भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 777

५६२ राजतरंगिणी

मा भून्मोघाऽस्य मत्प्राप्तिरिति मत्वा तयाऽर्पितम् । असाधयत्तस् तं प्राप्य वशाम्तं वत्सरान् बहून् ॥४६६॥

४६६. 'मेरी प्राप्ति इसके लिये निष्फल न हो' यह समझकर उसके अर्पित उस वशीमन्त्र को प्राप्त ( राजा ने ) उसे बहुत वर्षों तक सिद्ध किया ।

कृत्वेष्टिकापथे कष्टं तपो नन्दिशिलां गतः । भूरिभिर्वत्सरैर्मन्त्रसिद्धेः प्रणयितां ययौ ॥४६७॥

४६७. 'इष्टिका पथ' में कष्ट साध्य तपस्या कर नन्द शिला२ गया और बहुत वर्षों के था मन्त्र सिद्धि प्राप्त की ।

पाठभेद : श्लोक संख्या ४६६ 'वशाम्तं' का पाठभेद 'वसन्तं', 'वसन्तु, घोर 'धंशान्त' मिलता है । श्लोक संख्या ४६७ में 'कृत्वेष्टि' का 'कृत्वष्टि' तथा 'तपो' का पाठभेद 'ततो' मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ : ४६७ (१) इष्टिका पथ : पवित्र हरमुकुट पर्वत की दिशा में इष्टिका पथ का नाम आता है। यह वह स्थान है जिसका वर्णन नीलमत पुराण (१०८१) में 'पयेश्वर इष्टाः' रूप में किया गया है। यह लार परगना में रामरादन स्थान है। यही से हरमुकुट यात्रा की चडान आरम्भ होती है ।

नीलमत पुराण में उल्लेख मिलता है : गुहेश्वरः शतमुखो यष्टिकापथ एव च । कन्दर्पबलस्तथा पुण्यं क्षेत्रे चैव समन्ततः ॥ 118 = १६०-१६१

(२) नन्दशिला : कल्हण से स्पष्ट नही होता कि उसका नन्दशिला से क्या तात्पर्य है। श्री स्टीन का मत है कि सम्भवतः नन्द शिला नन्दी की गाथा से सम्बन्धित नन्दिक्षेत्र में हरमुकुट पर्वत पर होना चाहिये । नन्दी की उत्पत्ति शिलाद अर्थात् शिलानूर्ण से हुई थी । उसने तपस्या नन्दिनगर में मूर्धापर शिला रखकर किया था। हमान परगना में नन्हेल ग्राम का पुराना नाम नन्दिशिला था। ( वितस्ता माहात्म्य : २४।३३) किन्तु स्थान को पुण्य किया पवित्र रूप में वर्णन नहीं किया गया है। नीलमत में उल्लेख मिलता है।

तस्य मूलमथासाद्य देव्यै वचनमब्रवीत् । इहैव तिष्ठ तावत्त्वमहं यास्याम्यतः परम् ॥ 1057 = १२४१

x x x धूपेन सहितो देवीपर्वतेऽस्मिन् हि यः पथा । करोत्यारोहणं तस्य महत्पुण्यफलं स्मृतम् ॥ 1058 = ११४२

x x x यथा त्वं न समर्थाऽसि सुकुमाराऽसि देवि यत् । आरोढुं तेन यास्येऽहमेक एवाथ सत्वरः ॥ 1069 = १२४३

x x x तस्माद्देशात् प्रवृत्तस्तु गन्तुं देववरः पथा । पार्थाश्वराख्यस्तत्रेष्टो देवस्यायतनोऽभवत् ॥ 1060 = १२४४-१२४५

x ... x आरुरोह यथा शैलं यदा देवो महेश्वरः । तदा वृद्धि मगाच्छैलो महतीं भूरिदक्षिणः ॥ 1061 = १२४५-१२४६