राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५९१ ख्यातिं रणपुरस्वामिसंज्ञया सर्वतो गतम् । स सिंहरोत्सिकाग्रामे मार्ताण्डं प्रत्यपादयत् ॥४६२॥ ४६२. उसने सिंहरोत्सिका ग्राम में रणपुरस्वामी नाम से प्रख्यात मार्तण्ड मन्दिर का निर्माण कराया । अमृतप्रभया तस्य राज्ञः पत्न्याऽन्यया कृतः । दक्षिणेऽस्मिन् रणेशस्य पार्श्वे देवोऽमृतेश्वरः ॥४६३॥ ४६३. उस नृप की अपर पत्नी अमृतप्रभा ने रणेश्वर के दक्षिण पार्श्व में अमृतेश्वर देव की स्थापना की । मेघवाहनभूभर्तृ पत्न्या भिन्नाऽऽख्यया कृते । विहारेऽपि तया बुद्धबिम्बं साधु निवेशितम् ॥४६४॥ ४६४. मेघवाहन नृप पत्नी भिन्ना¹ द्वारा निर्मित विहार में भी उसने सुन्दर बुद्ध प्रतिमा निविष्ट किया । राज्ञे देव्यनुरक्ताय सानुकक्रोशाय सैकदा । पातालसिद्धिदं मन्त्रं प्रददौ हाटकेश्वरम् ॥४६५॥ ४६५. एक बार उस (रणारम्भा स्वयं) ने देवी में अनुरक्त ए सहानुभूति पूर्ण नृपति को पाताल¹ ( विजय ) सिद्धिप्रद हाटकेश्वर मन्त्र प्रदान किया । पाठभेद : कल्हण ने कहीं भी इस प्रकार का गौण रूप से संकेत श्लोक संख्या ४६२ में 'मार्ताण्डं' का पाठभेद भी नहीं किया है। 'मार्तण्डं' मिलता है । ४६४ (१) अमृतेश्वर : इस मन्दिर के स्थान पादटिप्पणियाँ : तथा रूप का पता नहीं चलता । ४६२ (१) सिंहरोत्सिका : इस स्थान का (१) भिन्ना विहार : इसका भी पता नहीं पता नहीं चलता । कल्हण ने पुनः कहीं नहीं वर्णन चलता । किया है कि विष्णु का मन्दिर सूर्य किंवा मार्तण्ड दोनों का पुनः उल्लेख नहीं आया है जिससे रूप में कहीं स्थापित किया था । श्री जनरल इनके स्थान का पता लगाया जा सके । यह अनु- कनिंघम का यह मत कि मार्तण्ड का मध्यवर्ती सन्धान का विषय है । मन्दिर ही यह मन्दिर था और ललितादित्य ने केवल चारों ओर का स्तम्भावलोमय प्राकार का निर्माण ४६५ (१) पाताल : यूनानी लोग पाताल को कराया था । विद्वानों ने, मुख्यतः श्री फरगुसन और 'हेड्स' कहते हैं। वह नागों तथा आंशिक देवी श्री स्टीन ने, अमान्य किया है। यदि मार्तण्ड मन्दिर प्राणियों का स्थान माना जाता है। धारणा है कि रणादित्य का निर्माण कराया होता तो यह बात पाताल लोक नीचे था। कल्हण के काल में लोगों की स्मृति में अवश्य होती ।