राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 762, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५७९ भास्वद्विम्बाधरां कृष्णकेशीं सितकराननाम् । हरिमध्यां शिवाकारां सर्वदेवमयीमिव१ ॥ ४१६ ॥ ४१६. रविविम्ब अधर, कृष्ण रूप केश, शशि रूप आनन, हरि रूप मध्य, शिव रूप आकृति से मानो वह सर्वदेव मयी थी२ । तां विभाव्यानवद्याङ्गीं निर्जने यौवनोर्जिताम् । निन्येऽवारितवामेन स कामेन विधेयताम् ॥ ४१७ ॥ ४१७. निर्जन में यौवन पूर्ण उस सर्वांग सुन्दरी को देखकर वह अवारित (प्रतिरोध रहित) कुटिल काम के वशीभूत हो गया । दधती रूपमाधुर्यपूरच्छन्नामधृष्यताम् । अप्सराः प्रत्यभात्तस्य सा हि चित्ते न देवता ॥ ४१८ ॥ ४१८. रूप की अत्यधिक माधुरी से पूर्ण एवं असंयत वह, उसके चित्त में (उसे) अप्सरा प्रतीत हुई न कि देवता । कृपामृदुरवादीत्तं व्यथितोऽसि चिरं पथि । मुहुः सौम्य समाश्वस्य प्रार्थ्यतामुचितो वरः ॥ ४१९ ॥ ४१९. (देवी ने) उससे कृपापूर्ण मृदुवचन कहा—'सौम्य ! मार्ग में चिरकाल कष्ट प्राप्त किये आश्वस्त होकर उचित वर की प्रार्थना करो।' स तां बभाषे शान्तो मे भवत्या दर्शनाच्छ्रमः । अदेवी किं तु भवती वरं दातुं कथं क्षमा ॥४२०॥ ४२०. वह उस (देवी) से बोला—'आपने दर्शन द्वारा मेरा श्रम शान्त कर दिया । किन्तु आप देवी नहीं है । अतएव वर प्रदान में कैसे समर्थ होंगी।' ४१६ (१) इस पद के तुल्य बाण के हर्ष चरित में पद मिलता है— 'भास्वद् बिम्बाधारेण प्रसन्नावलोकितेन चन्द्र- मुखेन कृष्णवकेशेन, वपुषा सर्वदेवावतारइव.।' ४१६ (२) इसका अर्थ सभी अनुवादको ने भिन्न भिन्न किया है । उनमें केवल भावार्थ मिलता है । कल्हण कवि के श्लोक से शरीर मात्र का दर्शन होता है । आत्मा का नहीं । उक्त अनुवाद मूल के अत्यन्त निकट है । इसमें कवि ने अद्भुत काव्य व्यञ्जना प्रकट की है । यहाँ कवि ने सूर्य, कृष्ण, राम, हरि तथा शिव सबसे निर्मित शरीर का उल्लेख किया है । उक्त श्लोक का निम्नलिखित अर्थ भी होता है । “भास्वद्विम्बाधरा, कृष्णकेशी, शितकरानना हरिमध्या, शिवाकारा वह मानों सर्वदेवमयी (सर्व देवनिर्मित ) थी ।” श्लोक का भावार्थ निम्न प्रकार से होगा : उसके अधर बिम्बतुल्य रक्तवर्ण, केश काले; आनन शशीतुल्य सुन्दर, सुन्दर कर एवं आनन, मध्य (कटि) सिंह सदृश कृश एवं आकार सुन्दर था ।” इसी प्रकार का वर्णन भवभूति के मालतीमाधव नाटक के प्रथम अंक तथा कालिदास के मेघदूत में मिलता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४१९ में 'सौम्य' का पाठभेद 'सोम्य' मिलता है ।