राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ६०१ मातुः कार्कोटनागेन सुस्नातायाः समीयुपा । राज्यायैव हि संजातो राज्ञा नाज्ञायि तेन सः ॥ ४९० ॥ ४९०. उस राजा ने यह नहीं जाना कि सुस्नात (इसकी) माता और कर्कोट नाग १ के सम्भोग से राज्य के लिये ही वह उत्पन्न हुआ है।
'स्वभूष' तथा 'स रूप' मिलता है । पादटिप्पणियां (१) अश्वघास कायस्थ : श्रीनगर में घोड़ों के लिये घास समीपवर्ती स्थानो, सरोवरों, घासवाली भूमि, से नावों द्वारा लाई जाती थी। नावें मुख्य यातायात को साधन थी । घास व्यर्थ न जाय और वह अश्व जिनका सम्बन्ध उन दिनो अश्वारोही सेना तथा देश की सुरक्षा से था राज्य सम्पत्ति समझा जाता था। उसपर राज्य कर लगता था । डोगरा काल तक यह कर चलता रहा है । कायस्थ यहाँ पर जातिवाचक न हो कर कर्म-वाचक है। कश्मीर में कर्मणा कायस्थ होते थे। राज्य कर्मचारो को कायस्थ कहते थे । अश्वघास कायस्य का यहा तात्पर्य घोड़ों के लिये घास लाने वालों का अधिकारो राज्य कर्मचारी है। पाठभेद : श्लोक संख्या ४९० में 'कार्को' का 'कर्को', 'समीयुपा' का 'समेयुपा', 'संजातो' का 'संजाता' तथा 'सः' का पाठभेद 'सा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४९० (१) कार्कोट नाग : कर्कोट नाग के नाम पर कश्मीर का कर्कोट राजवंश चला था। कल्हण ने इस राजवंश के राजाओ का वर्णन समस्त चतुर्थ तरंग में किया है। उसमें १७ राजा हुए थे । उनका शासन काल लौकिक संवत् ३६७७ से ३९२९ तक रहा है। इस वंश ने कश्मीर पर २५४ वर्ष ५ मास २७ दिन तक शासन किया था।
नीलमत पुराण में कार्कोट नाग का वर्णन मिलता है । कश्मार के नागामो की तालिका मे प्रारम्भ में ही उसका नाम नील, वासुकी, तथा तक्षक नाग के साथ आता है। प्रतीत होता है। कार्कोट नाग की पूजा विभिन्न स्थानो में होती थी । करकोट द्रग का नाम कार्कोट नाम पर पड़ा था । (त० ८.१५९६) अनुमान किया जाता है कि वह तोष मैदान पास के समोपस्थ किसी एक सरोवर में निवास करता था। उसका उल्लेख चौथी राजतरंगिणी के श्लोक ११४ तथा तीर्थों में किया गया है । वेगिल परगना में काकोदर पर्वत बाहुभूस का नाम कार्कोट का ही अपभ्रंश है। तीर्थों में एक ओर कार्कोट नाग का उल्लेख मिलता है । कुधर परगना में यह गांव उतरुस है । हरचरित चिंतामणि १० में वर्णित स्रोत सम्भवतः यही है । नीलमत में कार्कोट नाग का उल्लेख आता है । कम्बलाश्वतरो नागो कार्कोटकधनंजयौ ॥ 881 : १०५० ॥ कद्रू का पुत्र कर्कोटक नाग वरुण की सभा में उपस्थित रहता है। (म० स० ९:९) नागो की भोगवती नामक नगरी में इसका निवास कहा गया है (म० उ० १०१ : ९) नारद की दावाग्नि में जब यह फँस गया था तो नल ने इसका उद्धार किया था । (म० व० ६३) कार्कोट नामक भारतवर्ष के विभाग के कार्कोटक लोगों को महाभारत में विधर्मी कहा गया है। उनका वर्णन महाभारत कर्ण पर्व (४४:४३) में मिलता है । जयपुर राज्य के पूर्व अंचल में कार्कोट नगर नामक स्थान है। वहाँ मालवों के आरम्भिक काल की मुद्रायें
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