राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८४ राजतरंगिणी किंर्त्तव्यंतया मूढं प्रतिष्ठांविघ्नविह्वलम् । दिव्यदृष्टिः स्वयं देवी ततो राजानमंब्रवीत् ॥४४२॥ ४४२. किंकर्तव्य विमूढ एवं प्रतिष्ठा के विघ्न 'से विह्वल राजा से दिव्य दृष्टि स्वयं देवी ने कहा— राजन्गिरिसुतोद्वाहे पौरोहित्यं पुरा भजन् । स्वमर्चादेवमादत्त पूजाभाण्डात्प्रजापतिः ॥४४३॥ ४४३. 'राजन् ! प्राचीन काल में गिरिसुता परिणय में पौरोहित्य कर्म करते प्रजापति ने पूजा पात्र से अपने अर्चा देव को लिया । तां विष्णोः प्रतिमां वीक्ष्य पूजितां तेन धूर्जटिः । शून्यामिव तदा मेने शक्तिरूपां विना शिवम् ॥४४४॥ ४४४. 'उन (ब्रह्मा) से पूजित शक्ति रूपा उस विष्णु' प्रतिमा को शिव रहित देख कर धूर्जटी (शिव) ने शून्य (अनुपयोगी) माना । निमन्त्रितैर्ढौकितानि रत्नान्यथ सुरासुरैः । पिण्डीकृत्य स्वयं चक्रे लिङ्गं भुवनवन्दितम् ॥४४५॥ ४४५. 'निमन्त्रित सुरों एवं असुरों द्वारा प्रदत्त रत्नों को एक में (पिण्डी कृत) करके स्वयं भुवन वन्दित लिंग निर्मित किया । 'अश्व' मिलता है । दिया था । पादटिप्पणियां : पूर्वकाल में पार्वती कृष्ण वर्ण की थी । ४४२ (१) विघ्न : किसी प्रकार शुभ, अमरकेश्वर तीर्थ में स्नान कर इन्होंने शिव को पवित्र, तथा यात्रादि में किसी प्रकार का अवरोध दीप दान किया था । उसके पश्चात् वह गौर वर्ण उत्पन्न करना, उसमें अड़ंगा लगाना, उसके नष्ट हो गयी थी । करने की चेष्टा करना विघ्न कहा जाता है। पर्वत की कन्या होने के कारण नाम पार्वती धार्मिक कृत्यों में यदि विघ्न पड़ता है तो समझा पड़ा था । पर्वतों की अधिष्ठात्री देवी होने के जाता है कि क्रिया करने वाले का अनिष्ट होगा । कारण भी नाम पार्वती पड़ा था । यह नृत्यों में पाठभेद : लास्य नृत्य की प्रवर्तिका मानी जाती हैं । श्लोक संख्या ४४३ में 'स्वमर्चादेवमादत्त' का पाठभेद : 'तद्योर्हेशमादित्य' तथा 'दत्त' का पाठभेद 'धत्त' श्लोक संख्या ४४४ में 'शून्यामिव' का पाठभेद मिलता है । 'शून्यामेव' मिलता है । पादटिप्पणियां : पादटिप्पणियां ; ४४३ (१) गिरिसुता : हिमालय तथा मेना ४४४ (१) शक्तिरूपा विष्णो : वायुपुराण की कन्या पार्वती थी । नारद के सुझाव पर २५ : २३ तथा कूर्म पुराण २ : ४ के अनुसार विष्णु हिमालय ने पार्वती का विवाह शिव के साथ कर भगवान् शिव शक्ति की मूर्ति माने जाते हैं ।