भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 771

५८६ राजतरंगिणी प्रागेव सरसस्तस्मात्कुशलैः शिल्पिभिर्मया । तावुद्धृतौ प्रातरत्र प्राप्तौ द्रक्ष्यस्यसंशयम् ॥४४९॥ ४४९. 'मैंने पहले ही उस सरोवर से कुशल शिल्पियों द्वारा उन दोनों को निकलवा लिया है। निश्चय ही प्रातः यहाँ देखोगे। तयोः प्रतिष्ठा क्रियतामित्युक्त्वा पृथिवीभुजम् । देवी प्रयाता शुद्धान्तं सिद्धान्सस्मार खेचरान् ॥४५०॥ ४५०. उन दोनों की प्रतिष्ठा करें।' इस प्रकार पृथिवीपति से कह कर देवी शुद्धान्त (अन्तःपुर) में गयी और सिद्ध खेचरों' (आकाशचारी) का स्मरण किया। ते ध्यातमात्राः संप्राप्ता देव्यादेशेन पाथसः । उद्धृत्य नृपतेर्धाम्नि देवौ हरिहरौ न्यधुः ॥४५१॥ ४५१. ध्यान करते ही, वे उपस्थित हो गये और देवी के आदेश से जल से निकालकर, हरि-हर दे को नृप धाम में लाये। दिव्यैः प्रसूनैः संवीतौ हरनारायणौ जनः । प्रातर्नृपगृहे दृष्ट्वा परं विस्मयमाययौ ॥४५२॥ ४५२. दिव्य प्रसूनों से संवीत (आच्छादित) हर तथा रि को प्रातः राजगृह में देखकर लोग अत्यन्त विस्मित हुए। सज्जे प्रतिष्ठालग्नेऽथ माहेश्वरतया नृपः । रणेश्वरप्रतिष्ठायां पूर्वं यावत्समुद्यतः ॥४५३॥ ४५३. माहेश्वर होने के कारण नृप प्रतिष्ठा सज्ज (उपस्थित) होने पर पहले रणेश्वर की प्रतिष्ठा हेतु जबतक उद्यत हो रहा था —


कि प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने स्वयं वहाँ नन्दीश्वर की मूर्ति का दर्शन करके कश्मीर जाकर अपनी आँखों से इन तीर्थों को मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। स्वर्गमार्ग में देखा था। स्नान करने पर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम् । पाठभेद : अभ्येत्य योजनशताद् भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥२५:६० श्लोक संख्या ४४९ में 'द्धृतौ' का पाठभेद 'द्यतो' मिलता है। × × × श्लोक संख्या ४५१ में 'न्यधुः' का पाठभेद नन्दीश्वरस्य मूर्तिं तु दृष्ट्वा मुच्येत किल्बिषैः । यधुः' मिलता है। स्वर्गमार्गे नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥२५:६० श्लोक संख्या ४५३ में 'लग्ने' का पाठभेद सौ योजन दूरसे आकर कालोदक, नन्दि कुण्ड 'लिङ्गे' मिलते हैं। तथा उत्तरमानम तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य पादटिप्पणियाँ : यदि भ्रूण हत्या भी किया हो तो वह पाप मुक्त श्री स्टीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित हो जाते हैं। एवं अन्य अनुवादको ने श्लोक संख्या ४५३ तथा