राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०४ राजतरंगिण पित्रोः प्रेयस्तयोद्वृत्ता तारुण्यादिमदेन च । राजपुत्री यथावत्तु गणयामास नैव तम् ॥ ४९५ ॥ ४९५. माता पिता की प्रियता, तारुण्य आदि के मद के कारण प्रमत्त राजपुत्री ने उसे ( पति को ) यथोचित सम्मान नहीं दिया । स्वैरिणीसंगमो भोगा युवानोऽग्रे पितुर्गृहम् । पत्युर्मृदुत्वमित्यस्याः किं नाभूच्छीलविघ्नकृत् ॥ ४९६ ॥ ४९६. स्वैरिणी-संगम, भोग, युवापुरुष-सहवास, पितृगृह, पति की मृदुता इसे प्राप्त थे । इसमें कौन इसे शीलच्युत करने वाला नहीं थी ? सा नित्यदर्शनाभ्यासाच्छनकैर्विशता मनः । अनङ्गलेखा खङ्गेन संप्रायुज्यत मन्त्रिणा ॥ ४९७ ॥ ४९७. नित्यदर्शन अभ्यास से धीरे धीरे ( उसके ) मनमें प्रविष्ट मन्त्री खङ्ग पर अनंगलेखा आसक्त हो गयी । छन्नप्रेमसुखाभ्यासनष्टभीतिसंभ्रमा । धाष्टर्यं दिनाद्दिनं यान्ती ततस्तन्मयतां ययौ ॥ ४९८ ॥ ४९८. प्रच्छन्न प्रेम, सुख के अभ्यास से लज्जा, भय, सम्भ्रम रहित, वह दिन प्रति दिन धृष्ट होती हुई, तन्मय हो गयी । स मन्त्री दानमानाभ्यां वशीकृतपरिच्छदः । अन्तःपुरे यथाकामं विजहार तया सह ॥ ४९९ ॥ ४९९. उस मन्त्री ने दान-मान, द्वारा परिजनों को स्वाधीन करके अन्तःपुर में उसके साथ स्वेच्छापूर्वक विहार किया । उपलेभे च शनकैस्तस्यास्तं शीलविप्लवम् । विरागलिङ्गैरूद्बुद्धिः धीमान् दुर्लभवर्धनः ॥ ५०० ॥ ५००. बुद्धिमान दुर्लभवर्धन ने धीरे-धीरे (स्त्रीके) प्रकट होते विराग आदि चिन्हों से उसके उस शील विप्लव को जान लिया । पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : ४९६ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह ४९८ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ८५ वाँ श्लोक है । ८६ वाँ श्लोक है । पाठभेद : पाठभेद : श्लोकसंख्या ४९७ में 'संप्रायु' का पाठभेद श्लोकसंख्या ४९९ में 'सह' का पाठभेद 'सप्रयु' मिलता है। 'समम्' मिलता है ।