राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 773, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें४६८ राजतरंगिणी कर्तुं प्रभावजिज्ञासां राज्ञा दत्तधनस्ततः । सं स्वयंभूः स्वयं भक्तैः तांस्तान्ग्रामानदापयत् ॥४५५॥ ४५५. प्रभाव के जिज्ञासा हेतु उन्हें धन अर्पित किया। तदनन्तर स्वयं उन स्वयंभू ने भक्तों को तत्तत् ग्राम प्रदात कराया। कुम्भदासत्या छन्नः सिद्धो ब्रह्मभिधो वसन् । परिज्ञाय तयोर्देव्या प्रतिष्ठाकर्म कारितः ॥४५६॥ ४५६. कुम्भदास' (जल लाने वाला) के रूप में छिपकर रहते हुए ब्रह्म नामक सिद्ध को जान कर रानी ने उसके द्वारा दोनों (मूर्तियों) का प्रतिष्ठा कर्म कराया। स वृत्तप्रत्यभिज्ञः सन्प्रतिष्ठाप्य रणेश्वरम् । व्योम्ना व्रजन् रणस्वामिप्रतिष्ठां गूढमादधे ॥४५७॥ ४५७. रणेश्वर की प्रतिष्ठा करके परिचय ज्ञात हो जाने पर आकाश से जाते हुए रण स्वामी की प्रतिष्ठा गुप्त रूप से की। दीवालों के अतिरिक्त जो अष्टकोणीय कक्षा पर बनी है तथा दो सीढ़ियां जो इसके दोनो द्वारों पर गयी हैं। मन्दिर के प्रांगण के प्राकार की दीवारें भी आज तक खड़ी हैं। किसी का ध्यान इस ओर नही गया है। कश्मीर के पुरातत्व के कागजों में भी इसका उल्लेख नही किया गया है। श्री स्टीन ने एक दूसरा विकल्प भी दिया है। वे कहते हैं— लछम कुल प्राचीन समय में यदि ओर उत्तर दिशा में उस शाखा में मिली होती जो डल लेक में जाकर कूट कदल के पास जाकर मिल जाती है तो रणस्वामी के मन्दिर का ध्वंन्सावशेष संगीन दरवाजा के उत्तरौद भाग में मादिन साहब की मसजिद में बिखरे प्राचीन मन्दिरो के ध्वंसावशेष में खोजना होगा। श्री पण्डित साहेबराम ने अपने तीर्थों में केवल इतना ही लिखा है। रणस्वामी का मन्दिर हर पर्वत के पश्चिम में था। उन्होंने कोई निश्चित स्थान नहीं बताया है। 'पाठभेद' श्लोक संख्या ४५५ में 'भक्तै' का पाठभेद 'मरुता' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४५५ (१) स्वयंभू : यह मानव निर्मित प्रतिमा तथा स्थान नही होता था अपितु स्वयं प्रजापति का कर्तृत्व समझा जाता था। रा. तं. १ : ३४, पृष्ठ ७३ द्रष्टव्य है। श्री स्टीन, श्री रणजीत सीताराम पण्डित एवं अन्य अनुवादकों ने श्लोक संख्या ४५६-४५८ का एक ही साथ अनुवाद 'तिलकम्' के रूप में किया है। किन्तु श्री कल्हण ने उन्हें 'तिलकम्' नहीं लिखा है। अतएव उनका अनुवाद अलग अलग किया गया है। ४५६ (१) कुम्भदास : कुम्भकार का अर्थ कुम्हार होता है। अर्थात् घड़ा बनाने वाले का नाम कुम्भकार होता है। कुम्भ दास का अर्थ होगा कुम्भ-घड़ा का दास। यह शब्द यहाँ पर कर्म का बोधक है। कुम्भ की सेवा का तात्पर्य कुम्भ से जल ले जाना ही हो सकता है। वाटर पाइप लगने के पूर्व कश्मीरी हिन्दू ब्राह्मणो के घर में क्षत्रिय तथा उनकी स्त्रियां घड़ों अर्थात् कुम्भ से जल भरती थी। वे मासिक पारिश्रामिक पाती थी। पुरुष जल भरने वाले को कुम्भदास तथा जल भरने वाली स्त्री को कुम्भदासी कहा जाता था। कल्हण ने कुम्भदासी का पुनः उल्लेख त० ८ : १७३६ में किया है।