राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५८७ रणारम्भानुभावेन तावदेवाद्भुतावहः । स्वयं पीठे रणस्वामी भित्त्वा यन्त्रमुपाविशत् ॥४५४॥ ४५४. तब तक रणारम्भा के प्रभाव से विस्मय करने वाले स्वयं रण स्वामी१ यन्त्र भेदन कर पीठ पर बैठ गये ।
४५४ का अनुवाद एक ही साथ किया है। परन्तु दोनो श्लोको को युग्मक श्री कल्हण ने नही लिखा है अतएव उसी का अनुकरण कर यहाँ दोनो का अनुवाद अलग अलग दिया गया है ।
४५३ (१) रणेश्वर : यह देवस्थान श्रीनगर में अथवा उसके समीप था । रणस्वामी से दूर नहीं था वे एक दूसरे के समीप थे । रणेश किंवा रणेश्वर का पुनः उल्लेख कल्हण ने नहीं किया है । यह मन्दिर कहाँ था इसका निश्चयात्मक पता नहीं चलता ।
श्री आनन्द कौल इस मन्दिर के सम्बन्ध में श्री स्टीन के मत का उल्लेख करते हैं। वह रणेश्वर के मन्दिर के विषय में इतना कहते हैं कि विचार नाग से दो मिल दक्षिण रणेश्वर का मन्दिर रणादित्य ने निर्माण कराया था । उनके मत से इस मन्दिर के लिये मदनी साहब की ज़ियारत की गवेषणा करनी चाहिए ।
४५४ ( १ ) रणस्वामी : यह मन्दिर श्री- नगर में अथवा उसके और रणेश्वर के समीप स्थित था । रणस्वामी का देवस्थान अधिक प्रसिद्ध मालूम होता है । इस स्थान का पता अन्य उल्लेखों से लगाया जा सकता है । तरंग ५ : ३९४ में इसका पुनः उल्लेख चक्रवर्मा की रानी का माघ मास में यहाँ आनेका मिलता है। यह समय कश्मीर उपत्यका में भयंकर तुषारपात होता है । इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस देवस्थान का मार्ग अत्यधिक तुषार पात के समय भी सुगम तथा सरल रहा होगा ।
मंख ने श्रीकंठचरित ( ३:६८ ) में वर्णन किया है कि उसके पिता इस मन्दिर में पूजा करने के लिये जाया करते थे। श्री जोनराज ने भी इस के सम्बन्ध में लिखा है—‘श्री प्रवरपुर प्रधान देवता’ श्रीप्रवरपुर का अर्थ श्रीनगर है। श्रीनगर के प्रधान देवता का श्रीनगर मे होना स्वाभाविक प्रतीत होता है ।
जोनराज ने अपनी राजतरंगिणी में लिखा है (श्लोक ८७२) कि बड़शाह जैनुल आबदीन ने 'जैन गंगा' नहर को अपने नवीन नगर जैन नगरी में रण स्वामी तक बनवाकर ले आया था ।
जोनराज के वर्णन ( ८७० ) से प्रतीत होता है कि जैन नगरी प्रद्युम्न नगरी ( हर पर्वत ) तथा अमरेशपुर ( अम्बरहर तरंग १:२८७ ) उसकी अन्तिम सीमा थी । इससे प्रतीत होता है कि जैन गंगा ही वर्तमान नहर लछम कुल अर्थात् लक्ष्मण कुल्या है। यह नहर सिन्धु नदी से जल अम्बरहर से होती नौशहर तथा संगीन दरवाजा तक पानी लाती है । हरपर्वत के पश्चिम तरफ संगीन दरवाजा है । यह नहर दक्षिण दिशा की ओर चलती जामा मसजिद तक जाती है मार नहर में कादी कदल पुल के पास मिल जाती है ।
जोनराज ने अपनी तरंगिणी सन् १४४६— १४५९ ई० में लिखी थी । जैनुल आबदीन के समय लछमकल यह वही है जिसे जोनराज ने देखा था । श्री स्टीन का मत है कि रणस्वामी का मन्दिर मार तथा लछम कुल नहर के कोने पर टूटा पड़ा मन्दिर है । यह अब तक इसलिये वर्तमान है कि मुसलमानों ने इस मन्दिर को ज़ियारत पीर हाजी मुहम्मद साहेब में परिवर्तित कर लिया है ।