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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

तृतीय तरंग ५८७ रणारम्भानुभावेन तावदेवाद्भुतावहः । स्वयं पीठे रणस्वामी भित्त्वा यन्त्रमुपाविशत् ॥४५४॥ ४५४. तब तक रणारम्भा के प्रभाव से विस्मय करने वाले स्वयं रण स्वामी१ यन्त्र भेदन कर पीठ पर बैठ गये ।

४५४ का अनुवाद एक ही साथ किया है। परन्तु दोनो श्लोको को युग्मक श्री कल्हण ने नही लिखा है अतएव उसी का अनुकरण कर यहाँ दोनो का अनुवाद अलग अलग दिया गया है ।

४५३ (१) रणेश्वर : यह देवस्थान श्रीनगर में अथवा उसके समीप था । रणस्वामी से दूर नहीं था वे एक दूसरे के समीप थे । रणेश किंवा रणेश्वर का पुनः उल्लेख कल्हण ने नहीं किया है । यह मन्दिर कहाँ था इसका निश्चयात्मक पता नहीं चलता ।

श्री आनन्द कौल इस मन्दिर के सम्बन्ध में श्री स्टीन के मत का उल्लेख करते हैं। वह रणेश्वर के मन्दिर के विषय में इतना कहते हैं कि विचार नाग से दो मिल दक्षिण रणेश्वर का मन्दिर रणादित्य ने निर्माण कराया था । उनके मत से इस मन्दिर के लिये मदनी साहब की ज़ियारत की गवेषणा करनी चाहिए ।

४५४ ( १ ) रणस्वामी : यह मन्दिर श्री- नगर में अथवा उसके और रणेश्वर के समीप स्थित था । रणस्वामी का देवस्थान अधिक प्रसिद्ध मालूम होता है । इस स्थान का पता अन्य उल्लेखों से लगाया जा सकता है । तरंग ५ : ३९४ में इसका पुनः उल्लेख चक्रवर्मा की रानी का माघ मास में यहाँ आनेका मिलता है। यह समय कश्मीर उपत्यका में भयंकर तुषारपात होता है । इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस देवस्थान का मार्ग अत्यधिक तुषार पात के समय भी सुगम तथा सरल रहा होगा ।

मंख ने श्रीकंठचरित ( ३:६८ ) में वर्णन किया है कि उसके पिता इस मन्दिर में पूजा करने के लिये जाया करते थे। श्री जोनराज ने भी इस के सम्बन्ध में लिखा है—‘श्री प्रवरपुर प्रधान देवता’ श्रीप्रवरपुर का अर्थ श्रीनगर है। श्रीनगर के प्रधान देवता का श्रीनगर मे होना स्वाभाविक प्रतीत होता है ।

जोनराज ने अपनी राजतरंगिणी में लिखा है (श्लोक ८७२) कि बड़शाह जैनुल आबदीन ने 'जैन गंगा' नहर को अपने नवीन नगर जैन नगरी में रण स्वामी तक बनवाकर ले आया था ।

जोनराज के वर्णन ( ८७० ) से प्रतीत होता है कि जैन नगरी प्रद्युम्न नगरी ( हर पर्वत ) तथा अमरेशपुर ( अम्बरहर तरंग १:२८७ ) उसकी अन्तिम सीमा थी । इससे प्रतीत होता है कि जैन गंगा ही वर्तमान नहर लछम कुल अर्थात् लक्ष्मण कुल्या है। यह नहर सिन्धु नदी से जल अम्बरहर से होती नौशहर तथा संगीन दरवाजा तक पानी लाती है । हरपर्वत के पश्चिम तरफ संगीन दरवाजा है । यह नहर दक्षिण दिशा की ओर चलती जामा मसजिद तक जाती है मार नहर में कादी कदल पुल के पास मिल जाती है ।

जोनराज ने अपनी तरंगिणी सन् १४४६— १४५९ ई० में लिखी थी । जैनुल आबदीन के समय लछमकल यह वही है जिसे जोनराज ने देखा था । श्री स्टीन का मत है कि रणस्वामी का मन्दिर मार तथा लछम कुल नहर के कोने पर टूटा पड़ा मन्दिर है । यह अब तक इसलिये वर्तमान है कि मुसलमानों ने इस मन्दिर को ज़ियारत पीर हाजी मुहम्मद साहेब में परिवर्तित कर लिया है ।

४६८ राजतरंगिणी कर्तुं प्रभावजिज्ञासां राज्ञा दत्तधनस्ततः । सं स्वयंभूः स्वयं भक्तैः तांस्तान्ग्रामानदापयत् ॥४५५॥ ४५५. प्रभाव के जिज्ञासा हेतु उन्हें धन अर्पित किया। तदनन्तर स्वयं उन स्वयंभू ने भक्तों को तत्तत् ग्राम प्रदात कराया। कुम्भदासत्या छन्नः सिद्धो ब्रह्मभिधो वसन् । परिज्ञाय तयोर्देव्या प्रतिष्ठाकर्म कारितः ॥४५६॥ ४५६. कुम्भदास' (जल लाने वाला) के रूप में छिपकर रहते हुए ब्रह्म नामक सिद्ध को जान कर रानी ने उसके द्वारा दोनों (मूर्तियों) का प्रतिष्ठा कर्म कराया। स वृत्तप्रत्यभिज्ञः सन्प्रतिष्ठाप्य रणेश्वरम् । व्योम्ना व्रजन् रणस्वामिप्रतिष्ठां गूढमादधे ॥४५७॥ ४५७. रणेश्वर की प्रतिष्ठा करके परिचय ज्ञात हो जाने पर आकाश से जाते हुए रण स्वामी की प्रतिष्ठा गुप्त रूप से की। दीवालों के अतिरिक्त जो अष्टकोणीय कक्षा पर बनी है तथा दो सीढ़ियां जो इसके दोनो द्वारों पर गयी हैं। मन्दिर के प्रांगण के प्राकार की दीवारें भी आज तक खड़ी हैं। किसी का ध्यान इस ओर नही गया है। कश्मीर के पुरातत्व के कागजों में भी इसका उल्लेख नही किया गया है। श्री स्टीन ने एक दूसरा विकल्प भी दिया है। वे कहते हैं— लछम कुल प्राचीन समय में यदि ओर उत्तर दिशा में उस शाखा में मिली होती जो डल लेक में जाकर कूट कदल के पास जाकर मिल जाती है तो रणस्वामी के मन्दिर का ध्वंन्सावशेष संगीन दरवाजा के उत्तरौद भाग में मादिन साहब की मसजिद में बिखरे प्राचीन मन्दिरो के ध्वंसावशेष में खोजना होगा। श्री पण्डित साहेबराम ने अपने तीर्थों में केवल इतना ही लिखा है। रणस्वामी का मन्दिर हर पर्वत के पश्चिम में था। उन्होंने कोई निश्चित स्थान नहीं बताया है। 'पाठभेद' श्लोक संख्या ४५५ में 'भक्तै' का पाठभेद 'मरुता' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४५५ (१) स्वयंभू : यह मानव निर्मित प्रतिमा तथा स्थान नही होता था अपितु स्वयं प्रजापति का कर्तृत्व समझा जाता था। रा. तं. १ : ३४, पृष्ठ ७३ द्रष्टव्य है। श्री स्टीन, श्री रणजीत सीताराम पण्डित एवं अन्य अनुवादकों ने श्लोक संख्या ४५६-४५८ का एक ही साथ अनुवाद 'तिलकम्' के रूप में किया है। किन्तु श्री कल्हण ने उन्हें 'तिलकम्' नहीं लिखा है। अतएव उनका अनुवाद अलग अलग किया गया है। ४५६ (१) कुम्भदास : कुम्भकार का अर्थ कुम्हार होता है। अर्थात् घड़ा बनाने वाले का नाम कुम्भकार होता है। कुम्भ दास का अर्थ होगा कुम्भ-घड़ा का दास। यह शब्द यहाँ पर कर्म का बोधक है। कुम्भ की सेवा का तात्पर्य कुम्भ से जल ले जाना ही हो सकता है। वाटर पाइप लगने के पूर्व कश्मीरी हिन्दू ब्राह्मणो के घर में क्षत्रिय तथा उनकी स्त्रियां घड़ों अर्थात् कुम्भ से जल भरती थी। वे मासिक पारिश्रामिक पाती थी। पुरुष जल भरने वाले को कुम्भदास तथा जल भरने वाली स्त्री को कुम्भदासी कहा जाता था। कल्हण ने कुम्भदासी का पुनः उल्लेख त० ८ : १७३६ में किया है।

