भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 774

: तृतीय तरंग ५८९ जनास्त्वलखयन् यत्स स्वयं पीठमवातरत् । इति केषामपि हृदि प्रवादोऽद्यापि वर्तते ॥४५८॥ ४५८. लोगों ने देखा कि वे स्वयं पीठ पर अवतरित हुए-यह प्रवाद आज भी किसी-किसी के हृदय में (स्थित) है। सा ब्रह्मप्रतिमं सिद्धं देवी ब्रह्मविदां वरम् । अकारयत्समुद्दिश्य परार्ध्यं ब्रह्ममण्डपम् ॥४५६॥ ४५९. ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मप्रतिम उस सिद्ध को उद्देश्य कर उस देवी ने बहुमूल्य ब्रह्म मण्डप निर्मित कराया । रणारम्भास्वामिदेवौ दंपत्तिभ्यां व्यधीयत । मठः पाशुपतानां च ताभ्यां प्रद्युम्नमूर्धनि ॥४६०॥ ४६०. रणारम्भा स्वामी एवं रणारम्भादेव को दम्पति ने बनवाया । प्रद्युम्न मूर्धा (शिखर) पर पाशुपतों के लिये मठ निर्मित कराया । पाठभेद : जोड़ा है । प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध थे । श्लोक संख्या ४५८ में 'प्रवादो' का पाठभेद इस पर्वत के पूर्वीय ढाल पर बहुत पैमाने में 'प्रवचो' मिलता है । फैली मुसलिम जियारतें मुरुद्दम साहित्य तथा श्लोकसंख्या ४५९ में 'परार्ध्य' का 'परार्द्धं' आखूनमुल्ला शाह की है । यह सब प्राचीन मन्दिर तथा 'मण्डपम्' का पाठभेद 'सत्तमम्' मिलता है । मठो तथा विहारों के स्थानों पर बनी है। यद्यपि श्लोकसंख्या ४६० में 'देवो' का 'देवी' रणस्वामी एवं रणेश्वर के मन्दिरों की तरह यह 'दम्पतिभ्यां' का 'दम्पतीभ्यां' तथा 'प्रद्युम्नमूर्धनि' भी समीप ही स्थित है परन्तु निश्चयात्मक रूप से का पाठभेद 'शारिकागिरौ' मिलता है । नहीं कहा जा सकता कि वे रणस्वामी एवं रणेश्वर पादटिप्पणियाँ : के ही स्थान थे । पता नहीं जब मैने इस स्थानों ४६० (१) प्रद्युम्न मूर्धा: प्रद्युम्न मूर्धा किंवा को देखा तो भावुकतावश यह धारणा हो गयी कि शिखर हर अथवा शारिका पर्वत के लिये प्रयुक्त रणस्वामी तथा रणेश्वर के ध्वन्सावशेष यही थे । किया गया है। इसे हर पर्वत भी कहते हैं। परन्तु वह मेरे मन का भ्रम ही हो सकता है । इसका उल्लेख प्रद्युम्न पीठ, प्रद्युम्न गिरि, तथा इसका कोई प्रमाण नहीं प्रतीत होता । किन्तु न प्रद्युम्नशिखर नाम से किया गया है (त. ७:१६- जाने वहाँ आनेपर मुझे क्यों हार्दिक सन्ताप जैसा १६; विक्रमांक देव चरित, विल्हण ; १८।१५; हुआ । मन रोने लगा । आंखो के सम्मुख जोनराज; ५८७, ८७०; श्रीवर १:६३१, २:८८, जैसे मूर्तियां थाने लगीं। मुझे अच्छी तरह स्मरण तथा महादेव माहात्म्य २।७)। है मूर्तियों के मुख से करुणा जैसे झलक रही थी । सोमदेव ने कथासरित्सागर (७३:१०९) में वे कह रही थीं-क्या था ? क्या होगया ? मै उस इस पर्वत को उषा और अनिरुद्ध की प्रेम कथा से समय के अपने भाव को व्यक्त करने में सर्वथा असमर्थ पाता हूँ।