राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९६ राजतरंगिणी राजवंशेष्वनेकेषु राज्ञोर्वंशद्वये परम् । द्वयोरेवात्र निर्व्यूढिं प्रजावात्सल्यमागतम् ॥४७२॥ ४७२. अनेक राजवंशो में दो राजवंश के दो नृपति उत्कृष्ट हुए। दोनों का ही प्रजा वात्सल्य पराकाष्ठा को प्राप्त हुआ¹। रणादित्यस्य गोनन्दवंशे रामस्य राघवे । लोकान्तरसुखस्यापि ययोरंशभुजः प्रजाः ॥४७३॥ ४७३. गोनन्द वंश में रणादित्य ए रघु वंश में राम¹ (उत्कृष्ट) हुए जिनकी प्रजा लोकान्तर सुख की भागी हुई। विक्रमाक्रान्तदिश्वस्य विक्र्मेश्वरकृत्सुतः । तस्यासीत् विक्रमादित्यः त्रिविक्रमपराक्रमः ॥४७४॥ ४७४. त्रिविक्रम¹ तुल्य पराक्रमी विक्रमादित्य² उसका पुत्र था। जिसने अपने पराक्रम से विश्वविजय एवं विक्रमेश्वर³ का निर्माण किया।
सार द्वीप पार्थिव जगत् का विभाजन है। इस विभाजन की गणना में साम्य नहीं है। इसे चार, सात, नव तथा तेरह भी कहा गया है। नैषध चरित में १८ विभाजन किये गये हैं। पर सब द्वीप मेरु के चारो ओर स्थित कहे गये हैं। मेरु को सुवर्ण पर्वत प्रफुल्लित कमल तुल्य कहा गया है। उसके केन्द्र में जम्बू द्वीप है। इस जम्बूद्वीप में ही भारतवर्ष है। द्वीप का शाब्दिक अर्थ जल से आवृत भूमि होता है। कुछ लेखको के मतसे प्राचीन काल में श्वेत द्वीप से यूरोप का अर्थ लगाया गया है। ४७२ (१) श्री स्टीन ने श्लोक ४७२ तथा ४७३ का एक साथ अनुवाद किया है। वह श्लोक 'युग्मकम्' नहीं है अतएव मैंने दोनों का अलग अलग अनुवाद किया है ४७३ (१) राम : वाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड १०१-११० में रामचन्द्र के अयोध्या में सरयू नदी में शरीर विसर्जन की कथा हृदयस्पर्शी शब्दों में दी गयी है। वहाँ उल्लेख किया गया है कि भगवान् राम की अनुगामिनी उनकी प्रजा हुई थी। ४७४ (१) त्रिविक्रम : यहाँ पर विष्णु किंवा वामन हैं। तीन पग से वामन अवतार में भगवान् ने जगत् को नाप लिया था अतएव उन्हें त्रिविक्रम कहा गया है। (२) विक्रमादित्य : कतिपय लेखकों ने विक्रमादित्य किसका पुत्र था सन्देह प्रकट किया है। तरंग के श्लोक ३४२१ में स्पष्ट प्रकट होता है कि यह वास्तव में रणादित्य का ही पुत्र था। श्री विल्सन से विक्रमादित्य के राज्याभिषेक का समय सन् ५३७ ई० ५ मास तथा समीकृत काल सन् ५६८ ई० और राज्यकाल ४२ वर्ष दिया है। श्री एस. सी. पण्डित वह समय सन् ५१७ ई. देते हैं। तथा राज्यकाल ४२ वर्ष देते हैं। स्टीन यह समय लौकिक संवत् ३५९९ मास २ तथा एक दिन तथा राज्यकाल ४२ वर्ष देते हैं। कलि गताब्द ३६५९ वर्ष ११ मास १३ दिन तथा ट्रायेर के मत से सन् ५१७ ई० ११ मास और कनिघम के अनुसार वह समय सन ५५६ ई० ५ मास आता है।