भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 782, कुल 984 में से

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पृष्ठ 782

तृतीय तरंग ५६७ राजा ब्रह्मगलूनाभ्यां सचिवाभ्यां समं महीम् । सोऽपासीद्वासवंसमो द्वाचत्वारिंशतिं समाः ॥४७५॥ ४७५. वासव (इन्द्र) समान उस राजा ने ब्रह्मा एवं गलून सचिवों के साथ बयालीस वर्ष पृथ्वी पर व्यतीत किया । चक्रे ब्रह्ममठं ब्रह्मा गलूनो लूनदुष्कृतः । रत्नावल्याख्यया वध्वा विहारं निरमापयत् ॥४७६॥ ४७६. ब्रह्मा ने ब्रह्ममठ एवं दुष्कृतच्छेत्ता गलून ने रत्नावली नाम्नी स्त्री के नाम से विहार निर्मित कराया । राज्ञोऽनन्तरजस्तस्य राजाऽभूत्तदनन्तरम् । तापितारातिभूपालो बालादित्यो बलोजितः ॥४७७॥ बालादित्य : ४७७. अनन्तर राजा का लघुभ्राता बलशाली बालादित्य राजा हुआ। जिसने शत्रु भूपालों को संतप्त किया । श्री स्तीन ने श्लोक ३४७५ में 'द्वाचत्वारिंशति' का अर्थ ४२ वर्ष किया है परन्तु श्रीरणजीत सीताराम पण्डित ने ४० वर्ष किया है । पं० रामतेज शास्त्री ने भी ४२ वर्ष अनुवाद किया है । श्री गोपीकृष्ण शास्त्री ने ४० वर्ष अर्थ लगाया है । श्री चन्द्रकान्त वाली ने ४२ वर्ष गणना की है । परिशेष में श्री स्तीन ने पुनः ४३ वर्ष दिया है । विक्रमादित्य के पश्चात् बालादित्य के राज्यारोहण काल से गणना करने पर भी ४२ वर्ष ही आता है । अतएव मैंने ४२ वर्ष ही रखा है । धी विदिउद्दीन ने एक विचित्र कपोलकल्पना इतिहास को अपने रंग में रंगने के लिये दी है । वह कहता है । राजा की आयु १६५ वर्ष की हुई थी । उसने ४० वर्ष से अधिक राज्य किया था । उसका राज्यकाल प्रथम हिजरी का समकालीन है । उसने पैगम्बर मुहम्मद साहब के पास राजदूत भेजा था । किन्तु कोई प्रमाण उपस्थित नहीं करता । आईने अकबरी में अबुल फजल ने नाम बलदूत दिया है । (३) विक्रमेश्वर : दिद्दा मठ के २ मिल उत्तर विचार नाग के समीप श्री आनन्द कौल के अनुसार विक्रमेश्वर का मन्दिर था । सिकन्दर बुत शिकन ने इसे ध्वस्त किया था । उसने मन्दिर के ध्वंसावशेष से मसजिद तथा खंन्खाह निर्माण कराया था । ( पृष्ठ २६ ) पाठभेद : श्लोकसंख्या ४७५ में 'गलूना' का पाठभेद 'गलूरा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४७७ ( १ ) श्री विल्सन के राज्याभिषेक का समय सन् ५७९ ई० ५ मास तथा समीकृत काल सन् ५९२ ई० तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है । श्री एस. पी. पण्डित ने समय सन् ५५९ ई. तथा राज्य काल ३७ वर्ष ४ मास दिया है । श्री स्तीन ने यह समय लौकिक संवत् ३६५१ मास २ तथा दिन प्रथम तथा राज्य काल का समय ३६ वर्ष ८ मास दिया है ।

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