राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५९३ स्वप्नैश्च सिद्धिचिह्नश्च जाताभङ्गुरनिश्चयः । चन्द्रभागाजलं भित्त्वा नमुचेः प्राविशद्विलम् ॥४६८॥ ४६८. स्वप्नों एवं सिद्धि सूचक चिह्नों से दृढ़ निश्चय हो (वह) चन्द्रभागा¹ जल का भेदन कर नमुचि² के बिल में प्रवेश किया। ४६८ (१) चन्द्रभागा : काश्मीर तथा पंजाब शतद्रू च विपाशां च पुण्यतोयामिरावतीम् । में प्रवाहित चिनाव नदी । चनाव नदी का संस्कृत देविकां चन्द्रभागां च तथा विष्णुपदं सरः ॥ नाम चन्द्रभागा है। चन्द्रभागा का ही अपभ्रंश 1155 = १२३९ चिनाव तथा चनाव है। वितस्ता से सम्बन्धित कुछ नदियो का नाम राजतरंगिणी तरंग ४:६३८ में वर्णित चन्द्रभागा नीलमत पुराण में आया है। वितस्ता नदी यदि स्रोतस्विनी इससे भिन्न है। चन्द्रभागा का वर्णन उमा की अवतार अर्थात् उमास्वरूप है तो दैत्य नीलमत पुराण में ११६, ११७, १२०, १२१, माता दिति कश्यप की पत्नी ने कश्मीर की १५४, तथा १०५५ में आता है। कल्हण ने चन्द्रभागा चन्द्रावती नदी का रूप धारण कर लिया है। का वर्णन त० ८:५५४ तथा ६२६ में किया है। दितिश्चन्द्रवती जाता कश्यपवचनानुकारिणी । नीलमत पुराण में चन्द्रभागा का निम्नलिखित उल्लेख मिलता है । इस नदी का अभीतक पता नहीं लग सका है। आपगा च नदी पुण्या तोषी तोषितभास्करा । नीलमत पुराण में इसका वर्णन त्रिकोटि तथा हपं चन्द्रांशुशीतलजला चन्द्रभागा सरिद्वरा ॥ पथा के साथ आता है। निर्विवाद है कि यह नदी 116 = १५८-१५६ वितस्ता की सहायक नदी थी । द्रष्टव्य नी० २८९ ४८५, १२९७, १३८९, १३०० ॐ ॐ ॐ पुण्यं च चन्द्रभागायास्तीर्थं वै षष्टिलामुखम् । अनन्त नाग के समीप चार ओर स्रोतस्विनियां दीक्षमण्डलनामा च तथा पापनिसूदनः ॥ आकर वितस्ता में मिल जाती हैं। उनके नाम 117 = १५९-१६० हैं; सन्द्रन, ब्रिङ्ग, अरिपथ तथा लिदर । सन्द्रन
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- ॐ नदी दक्षिण में बहती है और शाहिबाबाद क्षेत्र अर्थात् सर्वत्रैव सदा पुण्या चन्द्रभागा महानदी । प्राचीन वेर परगना का पानी लेकर वितस्ता में माघशुक्लत्रयोदश्यां पुष्ययोगे विशेषतः ॥ मिलती है। वह अनेक पवित्र स्रोतस्विनियों का 120 = १६२-१६३ जल भी लाती है। इस नदी का प्राचीन नाम क्या ॐ ॐ ॐ था कहना कठिन है । पृथिव्यां यानि तीर्थानि ह्रासमुद्रसरांसि च । ब्रिङ्ग नदी ब्रिङ्ग परगना का जल लाती है। चन्द्रभागां गमिष्यन्ति माघशुक्लत्रयोदशीम् ।। वितस्ता माहात्म्य में इसका नाम भृगो दिया गया है। 121 = १६३ १६४ यह सन्देहात्मक है। इस नदी में प्रसिद्ध त्रिसन्ध्या तथा
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- अर्धनारीश्वर अर्थात् नारू स्रोतस्विनियो का जल अश्वारूढ़ा विपाशा च गजारूढ़ा इरावती । लाता है। इन्द्र की पत्नी शची देवी ने स्वयं हर्य- सिंहेन चन्द्रभागा च सिन्धुर्व्याघ्रेण पार्थिव ॥ पथा नदी का रूप धारण किया है। दक्षिण पूर्व से 154 = २०६ आकर वितस्ता में मिलती है। हर्यपथा नाम से ७५
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