: तृतीय तरंग ५८९ जनास्त्वलखयन् यत्स स्वयं पीठमवातरत् । इति केषामपि हृदि प्रवादोऽद्यापि वर्तते ॥४५८॥ ४५८. लोगों ने देखा कि वे स्वयं पीठ पर अवतरित हुए-यह प्रवाद आज भी किसी-किसी के हृदय में (स्थित) है। सा ब्रह्मप्रतिमं सिद्धं देवी ब्रह्मविदां वरम् । अकारयत्समुद्दिश्य परार्ध्यं ब्रह्ममण्डपम् ॥४५६॥ ४५९. ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मप्रतिम उस सिद्ध को उद्देश्य कर उस देवी ने बहुमूल्य ब्रह्म मण्डप निर्मित कराया । रणारम्भास्वामिदेवौ दंपत्तिभ्यां व्यधीयत । मठः पाशुपतानां च ताभ्यां प्रद्युम्नमूर्धनि ॥४६०॥ ४६०. रणारम्भा स्वामी एवं रणारम्भादेव को दम्पति ने बनवाया । प्रद्युम्न मूर्धा (शिखर) पर पाशुपतों के लिये मठ निर्मित कराया । पाठभेद : जोड़ा है । प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध थे । श्लोक संख्या ४५८ में 'प्रवादो' का पाठभेद इस पर्वत के पूर्वीय ढाल पर बहुत पैमाने में 'प्रवचो' मिलता है । फैली मुसलिम जियारतें मुरुद्दम साहित्य तथा श्लोकसंख्या ४५९ में 'परार्ध्य' का 'परार्द्धं' आखूनमुल्ला शाह की है । यह सब प्राचीन मन्दिर तथा 'मण्डपम्' का पाठभेद 'सत्तमम्' मिलता है । मठो तथा विहारों के स्थानों पर बनी है। यद्यपि श्लोकसंख्या ४६० में 'देवो' का 'देवी' रणस्वामी एवं रणेश्वर के मन्दिरों की तरह यह 'दम्पतिभ्यां' का 'दम्पतीभ्यां' तथा 'प्रद्युम्नमूर्धनि' भी समीप ही स्थित है परन्तु निश्चयात्मक रूप से का पाठभेद 'शारिकागिरौ' मिलता है । नहीं कहा जा सकता कि वे रणस्वामी एवं रणेश्वर पादटिप्पणियाँ : के ही स्थान थे । पता नहीं जब मैने इस स्थानों ४६० (१) प्रद्युम्न मूर्धा: प्रद्युम्न मूर्धा किंवा को देखा तो भावुकतावश यह धारणा हो गयी कि शिखर हर अथवा शारिका पर्वत के लिये प्रयुक्त रणस्वामी तथा रणेश्वर के ध्वन्सावशेष यही थे । किया गया है। इसे हर पर्वत भी कहते हैं। परन्तु वह मेरे मन का भ्रम ही हो सकता है । इसका उल्लेख प्रद्युम्न पीठ, प्रद्युम्न गिरि, तथा इसका कोई प्रमाण नहीं प्रतीत होता । किन्तु न प्रद्युम्नशिखर नाम से किया गया है (त. ७:१६- जाने वहाँ आनेपर मुझे क्यों हार्दिक सन्ताप जैसा १६; विक्रमांक देव चरित, विल्हण ; १८।१५; हुआ । मन रोने लगा । आंखो के सम्मुख जोनराज; ५८७, ८७०; श्रीवर १:६३१, २:८८, जैसे मूर्तियां थाने लगीं। मुझे अच्छी तरह स्मरण तथा महादेव माहात्म्य २।७)। है मूर्तियों के मुख से करुणा जैसे झलक रही थी । सोमदेव ने कथासरित्सागर (७३:१०९) में वे कह रही थीं-क्या था ? क्या होगया ? मै उस इस पर्वत को उषा और अनिरुद्ध की प्रेम कथा से समय के अपने भाव को व्यक्त करने में सर्वथा असमर्थ पाता हूँ।

५९० राजतरंगिणी आरोग्यशाला निरघाऽप्युल्लाघत्वाय रोगिणाम् । तेन सेनामुखीदेवीभयशान्त्यै च कारिता ॥४६१॥ ४६१. उसने रोगियों के आरोग्य एवं सेनामुखी देवी के भय शान्ति हेतु सुन्दर आरोग्यशाला' स्थापित किया । नीलमत पुराण में प्रद्युम्न नाग का उल्लेख मिलता है । सूनौ द्वौ सुपाश्र्वेश्च सुनासः पञ्चहस्तकः । प्रद्युम्नश्चाम्धकः शम्भुः साल्वो मूलेश्वरो घपः ॥ 888 = १०५८ योग वासिष्ठ रामायण में हरपर्वत शिखर किंवा शारिका पर्वत शिखर को प्रद्युम्न शिखर कहा गया है । ( स्थिति प्रकरण : सर्ग : ३२ : श्लोक : १२ ) पुराणों में तीन प्रद्युम्न नामक व्यक्तियों का वर्णन मिलता है । भागवत पुराण ( ४ : १३ : १६) के अनुसार प्रद्युम्न एक राजा था। वह चक्षुर्मनु के बारह पुत्रों में से एक था । इसकी माता का नाम नड्वला था । सुद्युम्न भी इसका एक नामान्तर है । वायुपुराण के अनुसार प्रद्युम्न एक राजा था । यह भानुमत् राजा का पुत्र था । महाभारत अनुशासन पर्व के अनुसार प्रद्युम्न श्रीकृष्ण का पुत्र था । उसकी माता का नाम रुक्मिणी था । सनत्कुमार का अंश था । यह पूर्व जन्म में मदन था। शम्बरासुरका वध करने के लिये अवतार लिया था । शम्बरासुर की स्त्री मायावती पूर्व जन्म में प्रद्युम्न की पत्नी रति थी । पूर्व जन्म में मदन की मृत्यु के पश्चात् उसकी स्त्री रति को शम्बरासुर हर ले गया था । शम्बरा- सुर से बदला लेने के लिये प्रद्युम्न का अवतार लिया था । शम्बरासुर तथा प्रद्युम्न की कथा विष्णु, भागवत, हरिवंश तथा ब्रह्मवैवर्त पुराणों में भिन्न भिन्न रूप से दी गयी है। प्रद्युम्न-शाल्व युद्ध का भागवत १०:९०:३३ तथा महाभारत वनपर्व १५:१०-३२; १७:२५; १८:३; १५, १६६; २०:; १०; ७६; १३ में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । यादव वंश संहार के समय भोजों के सम्म प्रद्युम्न मृत हुआ । ( म० मो० : ४ : ३३; भा ११ : ३० : १६; गणेश : १ : ४९ ) मृत्युके अनन्तर वह सनत्कुमार के स्वरूप में प्रविष्ट हो गया । प्रद्युम्न की मायावती पत्नी के अतिरिक्त रुक्मिन की कन्या रुक्मावती अथवा शुभांगी से इसने विवाह किया था। ( भा० १० : ६१ : १८; ८० : १६ ; ) शुभांगी से इसको अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ था । ४६१ (१) आरोग्यशाला : अस्पताल का अर्थ आरोग्यशाला है । कल्हण प्राचीन काल में सार्व- जनिक आरोग्यशाला होने का उल्लेख करता है । कल्हण के इस वर्णन ने इतिहास को एक टूटी श्रृंखला की कड़ी को जोड़ा है । आयुर्वेद एवं आयुर्विज्ञान भारत में अत्यन्त विकसित था । तक्षशिला तथा काशी इस विद्या के केन्द्र थे । बौद्ध काल में समस्त भारतवर्ष तथा विदेश से विद्यार्थी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति सीखने तथा ज्ञान प्राप्त करने के लिये तक्षशिला जाते थे । भगवान् बुद्ध का प्रसिद्ध चिकित्सक जीवक राजगृह से तक्षशिला में आकर शिक्षा प्राप्त किया था । उस समय आजकल के समान सार्वजनिक अस्पताल भी होते थे यह बात कल्हण के उक्त उल्लेख से स्पष्ट होती है। राजतरंगिणी में आरोग्य- शाला स्थापित करने का यह प्रथम उल्लेख मिलता है ।

तृतीय तरंग ५९१ ख्यातिं रणपुरस्वामिसंज्ञया सर्वतो गतम् । स सिंहरोत्सिकाग्रामे मार्ताण्डं प्रत्यपादयत् ॥४६२॥ ४६२. उसने सिंहरोत्सिका ग्राम में रणपुरस्वामी नाम से प्रख्यात मार्तण्ड मन्दिर का निर्माण कराया । अमृतप्रभया तस्य राज्ञः पत्न्याऽन्यया कृतः । दक्षिणेऽस्मिन् रणेशस्य पार्श्वे देवोऽमृतेश्वरः ॥४६३॥ ४६३. उस नृप की अपर पत्नी अमृतप्रभा ने रणेश्वर के दक्षिण पार्श्व में अमृतेश्वर देव की स्थापना की । मेघवाहनभूभर्तृ पत्न्या भिन्नाऽऽख्यया कृते । विहारेऽपि तया बुद्धबिम्बं साधु निवेशितम् ॥४६४॥ ४६४. मेघवाहन नृप पत्नी भिन्ना¹ द्वारा निर्मित विहार में भी उसने सुन्दर बुद्ध प्रतिमा निविष्ट किया । राज्ञे देव्यनुरक्ताय सानुकक्रोशाय सैकदा । पातालसिद्धिदं मन्त्रं प्रददौ हाटकेश्वरम् ॥४६५॥ ४६५. एक बार उस (रणारम्भा स्वयं) ने देवी में अनुरक्त ए सहानुभूति पूर्ण नृपति को पाताल¹ ( विजय ) सिद्धिप्रद हाटकेश्वर मन्त्र प्रदान किया । पाठभेद : कल्हण ने कहीं भी इस प्रकार का गौण रूप से संकेत श्लोक संख्या ४६२ में 'मार्ताण्डं' का पाठभेद भी नहीं किया है। 'मार्तण्डं' मिलता है । ४६४ (१) अमृतेश्वर : इस मन्दिर के स्थान पादटिप्पणियाँ : तथा रूप का पता नहीं चलता । ४६२ (१) सिंहरोत्सिका : इस स्थान का (१) भिन्ना विहार : इसका भी पता नहीं पता नहीं चलता । कल्हण ने पुनः कहीं नहीं वर्णन चलता । किया है कि विष्णु का मन्दिर सूर्य किंवा मार्तण्ड दोनों का पुनः उल्लेख नहीं आया है जिससे रूप में कहीं स्थापित किया था । श्री जनरल इनके स्थान का पता लगाया जा सके । यह अनु- कनिंघम का यह मत कि मार्तण्ड का मध्यवर्ती सन्धान का विषय है । मन्दिर ही यह मन्दिर था और ललितादित्य ने केवल चारों ओर का स्तम्भावलोमय प्राकार का निर्माण ४६५ (१) पाताल : यूनानी लोग पाताल को कराया था । विद्वानों ने, मुख्यतः श्री फरगुसन और 'हेड्स' कहते हैं। वह नागों तथा आंशिक देवी श्री स्टीन ने, अमान्य किया है। यदि मार्तण्ड मन्दिर प्राणियों का स्थान माना जाता है। धारणा है कि रणादित्य का निर्माण कराया होता तो यह बात पाताल लोक नीचे था। कल्हण के काल में लोगों की स्मृति में अवश्य होती ।

