भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 791

६०६ राजतरंगिणी निगूढदारदौर्गाल्म्यचिन्ताकृशवपुस्ततः । शुद्धान्तमविशज्जातु निशि दुर्लभवर्धनः ॥५०६॥ ५०६. पत्नी के निगूढ दौरात्म्य की चिन्ता वश कृश शरीर दुर्लभवर्धन कदाचित् रात्रि काल में शुद्धान्तःपुर में प्रवेश किया । सोऽपश्यत्सुरतक्लान्तिसुलभस्वापनिस्सहाम् । दुर्जारभर्तुरङ्गेषु प्रत्युप्तामिव वल्लभाम् ॥ ५०७ ॥ ५०७. उसने देखा—सुरति क्रान्ति सुलभ स्वाप (शयन) युक्त (उसकी) वल्लभा दुर्जांर भर्ता के अंग से लिपटी है। श्वासैरगलितावेगैः कम्पयद्भिः कुचाङ्कुरौ । निवेदयन्तीं तत्कालमेव निर्वहणं रतेः ॥ ५०८ ॥ ५०८. कुचांकुरों को कम्पित करते श्वास प्रश्वासों से तत्काल ही रति समाप्ति का बोध करा रही थी । अन्यस्यापि क्रोधहेतुं पुनरप्यक्षमावहाम् । तां तथाऽवस्थितां वीक्ष्य स प्रजज्वाल मन्युना ॥ ५०६ ॥ ५०९. दूसरों के लिये भी क्रोध निमित्त एवं अक्षम्य उसे, उस अवस्था में देखकर, वह क्रोध से प्रज्वलित हो उठा । प्रजिहीर्षुः स रोषेण विमर्शेन निवारितः । प्रहृत्यैव प्रहृत्यैव द्विवृत्तं स्वममन्यत ॥ ५१० ॥ ५१०. क्रोध से प्रहारेच्छुक, वह विमर्श के कारण निवारित हो, अपने को प्रहार करने से बचा लिया ।

पाठभेद : श्यत्' तथा 'दुर्जार' का पाठभेद 'दुर्जात' मिलता है । श्लोकसंख्या ५०६ में 'जातु' का पाठभेद 'ज्ञानु' श्लोक सख्या ५०८ में 'दयन्ती' का पाठभेद मिलता है। 'दयन्तो' तथा 'दयन्तो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५०६ ( १) शुद्धान्त : इसका शाब्दिक अर्थ श्लोक सख्या ५०९ में 'क्रोध' का पाठभेद शुद्ध अन्तरीष होता है। यह रनिवास किंवा 'क्रुधो' तथा सुझाव है कि 'पुनः' का पाठभेद अन्तःपुर के अर्थ में यहा प्रयुक्त किया गया है। 'मुने' होना चाहिये । पाठभेद : श्लोक सख्या ५१० में 'स' का पाठभेद 'स्म' श्लोक संख्या ५०७ में 'सोऽपश्यन्' का 'योऽप- मिलता है ।