राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०० राजतरंगिणी बभूव तस्य भूर्भर्तुः भुवनाद्भुतविभ्रमा । तनयाऽनङ्गलेखाख्या शृङ्गारोदधिकौमुदी ॥४८४॥ ४८४. उस नृपति को भुवनाद्भुत विलासयती शृङ्गार रूपी समुद्र के लिये कौमुदी (कार्तिक एवं आश्विन पूर्णिमा) अनंगलेखा नाम्नी कन्या हुई । तां वीक्ष्य लक्षणोपेतां मृगाक्षीं पितुरन्तिके । अमोघप्रत्ययो व्यक्तं व्याजहारेति दैववित् ॥ ४८५ ॥ ४८५. पितृ पार्श्व में लक्षण सम्पन्न उस मृगाक्षी को देखकर अमोघप्रत्ययी ज्योतिषी ने इस प्रकार सुस्पष्ट कहा- भविता तव जामाता जगतीभोगभाजनम् । त्वदन्तमेव साम्राज्यं गोनन्दान्वयजन्मनाम् ॥ ४८६ ॥ ४८६. "गोनन्दवंशियों का साम्राज्य तुम्हारे ही तक है-और तुम्हारा जामाता जगत् पृथ्वी का भोग भाजन होगा।" सुतासंतानसाम्राज्यमनिच्छन्नथ पार्थिवः । दैवं पुरुपकारेण जेतुमासीत्कृतोद्यमः ॥ ४८७ ॥ ४८७. सुता संतान के साम्राज्य को न चाहते हुए, नृपति ने दैव को पुरुषार्थ पूर्वक विजित करने का प्रयत्न किया । अराजान्वयिने दत्ता नेयं साम्राज्यहारिणी । मत्त्वेति प्रददौ कन्यां न कस्मैचन भूपुजे ॥ ४८८ ॥ ४८८. 'अराजवंशीय' को प्रदत्त यह कन्या राज्यहारिणी नहीं होगी' ऐसा मानकर उसे किसी राजा को नहीं दिया । हेतुं सरूपतामात्रं कृत्वा जामातरं नृपः । अथाश्वघासकायस्थं चक्रे दुर्लभवर्धनम् ॥ ४८६ ॥ ४८९. राजा ने सुन्दरता मात्र को हेतु मानकर अश्वघास कायस्थ दुर्लभ वर्धन को जामाता बनाया। पाठभेद : श्लोक संख्या ४८४ में 'विभ्रमा' का पाठभेद 'विक्रमा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४८८ (१) अराजवंशीय : राजा की इच्छा यह नहीं थी की गोनन्द वंश से साम्राज्य दूसरे वंश में चला जाय । अतएव वह निसन्देह चिन्तित हुआ था । कल्हण प्रथम तरंग में गोनन्दवंश के गोनन्द प्रथम दामोदर यशोवती, तथा गोनन्द तृतीय का वर्णन कर ३५ राज्यो का विवरण लुप्त मानता है । पाठभेद : श्लोक सख्या ४८६ में 'सरूप' का पाठभेद