५६२ राजतरंगिणी

मा भून्मोघाऽस्य मत्प्राप्तिरिति मत्वा तयाऽर्पितम् । असाधयत्तस् तं प्राप्य वशाम्तं वत्सरान् बहून् ॥४६६॥

४६६. 'मेरी प्राप्ति इसके लिये निष्फल न हो' यह समझकर उसके अर्पित उस वशीमन्त्र को प्राप्त ( राजा ने ) उसे बहुत वर्षों तक सिद्ध किया ।

कृत्वेष्टिकापथे कष्टं तपो नन्दिशिलां गतः । भूरिभिर्वत्सरैर्मन्त्रसिद्धेः प्रणयितां ययौ ॥४६७॥

४६७. 'इष्टिका पथ' में कष्ट साध्य तपस्या कर नन्द शिला२ गया और बहुत वर्षों के था मन्त्र सिद्धि प्राप्त की ।

पाठभेद : श्लोक संख्या ४६६ 'वशाम्तं' का पाठभेद 'वसन्तं', 'वसन्तु, घोर 'धंशान्त' मिलता है । श्लोक संख्या ४६७ में 'कृत्वेष्टि' का 'कृत्वष्टि' तथा 'तपो' का पाठभेद 'ततो' मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ : ४६७ (१) इष्टिका पथ : पवित्र हरमुकुट पर्वत की दिशा में इष्टिका पथ का नाम आता है। यह वह स्थान है जिसका वर्णन नीलमत पुराण (१०८१) में 'पयेश्वर इष्टाः' रूप में किया गया है। यह लार परगना में रामरादन स्थान है। यही से हरमुकुट यात्रा की चडान आरम्भ होती है ।

नीलमत पुराण में उल्लेख मिलता है : गुहेश्वरः शतमुखो यष्टिकापथ एव च । कन्दर्पबलस्तथा पुण्यं क्षेत्रे चैव समन्ततः ॥ 118 = १६०-१६१

(२) नन्दशिला : कल्हण से स्पष्ट नही होता कि उसका नन्दशिला से क्या तात्पर्य है। श्री स्टीन का मत है कि सम्भवतः नन्द शिला नन्दी की गाथा से सम्बन्धित नन्दिक्षेत्र में हरमुकुट पर्वत पर होना चाहिये । नन्दी की उत्पत्ति शिलाद अर्थात् शिलानूर्ण से हुई थी । उसने तपस्या नन्दिनगर में मूर्धापर शिला रखकर किया था। हमान परगना में नन्हेल ग्राम का पुराना नाम नन्दिशिला था। ( वितस्ता माहात्म्य : २४।३३) किन्तु स्थान को पुण्य किया पवित्र रूप में वर्णन नहीं किया गया है। नीलमत में उल्लेख मिलता है।

तस्य मूलमथासाद्य देव्यै वचनमब्रवीत् । इहैव तिष्ठ तावत्त्वमहं यास्याम्यतः परम् ॥ 1057 = १२४१

x x x धूपेन सहितो देवीपर्वतेऽस्मिन् हि यः पथा । करोत्यारोहणं तस्य महत्पुण्यफलं स्मृतम् ॥ 1058 = ११४२

x x x यथा त्वं न समर्थाऽसि सुकुमाराऽसि देवि यत् । आरोढुं तेन यास्येऽहमेक एवाथ सत्वरः ॥ 1069 = १२४३

x x x तस्माद्देशात् प्रवृत्तस्तु गन्तुं देववरः पथा । पार्थाश्वराख्यस्तत्रेष्टो देवस्यायतनोऽभवत् ॥ 1060 = १२४४-१२४५

x ... x आरुरोह यथा शैलं यदा देवो महेश्वरः । तदा वृद्धि मगाच्छैलो महतीं भूरिदक्षिणः ॥ 1061 = १२४५-१२४६

तृतीय तरंग ५९३ स्वप्नैश्च सिद्धिचिह्नश्च जाताभङ्गुरनिश्चयः । चन्द्रभागाजलं भित्त्वा नमुचेः प्राविशद्विलम् ॥४६८॥ ४६८. स्वप्नों एवं सिद्धि सूचक चिह्नों से दृढ़ निश्चय हो (वह) चन्द्रभागा¹ जल का भेदन कर नमुचि² के बिल में प्रवेश किया। ४६८ (१) चन्द्रभागा : काश्मीर तथा पंजाब शतद्रू च विपाशां च पुण्यतोयामिरावतीम् । में प्रवाहित चिनाव नदी । चनाव नदी का संस्कृत देविकां चन्द्रभागां च तथा विष्णुपदं सरः ॥ नाम चन्द्रभागा है। चन्द्रभागा का ही अपभ्रंश 1155 = १२३९ चिनाव तथा चनाव है। वितस्ता से सम्बन्धित कुछ नदियो का नाम राजतरंगिणी तरंग ४:६३८ में वर्णित चन्द्रभागा नीलमत पुराण में आया है। वितस्ता नदी यदि स्रोतस्विनी इससे भिन्न है। चन्द्रभागा का वर्णन उमा की अवतार अर्थात् उमास्वरूप है तो दैत्य नीलमत पुराण में ११६, ११७, १२०, १२१, माता दिति कश्यप की पत्नी ने कश्मीर की १५४, तथा १०५५ में आता है। कल्हण ने चन्द्रभागा चन्द्रावती नदी का रूप धारण कर लिया है। का वर्णन त० ८:५५४ तथा ६२६ में किया है। दितिश्चन्द्रवती जाता कश्यपवचनानुकारिणी । नीलमत पुराण में चन्द्रभागा का निम्नलिखित उल्लेख मिलता है । इस नदी का अभीतक पता नहीं लग सका है। आपगा च नदी पुण्या तोषी तोषितभास्करा । नीलमत पुराण में इसका वर्णन त्रिकोटि तथा हपं चन्द्रांशुशीतलजला चन्द्रभागा सरिद्वरा ॥ पथा के साथ आता है। निर्विवाद है कि यह नदी 116 = १५८-१५६ वितस्ता की सहायक नदी थी । द्रष्टव्य नी० २८९ ४८५, १२९७, १३८९, १३०० ॐ ॐ ॐ पुण्यं च चन्द्रभागायास्तीर्थं वै षष्टिलामुखम् । अनन्त नाग के समीप चार ओर स्रोतस्विनियां दीक्षमण्डलनामा च तथा पापनिसूदनः ॥ आकर वितस्ता में मिल जाती हैं। उनके नाम 117 = १५९-१६० हैं; सन्द्रन, ब्रिङ्ग, अरिपथ तथा लिदर । सन्द्रन

    • ॐ नदी दक्षिण में बहती है और शाहिबाबाद क्षेत्र अर्थात् सर्वत्रैव सदा पुण्या चन्द्रभागा महानदी । प्राचीन वेर परगना का पानी लेकर वितस्ता में माघशुक्लत्रयोदश्यां पुष्ययोगे विशेषतः ॥ मिलती है। वह अनेक पवित्र स्रोतस्विनियों का 120 = १६२-१६३ जल भी लाती है। इस नदी का प्राचीन नाम क्या ॐ ॐ ॐ था कहना कठिन है । पृथिव्यां यानि तीर्थानि ह्रासमुद्रसरांसि च । ब्रिङ्ग नदी ब्रिङ्ग परगना का जल लाती है। चन्द्रभागां गमिष्यन्ति माघशुक्लत्रयोदशीम् ।। वितस्ता माहात्म्य में इसका नाम भृगो दिया गया है। 121 = १६३ १६४ यह सन्देहात्मक है। इस नदी में प्रसिद्ध त्रिसन्ध्या तथा
      • अर्धनारीश्वर अर्थात् नारू स्रोतस्विनियो का जल अश्वारूढ़ा विपाशा च गजारूढ़ा इरावती । लाता है। इन्द्र की पत्नी शची देवी ने स्वयं हर्य- सिंहेन चन्द्रभागा च सिन्धुर्व्याघ्रेण पार्थिव ॥ पथा नदी का रूप धारण किया है। दक्षिण पूर्व से 154 = २०६ आकर वितस्ता में मिलती है। हर्यपथा नाम से ७५

