राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५६१ तद्विना नगरं कुत्र पवित्राः सुलभा भुवि । सुभगाः सिन्धुमंमेदाः क्रीडावसथवीथिषु ॥ ३६० ॥ ३६०. पृथ्वी पर उस नगर के अतिरिक्त और कहाँ क्रीड़ागृह¹, पथों के तट तथा पवित्र एवं सुन्दर नहरें सुलभ हो सकती हैं ?
मास में पड़ता है। क्योंकि चान्द्रवर्ष गणना के अनु- सार प्रति तीसरे वर्ष मल मास अर्थात् एक मास और वर्ष में जुट जाता है अतएव सौर वर्ष के अनुसार इसका समय अस्थिर रहता है। चैत्रमास का कश्मीर में बड़ा महत्त्व है। प्रथम दिन चैत्र से संवत् का आरम्भ होता है। प्रथम दिन चैत्र शुक्लपक्ष को ब्राह्मणों को वस्त्र, अलंकार, मुद्रा, तथा रत्न दान करने का पर्व माना जाता है। चैत्र में श्रीपञ्चमी के दिन लक्ष्मी पूजन का माहात्म्य है। (नी० ६४१-६४६) कश्मीर मण्डल की देवी कश्मीरा का प्रतिमा को स्नान पूजा आदि करने का विधान किया गया है। चैत्र शुक्ल षष्ठी को चैत्र षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन स्कन्द की पूजा होती है। यह दिन बालकों के स्वास्थ्य के साथ सम्बन्धित किया गया है। चैत्र नवमी को भद्रकाली की पूजा पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य से की जाती है। चैत्र शुक्ल एकादशी को वास्तु देव की पूजा की जाती है। चैत्र द्वादशी को वासुदेव की पूजा का दिन है। चैत्र त्रयोदशी को मदनयात्रा उत्सव मनाया जाता है। कामदेव का छवि वस्त्र बनाया जाता है। इस दिन पति अपना पत्नी को स्नान कराता है। चैत्र सुदी पन्द्रह को पिशाच प्रयाण का उत्सव मनाया जाता है। निकुम्भ ने इस दिन बालुकार्णव में अभियान करता पिशाचों के निवास स्थान पर आक्रमण किया था। पिशाच की मृत्तिका प्रतिमा बनायी जाती थी। उसकी पूजा प्रत्येक गृह में मध्याह्न तथा चन्द्रोदय काल में की जाती थी। नीलमत पुराण ने इस प्रकार सम्पूर्ण चैत्र मास में प्रायः प्रत्येक दिन को पूजा तथा उत्सव का दिन निश्चित कर दिया है। (नी० ६४४-६६७) ७१
पाठभेद - श्लोक संख्या ३६० में 'सुभगा' का पाठभेद 'सुलभाः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३६० । १) क्रीड़ा गृह एवं नहरें : कल्हण का यहाँ तात्पर्य डल लेक अर्थात् शुवेश्वरो सर तथा अंचर लेक से निकलने वाली अनेक नहरों से है जो श्रीनगर में फैली हैं। वे श्रीनगर के केन्द्र तक चली गयी हैं। इन नहरों पर बाजार तथा मकान आदि अब भी बने हैं। हाउस बोट नहरों में लगी रहती हैं। जहाँ बिजली का प्लग तटवर्ती बिजली के खम्भों से लगाकर पूरा हाउस बोट विद्युन्मय कर दिया जाता है। यह नहरें वेनिस की नहरों के समान यातायात तथा परिवहन का काम करती हैं। शाक- सब्जी तथा अन्य सामान बेचने वाले नावों पर सामान बेचते हैं। थाईलैण्ड के बैंकाक नगर में भी नहरों में घूमती नावों पर बाजार लगा दिखायी देता है। मुझे दोनों स्थानों की साम्यता देखकर आश्चर्य हुआ। कल्हण ने यहाँ 'पवित्र' शब्द का प्रयोग किया है। ये नहरें अब पवित्र नहीं कही जा सकतीं। आबादी बढ़ जाने के कारण, तथा हाउस वोटों की संख्या अत्यधिक होने और पर्यटकों की संख्या लाखों से ऊपर प्रति वर्ष पहुँचने के कारण नहरें गन्दी रहती हैं। मल मूत्र तथा गन्दगी सब नावों हाउस बोटों तथा तटवर्ती मकानों से निकलकर नहरों में जाती हैं। अतएव उन्हें आज पवित्र कहना पवित्रता का उपहास करना होगा। कल्हण के समय नहरें साफ रहीं होंगी। पवित्र शब्द श्लीस्टीन के मतानुसार वाङ्मय पद बनाने के लिये कल्हण ने प्रयोग किया है। परन्तु मैं समझता