राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४८५ तां विष्णुप्रतिमां तच्च लिङ्गमीशानपूजितम् । स्वयं प्रजासृजः पूज्यं कालेनादत्त रावणः ॥४४६॥ ४४६. 'स्वयं प्रजापति का पूज्य (एवं) ईशान पूजित उस लिंग तथा उस विष्णु प्रतिमा को समय से रावण ने प्राप्त किया । तेनाप्यभ्यर्च्यमानं तत् लङ्कायामभवच्चिरम् । देवद्वयं रावणान्ते नीतमासीच्च वानरैः ॥४४७॥ ४४७. 'लंका में वह (लिंग) चिरकाल तक उससे पूजित हुआ। रावण के पश्चात् वानरों ने देव-द्वय (दोनों लिंगों) को ले लिया । तिर्यक्तया ते कपयो मुग्धा हिमनगौकसः । शान्तौत्सुक्या शनैः देवौ न्यधुरुत्तरमानसे ॥४४८॥ ४४८. 'हिमालय निवासी उन मुग्ध कपियों ने (तिर्यक) पशु स्वभाव के कारण उत्सुकता समाप्त हो जाने पर दोनों देवों को उत्तर मानस' में रख दिया । पाठभेद : सर्वपापविनिर्मुक्तो वारुणं लोकमश्नुते । श्लोकसंख्या ४४८ में 'हिमनगौकसः' का मानसस्योत्तरे कूले महापद्मजलाशये ॥ 'हिमानसौकसः' तथा 'देवौ' का पाठभेद 'देव्यौ' 1005 = ११७६ मिलता है । * * * पादटिप्पणियाँ : तत्र संस्थापयन्तिस्म ज्येष्ठेशं ते सदैव तु । ४४८ (१) उत्तरमानस : कश्मीर में उत्तर अहन्न् दिव्येन तोयेन शुभेनोत्तरमानसम् ॥1112 मानस गंग बल को कहते है । हरमुख पर्वत की = १३१२-१३१३ पूर्वोव हिमानी के अधोभाग में वह सरोवर * * * स्थित है। हरमुकुट माहात्म्य तथा हरचरित तेषां तपःप्रभावेण भक्त्या च मम पार्षद । चिन्तामणि (४:८७) से भी यह बात प्रमाणित होती सोदरस्य च नागस्य स्नानं कृत्वा विधानतः ॥ है । 'नीलमत पुराण (श्लोक ९१०, ९९०, तथा 1113 = १३१३-१३१४ १२६३) में भी इसका उल्लेख है । पृष्ठ १०० भी * * * द्रष्टव्य है । मृत्युं विसर्जयामास सान्त्वयित्वा सुरारिहा । उत्तर मानस से नीचे एक दूसरा सर है नन्दिनं च समादाय दृष्ट्वा चोत्तरमानसम् ॥ उसमे भी जल हिमानी अर्थात् ग्लेसियर से आता 1117 = १३२० है। इसे गुन्द कोल कहते हैं । प्राचीन नाम × × × कालोदक है । नन्दिसर भी कहा जाता है । हर- उत्तरे मानसे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । चरित चिन्तामणि तथा नीलमत पुराण में इसका पितरस्तर्पितास्तत्र कामान्यच्छन्त्यभीप्सितान् ॥ उल्लेख मिलता है : 1241 = १४५४ १४५५ नारायणो निरुद्धश्च वासुदेवो जलान्धसः । महाभारत अनुशासनपर्व में कालोदक, नन्दिकुण्ड, पात्रश्च मानसश्चैव तथैवोत्तरमानसः ॥ नन्दीश्वर तीर्थों का इतना सुन्दर वर्णन मिलता है . 890 = १०६० ७४