५९४ राजतरंगिणी बिलेऽपावृत्ततां याते दिवसान्येकविंशतिम् । प्रवेश्य पौरान्प्राङ्निन्ये दैत्यस्त्रीभोगभागिताम् ॥४६९॥ ४६९. इक्कीस दिनों तक बिल के अनावृत रहने पर पुरवासियों को प्रविष्ट करके दैत्य स्त्रियों के भोग का पात्र बनाया । नीलमत पुराण में इसका वर्णन मिलता है । वर्तमान नीलमत पुराण में दैत्य का उल्लेख नाम अरिपथ है। यह कोयर परगना के जल को लाती निम्नलिखित रूप से किया गया है। है । कोयर शब्द कपटेश्वर सर का अपभ्रंश है । ससुताः पार्थिवश्रेष्ठ तासां नामानि मे शृणु । कपटेश्वर के पश्चिमो शैलबाहु पर यह तीर्थ स्थित अदितेस्तनया देवा दितेर्दैत्यास्तथैव च ॥ है । यहाँ से भक्षवाल अर्थात् अचवल का भव्य जल- 47 = ७०-७१ स्रोत निकलता है । जल स्रोतस्विनो का रूप धारण * * * कर हपंथा में प्रवाहित हो जाता है । (नी० २३२, लब्धमायस्तु दैत्येन्द्रो भक्षयामास मानवान् । २८९, ९९५ ) समीपे सरमस्तस्य नानादेशेष्ववस्थितान् ॥ अनवल ग्राम से कुछ अधोभाग जहाँ उक्त 70 = १२०-१२१ तीनों स्रोतस्विनियाँ मिलती हैं वहाँ उत्तर से लिदर * * * (प्राचीन) लेदरी नदी अपने जल के साथ आकर मिलती भगवन्विदितं सर्वं यथा पूर्वं मया शिशुः । है। उसमें सिन्ध उपत्यका के बहुत हिमानियों के पालितः संप्रह्रसुतो दैत्यो नाम्ना जलोद्भवः ॥ जल आकर मिलते हैं। दाछुनपुर तथा खेलुरपुर 136 = १०९ परगनो के पानी को लाती है । प्राचीन काल लेदरी * * * नदी से एक नहर द्वारा पानी मार्तण्ड अर्थात् मटन देवानुयात्रानिनदं श्रुत्वा दैत्योऽपि दुर्मतिः । पहुँचाया गया था जहाँ कृपा होती थी । जले व्यवध्यमात्मानं विदित्वा न विनिर्गतः ॥ पाठभेद : 162 = २१४ श्लोक संख्या ४६९ में 'दिवसान्येक' का * * * 'दिवसानेक' तथा 'भागिताम्' का पाठभेद 'भोगिताम्' ततश्चानन्तो गिरिसंनिकाशः मिलता है । समप्रचन्द्रस्य समानकान्तिः । पादटिप्पणियाँ : व्यवर्धतावृष्य महीं दिवं च ४६९ (१) दैत्य : असुरों में एक दैत्य है । संत्रासयन्दैत्यगणान्समन्तात् ॥ उनकी माता दिति थी । पिता कश्यप थे । गुरु 169 = २१९ शुक्राचार्य हैं। उनके देवता वरुण तथा वायु हैं । * * * हिरण्यकश्यप को दैत्यपति कहा गया है। दैत्यो ध्वस्तेऽन्धकारे हरिरप्रमेयो का युग देव मान से १२ हजार वर्षों का होता है । योगेन गत्वा स्वपरं शरीरम् । दक्ष प्रजापति की कन्या दैत्यसेना थी । उसका दैत्येन युद्धं स चकार सार्धं पति केशी दैत्य था । दैत्य का पर्यायवाची नाम देहेन चान्येन च युद्धमैक्षत् ॥ असुर—दैत्य, दैतेय, दनुज, इन्द्रारि, दानव, 172 = २२४-२२५ शुक्रशिष्य, दितिसुत, पूर्वदेव, एवं सुरद्विप हैं।

तृतीय तरंग ५९५ स एवं भूपतिर्भुक्त्वा भुवं वर्षशतत्रयम् । निर्वाणश्लाघ्यनिर्व्यूढि पातालेशैश्वर्यमासदत् ॥४७०॥ ४७०. इस प्रकार उस नृपति ने तीन सौ वर्षों तक पृथ्वी का भोगकर निर्वाण श्लाघ्य अन्तिम स्थिति (सर्वोच्च पद) प्राप्त किया¹। सानुगे नृपतौ याते दैतेयदयितान्तिकम् । देवी सा वैष्णवी शक्तिः श्वेतद्वीपमगाहत ॥४७१॥ ४७१. अनुचर सहित नृपति के पाताल प्रचारोपरान्त वह देवी वैष्णवी शक्ति श्वेत द्वीप¹ चली गयी। विष्णोश्च दैत्येन बभूव युद्धं दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह । घोरं द्रुमैः पर्वतमस्तकैश्च । वर्जयन्ति तदा मांसं मांसादा दिनपञ्चकम् ॥ युद्धं च ते देवगणाः समस्ताः 447 = ५५८ प्रहृष्टचित्ता ददृशुः समन्तात् ॥ * * * 172 = २२५-२२६ कुबेरो धर्मलटकौ दैत्यराजः पडङ्गकः । ततो हरिः क्रोधविवृत्तनेत्रः गन्धर्वो धृतराष्ट्रश्च कुसुमः कुहरः कुढः ॥ चक्रेण देवप्रवरः समान्ते । 903 = १०६९-१०७० चिच्छेद दैत्यस्य शिरः प्रसय * * * गङ्गा ततस्तोयमुपाजगाम । त्रिपुरारे नमस्तेऽस्तु नमस्त्वन्धकघातिने । 174 = २२६-२२७ शूलाप्रभिन्नदैत्यांशरुधिरार्द्र नमोऽस्तु ते ॥

      • 1092 = १२९० चक्रमर्पय मे देव दैत्यसंघविनाशनम् । * * * प्रहसन्नमुवाचाथ हरिं हास्येन शंकरः । पाठभेद : = 190 = २४६-२४८ श्लोक संख्या ४७० में 'स एवं' का 'एवं स';
      • 'निर्व्यूढि' का 'व्यूढ' तथा 'सैश्वर्य' का पाठभेद तत्र सन्ति पिशाचा ये दैत्यपक्षाः सुदारुणाः । 'लैश्वरं' मिलता है। तेषां तु निग्रहार्थाय पिशाचाधिपतिर्बली ॥ पादटिप्पणियाँ : 204 = २७७-२८८ ४७० (१) आइने अकबरी में उल्लेख है—
      • राजा न्यायप्रिय था। विजय भी किया। चनाब सतः शची शक्रपत्नी नाम्ना शक्रपथा नदी । नदी पर कुश्तवार के समीप यह अपने अनेक सतश्चन्द्रवती नाम दितितैत्यारिणिनृपः ॥ सम्बन्धियों तथा पार्षदों के साथ एक गुहा में चला 289 = ३८७-३८८ गया। उनके विषय में पुनः नहीं सुना गया कि
      • उनका क्या हुआ। उसके वीरतापूर्ण कार्यों के त्वया विनिहता दैत्या देवब्राह्मणकण्टकाः । सम्बन्ध में अनेक कहानियां प्रचलित है। वरदश्च वरेण्यश्च सुरारिसंघहृा विभो ।। 354 = ४५७ ४७१ (१) श्वेतद्वीप : शाब्दिक अर्थ उज्ज्वल
      • किंवा श्वेतद्वीप होता है। प्राचीन परम्परा के अनु-

५९६ राजतरंगिणी राजवंशेष्वनेकेषु राज्ञोर्वंशद्वये परम् । द्वयोरेवात्र निर्व्यूढिं प्रजावात्सल्यमागतम् ॥४७२॥ ४७२. अनेक राजवंशो में दो राजवंश के दो नृपति उत्कृष्ट हुए। दोनों का ही प्रजा वात्सल्य पराकाष्ठा को प्राप्त हुआ¹। रणादित्यस्य गोनन्दवंशे रामस्य राघवे । लोकान्तरसुखस्यापि ययोरंशभुजः प्रजाः ॥४७३॥ ४७३. गोनन्द वंश में रणादित्य ए रघु वंश में राम¹ (उत्कृष्ट) हुए जिनकी प्रजा लोकान्तर सुख की भागी हुई। विक्रमाक्रान्तदिश्वस्य विक्र्मेश्वरकृत्सुतः । तस्यासीत् विक्रमादित्यः त्रिविक्रमपराक्रमः ॥४७४॥ ४७४. त्रिविक्रम¹ तुल्य पराक्रमी विक्रमादित्य² उसका पुत्र था। जिसने अपने पराक्रम से विश्वविजय एवं विक्रमेश्वर³ का निर्माण किया।

