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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 788, कुल 984 में से

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पृष्ठ 788

तृतीय तरंग ६०३ निश्चिन्वते हि ज्ञंमन्या यमेवायोग्यमाग्रहात् । जिगीषयेव तत्रैव निदधाति विधिः शुभम्¹ ॥ ४९१ ॥ ४९१. अपने को विज्ञ मानने वाले जिसे हठात् अयोग्य सिद्ध करते हैं, उसी में विजय की इच्छा से विधि शुभ रख देता है। मात्सर्यॆण जहद् ग्रहान्विसदृशे धूमध्वजे योग्यतां ज्ञात्वा स्वां निदधत् त्विषं दिनपतिर्हास्य. प्रशान्त्युन्मुखः । दैवं वेत्ति न यः शिखी स परतो नामास्तु तत्संभवाः स्युर्दीपा अपि यद्दृशेन जगतस्तिग्मांशुविस्मारकाः¹ ॥ ४९२ ॥ ४९२. मात्सर्य से नक्षत्रों को तिरस्कृत करते एवं अपने को समर्थ जानकर अतुलनीय अग्नि में अपनी कान्ति रखते हुए, अस्तोन्मुख सूर्य², उपहास पात्र होता है। जो अग्नि देव को नहीं जानता है, वह तो दूर रहे, उससे उत्पन्न जगत् के दीपक भी जिसके प्रभाव से सूर्य के विस्मारक होते हैं। धिया भाग्यानुगामिन्या चेष्टमानो नयोचितम् । अभूत्सर्वस्य चक्षुष्यः स तु दुर्लभवर्धनः ॥ ४९३ ॥ ४९३. और वह दुर्लभवर्धन भाग्यानुगामिनी बुद्धि द्वारा नयोचित चेष्टा करता हुआ सर्वजनप्रिय हो गया। प्रज्ञया द्योतमानं तं प्रज्ञादित्य इति प्रथाम् । कौबेरभाग्यसाम्यं च शनकैः श्वशुरोऽनयत् ॥ ४९४ ॥ ४९४. शनैः शनैः श्वशुर ने प्रज्ञा से द्योतमान उसे प्रज्ञादित्य नाम से ख्यात कर कुबेरतुल्य भाग्यशाली बना दिया। कश्मीर के भ्रमण काल में मैं किस्तवार गया ४९२ (१) राजतरंगिणी सूक्ति सग्रह का था। भद्रवा पहुँचा। स्थान अत्यन्त सुरम्य है। यह ८४वाँ श्लोक है। मुझे वहाँ 'वासुकी पुराण' की बात कही गयी। यह भी नीलमत पुराण की तरह एक उप- (२) सूर्य : सूर्य जब अस्त होता है तो पुराण है। कहा जाता है कि वह अपनी ज्योति अग्नि में पाठभेद : संग्रहीत कर देता है जिससे अग्नि प्रज्वलित. श्लोक सख्या ४९१ मे 'निश्चिन्वते' का रहती है। 'निश्चिन्वाते' तथा 'समन्‍या' का पाठभेद 'सामन्‍या', कहावत है कि चन्द्रमा के समान दीप भी 'संमन्या' तथा 'शामध्या' मिलता है। अपना प्रकाश सूर्य से ग्रहण करता है। पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ४९१ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसग्रह का श्लोकसंख्या ४९४ में 'कौबेर' का 'कौबीर' यह ८३वाँ श्लोक है। तथा 'साम्यं' का पाठभेद 'स्वम्य' मिलता है।

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