राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ६०५ सखीमध्ये रहः स्मेरा विवर्णा भर्तृदर्शने । अकाण्ड एव प्रोत्थाय पश्यन्ती सस्मितं पथः ॥ ५०१ ॥ ५०१. एकान्त में सखी मध्य सस्मिता वह भर्त्ता दर्शन से विवर्ण हो जाती थी और अकाण्ड ही उठकर सस्मित पथ को देखती थी¹। पत्युः कोपे कृतावज्ञा भ्रूनेत्रचिवुकाञ्चनैः । तदप्रियं भाषमाणे सस्मितं न्यस्तलोचना ॥ ५०२ ॥ ५०२. उसके प्रति अप्रियभाषण करने पर पति प्रकोप की भ्रू, नेत्र, चिवुकों के संकोच पूर्वक वह न्यस्त लोचन सस्मित अवज्ञा कर देती थी। तत्तुल्यगुणनिर्विण्णा तद्विपक्षस्तुतौ रता । रिरंसां तस्य संलक्ष्य सखीभिर्बद्धसंकथा ॥ ५०३ ॥ ५०३. तदनुरूप गुणों के प्रति निर्विण्ण और उसके प्रतिकूल पक्ष की स्तुति में रत वह पति की रिरंसा को संलक्षित कर सखियों के साथ वार्ता में लग जाती थी। तच्चुम्बने भुग्नकण्ठी तदाश्लेपासहाङ्गका । तत्संभोगे त्यक्तहर्षा तत्तल्पे व्याजनिद्रिता ॥ ५०४ ॥ ५०४. उसके चुम्बन में तिर्यक् कण्ठ हो जाती, उसके आलिंगन को असह्य अनुभव करती, उसके सम्भोग में सव्याज निद्रित हो जाती। भवेद्धि प्रायशो योषित् प्रेमविक्रीतचेतना । निवेदयन्ती दौःशीन्यपिशाचावेशवैकृतम्¹ ॥ ५०५ ॥ ५०५. प्रेम विक्रीत चेतना योषित् प्रायशः दुश्शीलता बस पिशाचावेशवत् वैकृत प्रकट करती है। श्लोक संख्या ५०१ में 'प्रोत्थाय' का पाठभेद 'ञ्चलैः' मिलता है । 'प्रोप्ताय' मिलता है। श्लोक संख्या ५०३ में 'तत्तुल्य' का पाठभेद पादटिप्पणियाँ : 'तत्तृत्य' मिलता है । ५०१ (१) श्लोक संख्या ५०१ से ५०५ तक श्लोक संख्या ५०४ में 'श्लेपास' का पाठभेद का अनुवाद ओस्तोन, श्री पण्डित आदि प्रायः सभी अनुवादकों ने एक साथ किया है । थो कल्हण 'श्लेपे स' तथा 'निद्रिता' का 'निद्रता' मिलता है । पण्डित ने उन्हें एक साथ युग्मम्, तिलकम्, कुलकम् श्लोक संख्या ५०५ के पश्चात् 'कुलकम्' लिखा के समान एक नहीं रखा है । एक प्रति में मिलता है । 'कुलकम्' भी लिखा मिला है । पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ५०५ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह श्लोक संख्या ५०२ में 'ञ्चनैः' का पाठभेद ८७ वा श्लोक है । यह पद सुभाषित है ।