सार द्वीप पार्थिव जगत् का विभाजन है। इस विभाजन की गणना में साम्य नहीं है। इसे चार, सात, नव तथा तेरह भी कहा गया है। नैषध चरित में १८ विभाजन किये गये हैं। पर सब द्वीप मेरु के चारो ओर स्थित कहे गये हैं। मेरु को सुवर्ण पर्वत प्रफुल्लित कमल तुल्य कहा गया है। उसके केन्द्र में जम्बू द्वीप है। इस जम्बूद्वीप में ही भारतवर्ष है। द्वीप का शाब्दिक अर्थ जल से आवृत भूमि होता है। कुछ लेखको के मतसे प्राचीन काल में श्वेत द्वीप से यूरोप का अर्थ लगाया गया है। ४७२ (१) श्री स्टीन ने श्लोक ४७२ तथा ४७३ का एक साथ अनुवाद किया है। वह श्लोक 'युग्मकम्' नहीं है अतएव मैंने दोनों का अलग अलग अनुवाद किया है ४७३ (१) राम : वाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड १०१-११० में रामचन्द्र के अयोध्या में सरयू नदी में शरीर विसर्जन की कथा हृदयस्पर्शी शब्दों में दी गयी है। वहाँ उल्लेख किया गया है कि भगवान् राम की अनुगामिनी उनकी प्रजा हुई थी। ४७४ (१) त्रिविक्रम : यहाँ पर विष्णु किंवा वामन हैं। तीन पग से वामन अवतार में भगवान् ने जगत् को नाप लिया था अतएव उन्हें त्रिविक्रम कहा गया है। (२) विक्रमादित्य : कतिपय लेखकों ने विक्रमादित्य किसका पुत्र था सन्देह प्रकट किया है। तरंग के श्लोक ३४२१ में स्पष्ट प्रकट होता है कि यह वास्तव में रणादित्य का ही पुत्र था। श्री विल्सन से विक्रमादित्य के राज्याभिषेक का समय सन् ५३७ ई० ५ मास तथा समीकृत काल सन् ५६८ ई० और राज्यकाल ४२ वर्ष दिया है। श्री एस. सी. पण्डित वह समय सन् ५१७ ई. देते हैं। तथा राज्यकाल ४२ वर्ष देते हैं। स्टीन यह समय लौकिक संवत् ३५९९ मास २ तथा एक दिन तथा राज्यकाल ४२ वर्ष देते हैं। कलि गताब्द ३६५९ वर्ष ११ मास १३ दिन तथा ट्रायेर के मत से सन् ५१७ ई० ११ मास और कनिघम के अनुसार वह समय सन ५५६ ई० ५ मास आता है।

तृतीय तरंग ५६७ राजा ब्रह्मगलूनाभ्यां सचिवाभ्यां समं महीम् । सोऽपासीद्वासवंसमो द्वाचत्वारिंशतिं समाः ॥४७५॥ ४७५. वासव (इन्द्र) समान उस राजा ने ब्रह्मा एवं गलून सचिवों के साथ बयालीस वर्ष पृथ्वी पर व्यतीत किया । चक्रे ब्रह्ममठं ब्रह्मा गलूनो लूनदुष्कृतः । रत्नावल्याख्यया वध्वा विहारं निरमापयत् ॥४७६॥ ४७६. ब्रह्मा ने ब्रह्ममठ एवं दुष्कृतच्छेत्ता गलून ने रत्नावली नाम्नी स्त्री के नाम से विहार निर्मित कराया । राज्ञोऽनन्तरजस्तस्य राजाऽभूत्तदनन्तरम् । तापितारातिभूपालो बालादित्यो बलोजितः ॥४७७॥ बालादित्य : ४७७. अनन्तर राजा का लघुभ्राता बलशाली बालादित्य राजा हुआ। जिसने शत्रु भूपालों को संतप्त किया । श्री स्तीन ने श्लोक ३४७५ में 'द्वाचत्वारिंशति' का अर्थ ४२ वर्ष किया है परन्तु श्रीरणजीत सीताराम पण्डित ने ४० वर्ष किया है । पं० रामतेज शास्त्री ने भी ४२ वर्ष अनुवाद किया है । श्री गोपीकृष्ण शास्त्री ने ४० वर्ष अर्थ लगाया है । श्री चन्द्रकान्त वाली ने ४२ वर्ष गणना की है । परिशेष में श्री स्तीन ने पुनः ४३ वर्ष दिया है । विक्रमादित्य के पश्चात् बालादित्य के राज्यारोहण काल से गणना करने पर भी ४२ वर्ष ही आता है । अतएव मैंने ४२ वर्ष ही रखा है । धी विदिउद्दीन ने एक विचित्र कपोलकल्पना इतिहास को अपने रंग में रंगने के लिये दी है । वह कहता है । राजा की आयु १६५ वर्ष की हुई थी । उसने ४० वर्ष से अधिक राज्य किया था । उसका राज्यकाल प्रथम हिजरी का समकालीन है । उसने पैगम्बर मुहम्मद साहब के पास राजदूत भेजा था । किन्तु कोई प्रमाण उपस्थित नहीं करता । आईने अकबरी में अबुल फजल ने नाम बलदूत दिया है । (३) विक्रमेश्वर : दिद्दा मठ के २ मिल उत्तर विचार नाग के समीप श्री आनन्द कौल के अनुसार विक्रमेश्वर का मन्दिर था । सिकन्दर बुत शिकन ने इसे ध्वस्त किया था । उसने मन्दिर के ध्वंसावशेष से मसजिद तथा खंन्खाह निर्माण कराया था । ( पृष्ठ २६ ) पाठभेद : श्लोकसंख्या ४७५ में 'गलूना' का पाठभेद 'गलूरा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४७७ ( १ ) श्री विल्सन के राज्याभिषेक का समय सन् ५७९ ई० ५ मास तथा समीकृत काल सन् ५९२ ई० तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है । श्री एस. पी. पण्डित ने समय सन् ५५९ ई. तथा राज्य काल ३७ वर्ष ४ मास दिया है । श्री स्तीन ने यह समय लौकिक संवत् ३६५१ मास २ तथा दिन प्रथम तथा राज्य काल का समय ३६ वर्ष ८ मास दिया है ।

५९८ राजतरंगिणी लवणार्णवपानेन तर्पोत्कर्षमिवोद्वहन् । यत्प्रतापो रिपुस्त्रीणां सनेत्राम्भोऽभजन्मुखम् ॥४७८॥ ४७८. जिसका प्रताप लवणसमुद्र जल का पान करने से मानों तृषाधिक्य को धारण करता हुआ, शत्रु स्त्रियों के साश्रु मुख का सेचन करता था । आसन् येऽरिमनोऽगाधवोधदण्डा इवाहृतः । यस्याद्यापि जयस्तम्भाः सन्ति ते पूर्ववारिधौ ॥४७९॥ ४७९. पूर्व सागर पर शत्रुमन के अगाध बोध के मापदण्ड स्वरूप लाये गये जो उसके जयस्तम्भ १ थे, वे आज भी हैं । प्रभावाङ्केन वङ्गालान् जित्वा येन व्यधीयत । काश्मीरिकनिवासाय कालम्बाख्यो जनाश्रयः ॥४८०॥ ४८०. जिसने प्रभाव से वंकालों को विजित कर काश्मीरियों के निवास हेतु कालम्ब १ नामक जनाश्रय २ बनवाया । श्री बाली यह समय सप्तर्षि संवत् ४२२४ तथा सन् ५५४ ई. देते हैं । कलि गताब्द ३६९६ वर्ष ११ मास १३ दिन, ट्रायेर के मत से यह समय सन् ५५६ ई. ११ मास और कनिंघम के अनुसार सन ५७६ ई. ६ मास आता है । श्री विदेउद्दीन राजा बालादित्य को शाहू यज्दे जिर्द का समकालीन बना देता है । उसमें उसने उत्तरी पूर्वीय क्षेत्र जीतकर कश्मीर के राज्य में मिला लिया था । ४७९ ( १ ) जयस्तम्भ : जयस्तम्भो की समानता सेसक के स्तम्भो तथा यूनानो तथा रोमनो के जय स्मारक किंवा जय चिन्हो से की जा सकती है । जयस्तम्भ भारत में अनेक स्थानो पर मिलते हैं । कुतुब मानार अर्थात् विष्णु पर्वत पर विष्णु मन्दिर का अष्टधातु का जयस्तम्भ इसका ज्वलन्त उदाहरण है । उस पर चन्द्रगुप्त तथा समुद्रगुप्त की कीर्ति तथा विजय का वर्णन उल्लिखित है । इसी प्रकार का स्तम्भ प्रयाग आदि स्थानो का है । यह जयस्तम्भ यूनानियो के काष्ठ अपस्तम्भ के समान निर्मित भी किये गये होंगे । वे कालान्तर में शत्रुओं की विषम मार से नष्ट हो गये हैं । पाठभेद : श्लोक संख्या ४८० में 'वङ्गालान्' का पाठभेद 'वंकालो' और 'वङ्गाला' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४८० ( १ ) वंकाल : वंकालों का स्थान तथा वे किस प्रकार के लोग थे अभी तक कुछ प्रकाश इतिहास नहीं डाल सका है । अनुमान बहुत लगाये गये हैं । इस पर अनुसंधान की आवश्यकता है । पूर्वोय समुद्र जयस्तम्भ के पश्चात् ही वंकाल का वर्णन मिलता है । यह 'वंग' किंवा 'बंगाल' शब्द का मूल रूप किंवा अपभ्रंश प्रतीत होता है । कतिपय अनुवादकों ने इसका अर्थ 'बंगाल' ही लगाया है । 'वंकाल' शब्द 'संस्कृत' अथवा कश्मीरी नही प्रतीत होता । बंगाल की संज्ञा सर्वदा गौड़ तथा वग या बंगाल से दी गयी है । ( २ ) कालम्ब : इस स्थान का अभी तक पता नहीं चला है । ( ३ ) जनाश्रय : इसका अर्थ सार्वजनिक धर्मशाला अथवा सराय से है । सराय शब्द आश्रय का अपभ्रंश प्रतीत होता है । दोनों का अर्थ एक ही है ।

