राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५८१ देवी वा भव कान्ता वा भीमा वा शोभनाऽपि वा । यादृशीं पूर्वमद्राक्षं तादृश्येवाऽवभासि मे ॥४२७॥ ४२७. 'आप देवी हों अथवा कान्ता, भयंकर हों अथवा सुन्दर, जिस प्रकार पहले देखा था, उसी प्रकार अब भी मुझे लग रही हो।' तमित्थं कथयन्तं सा ज्ञात्वा निश्चलनिश्चयम् । एवं जन्मान्तरे भावोत्यभ्यधादनुरोधतः ॥४२८॥ ४२८. इस प्रकार सानुरोध करते हुए, उसे दृढनिश्चयी जानकर उस (देवी) ने कहा—'ऐसा जन्मान्तर में होगा।' उत्सहन्ते हि संस्प्रष्टुं न दिव्या मर्त्यधर्मिणः । तद्गच्छ क्रूरसंकल्पेत्युक्त्वा सान्तर्दधे ततः ॥४२९॥ ४२९. 'दिव्य (शरीरी) मरणशील प्राणियों का स्पर्श नहीं करते हैं। अतएव हे क्रूर संकल्प ! तुम जाओ।' कहकर देवी अन्तर्ध्यान हो गयी। अशून्यजन्मा भूयासं तया देव्येति चिन्तयन् । प्रयागवटशाखाग्रादहसीत्स वपुस्ततः ॥४३०॥ ४३०. तदनन्तर 'उस देवी के साथ दिव्य जन्म की प्राप्ति होगी' ऐसा सोचते हुए उसने प्रयाग के वट¹ के शाखाग्र से शरीर त्याग कर दिया। सोऽजायत रणादित्यो रणारम्भा च सा भुवि । मर्त्यभावेऽपि या नैव जहौ जन्मान्तरस्मृतिम् ॥४३१॥ ४३१. वह पृथ्वी पर रणादित्य हुआ। वह (देवी) रणारम्भा हुई जिसने मानव योनि में भी जन्मान्तर की स्मृति नहीं त्यागी। पाठभेद : तथा पश्चिम भारत में इस वृक्ष को वड़ तथा उत्तर श्लोक संख्या ४२९ में 'सस्प्रष्टु' का पाठभेद भारत में बरगद कहते हैं। 'संस्प्रष्टु' 'दिव्या' का 'देव्यो' तथा 'धर्मिण.' का पुराणों में वर्णन मिलता है। प्रलय काल में पाठभेद 'धर्मिणाम्' मिलता है। जब सब कुछ जलमय हो जाता है उस समय श्लोक संख्या ४३० में 'स' का पाठभेद 'स्व' वट का एक वृक्ष बच जाता है। उसके एक पत्ता मिलता है। पर भगवान् बाल रूप धारण कर रहते हैं। वहां पादटिप्पणियाँ : से सृष्टि के अनादि रहस्य का अवलोकन करते हैं। यह वट प्रयाग संगम पर है। कालिदास ने रघुवंश ४३० (१) वट : 'अक्षय वट' प्रयाग में में इसका उल्लेख किया है। गंगा-यमुना संगम पर किला में है। स्वर्ग में सुख पाठभेद : की प्राप्ति से स्वतः शरीर विसर्जन का उल्लेख श्लोक संख्या ४३१ में 'नैव' का पाठभेद 'मत्रेव' हुएन्त्सांग ने किया है। (रा०त० १:२३२) दक्षिण मिलता है।