । (३) विक्रमेश्वर : दिद्दा मठ के २ मिल उत्तर विचार नाग के समीप श्री आनन्द कौल के अनुसार विक्रमेश्वर का मन्दिर था । सिकन्दर बुत शिकन ने इसे ध्वस्त किया था । उसने मन्दिर के ध्वंसावशेष से मसजिद तथा खंन्खाह निर्माण कराया था । ( पृष्ठ २६ ) पाठभेद : श्लोकसंख्या ४७५ में 'गलूना' का पाठभेद 'गलूरा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४७७ ( १ ) श्री विल्सन के राज्याभिषेक का समय सन् ५७९ ई० ५ मास तथा समीकृत काल सन् ५९२ ई० तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है । श्री एस. पी. पण्डित ने समय सन् ५५९ ई. तथा राज्य काल ३७ वर्ष ४ मास दिया है । श्री स्तीन ने यह समय लौकिक संवत् ३६५१ मास २ तथा दिन प्रथम तथा राज्य काल का समय ३६ वर्ष ८ मास दिया है ।