तृतीय तरंग ५९९ काश्मीरेषु घनोदग्रमग्रहारं द्विजन्मनाम् । राजा मडवराज्ये यो भेडराख्यमकारयत् ॥४८१॥ ४८१. जिस राजा ने कश्मीर में मडव१ राज्य गत प्रभूत धन (पूर्ण) भेडर२ (ग्राम) ब्राह्मणों को अग्रहार में प्रदान किया । विशां विपाटितारिष्टमरिष्टोत्सादने व्यधात् । वल्लभा यस्य बिम्बोष्ठी बिम्बा विश्वेश्वरं हरम् ॥४८२॥ ४८२. जिसकी बिम्बोष्ठी 'बिम्बा' नाम्नी प्रिया ने अरिष्टोत्सादन में मनुष्यों के अनिष्ट नष्ट कर्ता विश्वेश्वर शिव (हर) को स्थापित किया । भ्रातरो मन्त्रिणस्तस्य त्रयो मठसुरौकसः । सेतोश्च कारका आसन् खङ्गशत्रुघ्नमालवाः ॥४८३॥ ४८३. खङ्ग, शत्रुघ्न एवं मालव नामक उसके तीन मन्त्रिवन्धुओं ने मठ, देवालय एवं सेतु निर्माण कराया । विलसन का मत है कि राजा ने विहार मन्दिर आदि का अपनी विदेशी प्रजा के कश्मीर में आकर ठहरने के लिए निर्माण कराया था । विर्दउद्दीन इस राजा को ईरान के राजा एज्दजर्द का समकालीन कहता है । उसने उत्तरीय पूर्वीय ईरान के जिलो को जीत लिया था । किन्तु यहाँ पर उसने बालादित्य को भ्रम से प्रतापादित्य समझ लिया है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४८१ में 'भेडरा' का पाठभेद 'भेरडा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४८१ (१) मडवराज्य : तरंग २ : १५ पाद टिप्पणी द्रष्टव्य है । (२) भेडर : यह वर्तमान बिडर ग्राम है । ब्रिङ्ग परगना में है। सन् १८६१ में श्री स्टीन ने इस ग्राम की यात्रा की थी । ग्राम के मध्य में एक दृहा है । यह मन्दिर का ध्वंसावशेष है । उसमें से अलंकृत शिला खण्ड निकाल लिये गये हैं । समीपस्थ ब्राह्मणो का ग्राम हागल गुण्ड है । वहा दुर्गा की पूजा 'बिदा देवी' नाम से होती है । विंदा शब्द भेड का अपभ्रंश है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४८२ में 'विपाटि' का पाठभेद 'विपर्टि' और 'विपति' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४८२ (१) अरिष्टोत्सादन : मच्छहोम परगना में यह वर्तमान ग्राम रतसुन है। श्री स्टीन के सुझाव पर पण्डित काशीराम इस ग्राम में सन् १८६१ में गये थे परन्तु उन्हें यहां कुछ प्राप्त नहीं हुआ । पाठभेद : श्लोक संख्या ४८३ में 'रौकसोः' का पाठभेद 'रोकः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४८३ (१) सेतु : यहाँ सेतु का अर्थ कोई बाँध अथवा सेतु अर्थात् पुल लगाया जा सकता है। सेतु का प्रचलित अर्थ पुल ही है। परन्तु बाँध के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया गया है

६०० राजतरंगिणी बभूव तस्य भूर्भर्तुः भुवनाद्भुतविभ्रमा । तनयाऽनङ्गलेखाख्या शृङ्गारोदधिकौमुदी ॥४८४॥ ४८४. उस नृपति को भुवनाद्भुत विलासयती शृङ्गार रूपी समुद्र के लिये कौमुदी (कार्तिक एवं आश्विन पूर्णिमा) अनंगलेखा नाम्नी कन्या हुई । तां वीक्ष्य लक्षणोपेतां मृगाक्षीं पितुरन्तिके । अमोघप्रत्ययो व्यक्तं व्याजहारेति दैववित् ॥ ४८५ ॥ ४८५. पितृ पार्श्व में लक्षण सम्पन्न उस मृगाक्षी को देखकर अमोघप्रत्ययी ज्योतिषी ने इस प्रकार सुस्पष्ट कहा- भविता तव जामाता जगतीभोगभाजनम् । त्वदन्तमेव साम्राज्यं गोनन्दान्वयजन्मनाम् ॥ ४८६ ॥ ४८६. "गोनन्दवंशियों का साम्राज्य तुम्हारे ही तक है-और तुम्हारा जामाता जगत् पृथ्वी का भोग भाजन होगा।" सुतासंतानसाम्राज्यमनिच्छन्नथ पार्थिवः । दैवं पुरुपकारेण जेतुमासीत्कृतोद्यमः ॥ ४८७ ॥ ४८७. सुता संतान के साम्राज्य को न चाहते हुए, नृपति ने दैव को पुरुषार्थ पूर्वक विजित करने का प्रयत्न किया । अराजान्वयिने दत्ता नेयं साम्राज्यहारिणी । मत्त्वेति प्रददौ कन्यां न कस्मैचन भूपुजे ॥ ४८८ ॥ ४८८. 'अराजवंशीय' को प्रदत्त यह कन्या राज्यहारिणी नहीं होगी' ऐसा मानकर उसे किसी राजा को नहीं दिया । हेतुं सरूपतामात्रं कृत्वा जामातरं नृपः । अथाश्वघासकायस्थं चक्रे दुर्लभवर्धनम् ॥ ४८६ ॥ ४८९. राजा ने सुन्दरता मात्र को हेतु मानकर अश्वघास कायस्थ दुर्लभ वर्धन को जामाता बनाया। पाठभेद : श्लोक संख्या ४८४ में 'विभ्रमा' का पाठभेद 'विक्रमा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४८८ (१) अराजवंशीय : राजा की इच्छा यह नहीं थी की गोनन्द वंश से साम्राज्य दूसरे वंश में चला जाय । अतएव वह निसन्देह चिन्तित हुआ था । कल्हण प्रथम तरंग में गोनन्दवंश के गोनन्द प्रथम दामोदर यशोवती, तथा गोनन्द तृतीय का वर्णन कर ३५ राज्यो का विवरण लुप्त मानता है । पाठभेद : श्लोक सख्या ४८६ में 'सरूप' का पाठभेद

तृतीय तरंग ६०१ मातुः कार्कोटनागेन सुस्नातायाः समीयुपा । राज्यायैव हि संजातो राज्ञा नाज्ञायि तेन सः ॥ ४९० ॥ ४९०. उस राजा ने यह नहीं जाना कि सुस्नात (इसकी) माता और कर्कोट नाग १ के सम्भोग से राज्य के लिये ही वह उत्पन्न हुआ है।

'स्वभूष' तथा 'स रूप' मिलता है । पादटिप्पणियां (१) अश्वघास कायस्थ : श्रीनगर में घोड़ों के लिये घास समीपवर्ती स्थानो, सरोवरों, घासवाली भूमि, से नावों द्वारा लाई जाती थी। नावें मुख्य यातायात को साधन थी । घास व्यर्थ न जाय और वह अश्व जिनका सम्बन्ध उन दिनो अश्वारोही सेना तथा देश की सुरक्षा से था राज्य सम्पत्ति समझा जाता था। उसपर राज्य कर लगता था । डोगरा काल तक यह कर चलता रहा है । कायस्थ यहाँ पर जातिवाचक न हो कर कर्म-वाचक है। कश्मीर में कर्मणा कायस्थ होते थे। राज्य कर्मचारो को कायस्थ कहते थे । अश्वघास कायस्य का यहा तात्पर्य घोड़ों के लिये घास लाने वालों का अधिकारो राज्य कर्मचारी है। पाठभेद : श्लोक संख्या ४९० में 'कार्को' का 'कर्को', 'समीयुपा' का 'समेयुपा', 'संजातो' का 'संजाता' तथा 'सः' का पाठभेद 'सा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४९० (१) कार्कोट नाग : कर्कोट नाग के नाम पर कश्मीर का कर्कोट राजवंश चला था। कल्हण ने इस राजवंश के राजाओ का वर्णन समस्त चतुर्थ तरंग में किया है। उसमें १७ राजा हुए थे । उनका शासन काल लौकिक संवत् ३६७७ से ३९२९ तक रहा है। इस वंश ने कश्मीर पर २५४ वर्ष ५ मास २७ दिन तक शासन किया था।

