राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९० राजतरंगिणी आरोग्यशाला निरघाऽप्युल्लाघत्वाय रोगिणाम् । तेन सेनामुखीदेवीभयशान्त्यै च कारिता ॥४६१॥ ४६१. उसने रोगियों के आरोग्य एवं सेनामुखी देवी के भय शान्ति हेतु सुन्दर आरोग्यशाला' स्थापित किया । नीलमत पुराण में प्रद्युम्न नाग का उल्लेख मिलता है । सूनौ द्वौ सुपाश्र्वेश्च सुनासः पञ्चहस्तकः । प्रद्युम्नश्चाम्धकः शम्भुः साल्वो मूलेश्वरो घपः ॥ 888 = १०५८ योग वासिष्ठ रामायण में हरपर्वत शिखर किंवा शारिका पर्वत शिखर को प्रद्युम्न शिखर कहा गया है । ( स्थिति प्रकरण : सर्ग : ३२ : श्लोक : १२ ) पुराणों में तीन प्रद्युम्न नामक व्यक्तियों का वर्णन मिलता है । भागवत पुराण ( ४ : १३ : १६) के अनुसार प्रद्युम्न एक राजा था। वह चक्षुर्मनु के बारह पुत्रों में से एक था । इसकी माता का नाम नड्वला था । सुद्युम्न भी इसका एक नामान्तर है । वायुपुराण के अनुसार प्रद्युम्न एक राजा था । यह भानुमत् राजा का पुत्र था । महाभारत अनुशासन पर्व के अनुसार प्रद्युम्न श्रीकृष्ण का पुत्र था । उसकी माता का नाम रुक्मिणी था । सनत्कुमार का अंश था । यह पूर्व जन्म में मदन था। शम्बरासुरका वध करने के लिये अवतार लिया था । शम्बरासुर की स्त्री मायावती पूर्व जन्म में प्रद्युम्न की पत्नी रति थी । पूर्व जन्म में मदन की मृत्यु के पश्चात् उसकी स्त्री रति को शम्बरासुर हर ले गया था । शम्बरा- सुर से बदला लेने के लिये प्रद्युम्न का अवतार लिया था । शम्बरासुर तथा प्रद्युम्न की कथा विष्णु, भागवत, हरिवंश तथा ब्रह्मवैवर्त पुराणों में भिन्न भिन्न रूप से दी गयी है। प्रद्युम्न-शाल्व युद्ध का भागवत १०:९०:३३ तथा महाभारत वनपर्व १५:१०-३२; १७:२५; १८:३; १५, १६६; २०:; १०; ७६; १३ में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । यादव वंश संहार के समय भोजों के सम्म प्रद्युम्न मृत हुआ । ( म० मो० : ४ : ३३; भा ११ : ३० : १६; गणेश : १ : ४९ ) मृत्युके अनन्तर वह सनत्कुमार के स्वरूप में प्रविष्ट हो गया । प्रद्युम्न की मायावती पत्नी के अतिरिक्त रुक्मिन की कन्या रुक्मावती अथवा शुभांगी से इसने विवाह किया था। ( भा० १० : ६१ : १८; ८० : १६ ; ) शुभांगी से इसको अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ था । ४६१ (१) आरोग्यशाला : अस्पताल का अर्थ आरोग्यशाला है । कल्हण प्राचीन काल में सार्व- जनिक आरोग्यशाला होने का उल्लेख करता है । कल्हण के इस वर्णन ने इतिहास को एक टूटी श्रृंखला की कड़ी को जोड़ा है । आयुर्वेद एवं आयुर्विज्ञान भारत में अत्यन्त विकसित था । तक्षशिला तथा काशी इस विद्या के केन्द्र थे । बौद्ध काल में समस्त भारतवर्ष तथा विदेश से विद्यार्थी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति सीखने तथा ज्ञान प्राप्त करने के लिये तक्षशिला जाते थे । भगवान् बुद्ध का प्रसिद्ध चिकित्सक जीवक राजगृह से तक्षशिला में आकर शिक्षा प्राप्त किया था । उस समय आजकल के समान सार्वजनिक अस्पताल भी होते थे यह बात कल्हण के उक्त उल्लेख से स्पष्ट होती है। राजतरंगिणी में आरोग्य- शाला स्थापित करने का यह प्रथम उल्लेख मिलता है ।