नीलमत पुराण में कार्कोट नाग का वर्णन मिलता है । कश्मार के नागामो की तालिका मे प्रारम्भ में ही उसका नाम नील, वासुकी, तथा तक्षक नाग के साथ आता है। प्रतीत होता है। कार्कोट नाग की पूजा विभिन्न स्थानो में होती थी । करकोट द्रग का नाम कार्कोट नाम पर पड़ा था । (त० ८.१५९६) अनुमान किया जाता है कि वह तोष मैदान पास के समोपस्थ किसी एक सरोवर में निवास करता था। उसका उल्लेख चौथी राजतरंगिणी के श्लोक ११४ तथा तीर्थों में किया गया है । वेगिल परगना में काकोदर पर्वत बाहुभूस का नाम कार्कोट का ही अपभ्रंश है। तीर्थों में एक ओर कार्कोट नाग का उल्लेख मिलता है । कुधर परगना में यह गांव उतरुस है । हरचरित चिंतामणि १० में वर्णित स्रोत सम्भवतः यही है । नीलमत में कार्कोट नाग का उल्लेख आता है । कम्बलाश्वतरो नागो कार्कोटकधनंजयौ ॥ 881 : १०५० ॥ कद्रू का पुत्र कर्कोटक नाग वरुण की सभा में उपस्थित रहता है। (म० स० ९:९) नागो की भोगवती नामक नगरी में इसका निवास कहा गया है (म० उ० १०१ : ९) नारद की दावाग्नि में जब यह फँस गया था तो नल ने इसका उद्धार किया था । (म० व० ६३) कार्कोट नामक भारतवर्ष के विभाग के कार्कोटक लोगों को महाभारत में विधर्मी कहा गया है। उनका वर्णन महाभारत कर्ण पर्व (४४:४३) में मिलता है । जयपुर राज्य के पूर्व अंचल में कार्कोट नगर नामक स्थान है। वहाँ मालवों के आरम्भिक काल की मुद्रायें

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राजतरंगिणी ६०२ मिलती है। शिव के रथ में रस्सो के रूप में इनका प्रयोग किया गया था। (म० पर्व : ४ : २९) यह भगवान् बलराम के स्वधाम गमन के समय उपस्थित था। (म० मौ० ४ : १७) अथर्व वेद में कार्कोट नाग का उल्लेख विषहर के रूप में किया गया है। प्रमुख नागो के वर्णन में नागराज कर्कोट का गौरवपूर्ण स्थान है। यह राजवंश का संरक्षक माना जाता है। नेपाल में आज भी कार्कोट नाग को पूजा कहीं-कहीं की जाती है। नेपाली गाथाओं में उसे लोक प्रिय स्थान प्राप्त है। नेपाल के नागाओं में यह एक प्रमुख नाग माना जाता है। बंगाल के कायस्थों की एक शाखा अपने को नागवंशीय कहती है। अपने नाम के साथ नाग मल्ल धारण करते हैं। मध्य प्रदेश के गोंड़ लोग अपने को नागवंशीय मानते है। आसाम की सूरमाघाटी में नाग जाति की आबादी है। उन्ही के नाम पर भारत के एक प्रदेश का नाम 'नागालेण्ड' पड़ा है। नागवश सम्बन्धी अनेक गाथायें चान, दक्षिण पूर्व एशिया, जापान में प्रचलित हैं। बौद्ध तथा हिन्दू गाथाओ में नाग गाथाओ का तथा उनसे सम्बन्धित अनेक प्रसंगो का वर्णन मिलता है। अजन्ता को भित्तिचित्र पर उनका अस्तित्व मिलता है। तक्षक नाग मुख्य नाग रहा है। उसी के नाम पर तक्षशिला नाम पड़ा था। अफगानिस्तान के प्राचीन गान्धार देश में नाग जाति का अस्तित्व था। अफगानिस्तान का एक बहुत बड़ा समाज अपने को पूर्व कालीन नाग वंशीय मानता है। नाग तथा नागा प्रायः शिव तथा शैवमत से सम्बन्धित किये गये हैं। शिव का आभूषण ही नाग है। दक्षिण भारत का शैवमत उत्तर भारत में पहुँचा। उनकी स्मृति नागा तथा नेपाल की नायर जाति में अभी तक अक्षुण्ण है। अनेक नगर नाग के नामपर बसे हैं—जैसे नागपुर । उत्तर भारत में नाग पंचमी का पर्व बड़े धूम- धाम से मनाया जाता है। कहा है कि नागपंचमी ब्राह्मणों का, चित्तर दूजको क्षत्रियों का, दोपावलो वैश्यो का और होली शुद्र का पर्व है। नाग पंचमी के दिन नाग पूजा होती है। सखो तथा गशी के रहने की जहाँ सम्भावना होती है वहाँ दूध में धान का लावा डालकर दोना अथवा मिट्टी की दीया में रख दिया जाता है। मैं पात्नो बाल्यवस्था में अपने सोनियादह वारानसी शहर के बरोघा, तालाब, भीत तथा कूँवों पर रखता रहा। मेरे घर में अब भी नागपंचमी के दिन थाली में कोटोरियो तथा पौधम के वृक्ष के टूथ में धान का लावा तथा दूध रखा जाता है। काशो में बालक नाग पंचमी के दिन कागज पर छोटे नाग के चित्र को बेचते कहते हैं—'बड़े गुरु' का 'छोटे गुरु' का नाग लो। गुरु शब्द महत्वपूर्ण है। काशी में नाग कूँवाँ एक मुहल्ला है। यहाँ हजारो वर्ष पुरानो विशान शाखला है। काशी के ब्राह्मण लोग वहाँ पर एकत्रित होते हैं। शास्त्रार्थ होता है। गुरु तथा शिष्य सभी शास्त्रार्थ में सम्मिलित होते हैं। यह स्थान अब मुसलमानी मुहल्ले में पड़ गया है। समय परिवर्तन के कारण अब न तो यहाँ पहले जैसा मेला लगता है और न तो शास्त्रार्थ के लिये उत्साह पूर्वक गुरु शिष्य आते हैं। दो चार ब्राह्मण आ जाते हैं। पुरानी बातें दुहरायी जाती हैं। महाभारत के अनुसार शेष नाग सर्व प्रथम उत्पन्न हुए थे। तत्पश्चात् वासुकी, ऐरावत, तक्षक कार्कोटक तथा धनञ्जयादि नाग उत्पन्न हुए थे। कार्कोटक नाग के अर्जुन के जन्म दिवसपर जाने का उल्लेख मिलता है। (म० भा० १२९ : ७१) शेषस्तु प्रथमो जातो वासुकिस्तदनन्तरम्। ऐरावतस्तक्षकश्च कार्कोटकधनञ्जयौ ॥ —म० आ० ३५:५

तृतीय तरंग ६०३ निश्चिन्वते हि ज्ञंमन्या यमेवायोग्यमाग्रहात् । जिगीषयेव तत्रैव निदधाति विधिः शुभम्¹ ॥ ४९१ ॥ ४९१. अपने को विज्ञ मानने वाले जिसे हठात् अयोग्य सिद्ध करते हैं, उसी में विजय की इच्छा से विधि शुभ रख देता है। मात्सर्यॆण जहद् ग्रहान्विसदृशे धूमध्वजे योग्यतां ज्ञात्वा स्वां निदधत् त्विषं दिनपतिर्हास्य. प्रशान्त्युन्मुखः । दैवं वेत्ति न यः शिखी स परतो नामास्तु तत्संभवाः स्युर्दीपा अपि यद्दृशेन जगतस्तिग्मांशुविस्मारकाः¹ ॥ ४९२ ॥ ४९२. मात्सर्य से नक्षत्रों को तिरस्कृत करते एवं अपने को समर्थ जानकर अतुलनीय अग्नि में अपनी कान्ति रखते हुए, अस्तोन्मुख सूर्य², उपहास पात्र होता है। जो अग्नि देव को नहीं जानता है, वह तो दूर रहे, उससे उत्पन्न जगत् के दीपक भी जिसके प्रभाव से सूर्य के विस्मारक होते हैं। धिया भाग्यानुगामिन्या चेष्टमानो नयोचितम् । अभूत्सर्वस्य चक्षुष्यः स तु दुर्लभवर्धनः ॥ ४९३ ॥ ४९३. और वह दुर्लभवर्धन भाग्यानुगामिनी बुद्धि द्वारा नयोचित चेष्टा करता हुआ सर्वजनप्रिय हो गया। प्रज्ञया द्योतमानं तं प्रज्ञादित्य इति प्रथाम् । कौबेरभाग्यसाम्यं च शनकैः श्वशुरोऽनयत् ॥ ४९४ ॥ ४९४. शनैः शनैः श्वशुर ने प्रज्ञा से द्योतमान उसे प्रज्ञादित्य नाम से ख्यात कर कुबेरतुल्य भाग्यशाली बना दिया। कश्मीर के भ्रमण काल में मैं किस्तवार गया ४९२ (१) राजतरंगिणी सूक्ति सग्रह का था। भद्रवा पहुँचा। स्थान अत्यन्त सुरम्य है। यह ८४वाँ श्लोक है। मुझे वहाँ 'वासुकी पुराण' की बात कही गयी। यह भी नीलमत पुराण की तरह एक उप- (२) सूर्य : सूर्य जब अस्त होता है तो पुराण है। कहा जाता है कि वह अपनी ज्योति अग्नि में पाठभेद : संग्रहीत कर देता है जिससे अग्नि प्रज्वलित. श्लोक सख्या ४९१ मे 'निश्चिन्वते' का रहती है। 'निश्चिन्वाते' तथा 'समन्‍या' का पाठभेद 'सामन्‍या', कहावत है कि चन्द्रमा के समान दीप भी 'संमन्या' तथा 'शामध्या' मिलता है। अपना प्रकाश सूर्य से ग्रहण करता है। पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ४९१ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसग्रह का श्लोकसंख्या ४९४ में 'कौबेर' का 'कौबीर' यह ८३वाँ श्लोक है। तथा 'साम्यं' का पाठभेद 'स्वम्य' मिलता है।

६०४ राजतरंगिण पित्रोः प्रेयस्तयोद्वृत्ता तारुण्यादिमदेन च । राजपुत्री यथावत्तु गणयामास नैव तम् ॥ ४९५ ॥ ४९५. माता पिता की प्रियता, तारुण्य आदि के मद के कारण प्रमत्त राजपुत्री ने उसे ( पति को ) यथोचित सम्मान नहीं दिया । स्वैरिणीसंगमो भोगा युवानोऽग्रे पितुर्गृहम् । पत्युर्मृदुत्वमित्यस्याः किं नाभूच्छीलविघ्नकृत् ॥ ४९६ ॥ ४९६. स्वैरिणी-संगम, भोग, युवापुरुष-सहवास, पितृगृह, पति की मृदुता इसे प्राप्त थे । इसमें कौन इसे शीलच्युत करने वाला नहीं थी ? सा नित्यदर्शनाभ्यासाच्छनकैर्विशता मनः । अनङ्गलेखा खङ्गेन संप्रायुज्यत मन्त्रिणा ॥ ४९७ ॥ ४९७. नित्यदर्शन अभ्यास से धीरे धीरे ( उसके ) मनमें प्रविष्ट मन्त्री खङ्ग पर अनंगलेखा आसक्त हो गयी । छन्नप्रेमसुखाभ्यासनष्टभीतिसंभ्रमा । धाष्टर्यं दिनाद्दिनं यान्ती ततस्तन्मयतां ययौ ॥ ४९८ ॥ ४९८. प्रच्छन्न प्रेम, सुख के अभ्यास से लज्जा, भय, सम्भ्रम रहित, वह दिन प्रति दिन धृष्ट होती हुई, तन्मय हो गयी । स मन्त्री दानमानाभ्यां वशीकृतपरिच्छदः । अन्तःपुरे यथाकामं विजहार तया सह ॥ ४९९ ॥ ४९९. उस मन्त्री ने दान-मान, द्वारा परिजनों को स्वाधीन करके अन्तःपुर में उसके साथ स्वेच्छापूर्वक विहार किया । उपलेभे च शनकैस्तस्यास्तं शीलविप्लवम् । विरागलिङ्गैरूद्बुद्धिः धीमान् दुर्लभवर्धनः ॥ ५०० ॥ ५००. बुद्धिमान दुर्लभवर्धन ने धीरे-धीरे (स्त्रीके) प्रकट होते विराग आदि चिन्हों से उसके उस शील विप्लव को जान लिया । पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : ४९६ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह ४९८ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ८५ वाँ श्लोक है । ८६ वाँ श्लोक है । पाठभेद : पाठभेद : श्लोकसंख्या ४९७ में 'संप्रायु' का पाठभेद श्लोकसंख्या ४९९ में 'सह' का पाठभेद 'सप्रयु' मिलता है। 'समम्' मिलता है ।

तृतीय तरंग ६०५ सखीमध्ये रहः स्मेरा विवर्णा भर्तृदर्शने । अकाण्ड एव प्रोत्थाय पश्यन्ती सस्मितं पथः ॥ ५०१ ॥ ५०१. एकान्त में सखी मध्य सस्मिता वह भर्त्ता दर्शन से विवर्ण हो जाती थी और अकाण्ड ही उठकर सस्मित पथ को देखती थी¹। पत्युः कोपे कृतावज्ञा भ्रूनेत्रचिवुकाञ्चनैः । तदप्रियं भाषमाणे सस्मितं न्यस्तलोचना ॥ ५०२ ॥ ५०२. उसके प्रति अप्रियभाषण करने पर पति प्रकोप की भ्रू, नेत्र, चिवुकों के संकोच पूर्वक वह न्यस्त लोचन सस्मित अवज्ञा कर देती थी। तत्तुल्यगुणनिर्विण्णा तद्विपक्षस्तुतौ रता । रिरंसां तस्य संलक्ष्य सखीभिर्बद्धसंकथा ॥ ५०३ ॥ ५०३. तदनुरूप गुणों के प्रति निर्विण्ण और उसके प्रतिकूल पक्ष की स्तुति में रत वह पति की रिरंसा को संलक्षित कर सखियों के साथ वार्ता में लग जाती थी। तच्चुम्बने भुग्नकण्ठी तदाश्लेपासहाङ्गका । तत्संभोगे त्यक्तहर्षा तत्तल्पे व्याजनिद्रिता ॥ ५०४ ॥ ५०४. उसके चुम्बन में तिर्यक् कण्ठ हो जाती, उसके आलिंगन को असह्य अनुभव करती, उसके सम्भोग में सव्याज निद्रित हो जाती। भवेद्धि प्रायशो योषित् प्रेमविक्रीतचेतना । निवेदयन्ती दौःशीन्यपिशाचावेशवैकृतम्¹ ॥ ५०५ ॥ ५०५. प्रेम विक्रीत चेतना योषित् प्रायशः दुश्शीलता बस पिशाचावेशवत् वैकृत प्रकट करती है। श्लोक संख्या ५०१ में 'प्रोत्थाय' का पाठभेद 'ञ्चलैः' मिलता है । 'प्रोप्ताय' मिलता है। श्लोक संख्या ५०३ में 'तत्तुल्य' का पाठभेद पादटिप्पणियाँ : 'तत्तृत्य' मिलता है । ५०१ (१) श्लोक संख्या ५०१ से ५०५ तक श्लोक संख्या ५०४ में 'श्लेपास' का पाठभेद का अनुवाद ओस्तोन, श्री पण्डित आदि प्रायः सभी अनुवादकों ने एक साथ किया है । थो कल्हण 'श्लेपे स' तथा 'निद्रिता' का 'निद्रता' मिलता है । पण्डित ने उन्हें एक साथ युग्मम्, तिलकम्, कुलकम् श्लोक संख्या ५०५ के पश्चात् 'कुलकम्' लिखा के समान एक नहीं रखा है । एक प्रति में मिलता है । 'कुलकम्' भी लिखा मिला है । पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ५०५ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह श्लोक संख्या ५०२ में 'ञ्चनैः' का पाठभेद ८७ वा श्लोक है । यह पद सुभाषित है ।

६०६ राजतरंगिणी निगूढदारदौर्गाल्म्यचिन्ताकृशवपुस्ततः । शुद्धान्तमविशज्जातु निशि दुर्लभवर्धनः ॥५०६॥ ५०६. पत्नी के निगूढ दौरात्म्य की चिन्ता वश कृश शरीर दुर्लभवर्धन कदाचित् रात्रि काल में शुद्धान्तःपुर में प्रवेश किया । सोऽपश्यत्सुरतक्लान्तिसुलभस्वापनिस्सहाम् । दुर्जारभर्तुरङ्गेषु प्रत्युप्तामिव वल्लभाम् ॥ ५०७ ॥ ५०७. उसने देखा—सुरति क्रान्ति सुलभ स्वाप (शयन) युक्त (उसकी) वल्लभा दुर्जांर भर्ता के अंग से लिपटी है। श्वासैरगलितावेगैः कम्पयद्भिः कुचाङ्कुरौ । निवेदयन्तीं तत्कालमेव निर्वहणं रतेः ॥ ५०८ ॥ ५०८. कुचांकुरों को कम्पित करते श्वास प्रश्वासों से तत्काल ही रति समाप्ति का बोध करा रही थी । अन्यस्यापि क्रोधहेतुं पुनरप्यक्षमावहाम् । तां तथाऽवस्थितां वीक्ष्य स प्रजज्वाल मन्युना ॥ ५०६ ॥ ५०९. दूसरों के लिये भी क्रोध निमित्त एवं अक्षम्य उसे, उस अवस्था में देखकर, वह क्रोध से प्रज्वलित हो उठा । प्रजिहीर्षुः स रोषेण विमर्शेन निवारितः । प्रहृत्यैव प्रहृत्यैव द्विवृत्तं स्वममन्यत ॥ ५१० ॥ ५१०. क्रोध से प्रहारेच्छुक, वह विमर्श के कारण निवारित हो, अपने को प्रहार करने से बचा लिया ।

पाठभेद : श्यत्' तथा 'दुर्जार' का पाठभेद 'दुर्जात' मिलता है । श्लोकसंख्या ५०६ में 'जातु' का पाठभेद 'ज्ञानु' श्लोक सख्या ५०८ में 'दयन्ती' का पाठभेद मिलता है। 'दयन्तो' तथा 'दयन्तो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५०६ ( १) शुद्धान्त : इसका शाब्दिक अर्थ श्लोक सख्या ५०९ में 'क्रोध' का पाठभेद शुद्ध अन्तरीष होता है। यह रनिवास किंवा 'क्रुधो' तथा सुझाव है कि 'पुनः' का पाठभेद अन्तःपुर के अर्थ में यहा प्रयुक्त किया गया है। 'मुने' होना चाहिये । पाठभेद : श्लोक सख्या ५१० में 'स' का पाठभेद 'स्म' श्लोक संख्या ५०७ में 'सोऽपश्यन्' का 'योऽप- मिलता है ।