भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय तरंग ५६५ कृतं कृत्यं महद्दत्त भोगा भुक्ता वयो गतम् । किमन्यत्करणीयं न एहि गच्छ शिवालयम् ॥ ३७३ ॥ ३७३. "कृत किये, महान् दान किया, भोगों का सम्भोग किया, आयु गत हो गयी, तुम्हें और क्या करणीय है ? आओ ! शिवालय ( शिवलोक ) चलो।"२ ततस्तं वृत्तसंकेतः संतोप्याभिमतार्पणात् । भित्त्वा तमश्मप्रासादं जगाहे विमलं नभः ॥ ३७४ ॥ ३७४. तद् उपरान्त संकेत को जानकर अभिमत (वाञ्छित धन) प्रदान द्वारा उसे (जयन्त को) सन्तुष्ट कर उस पाषाण प्रासाद का भेदन कर, विमल आकाश में प्रवेश किया। जनैः स ददृशे गच्छन् कैलासतिलकां दिशम् । विशदे घटयन् व्योम्नि द्वितीयतपनोदयम् ॥ ३७५ ॥ ३७५. कैलास तिलकित' (विभूषित) दिशा में जाते एवं निर्मल व्योम में द्वितीय सूर्योदय सम्पादित करते हुए देखा । जयन्तेनाद्भुतोदन्तहेतुनाऽवाप्य संपदः । स्वनामाङ्काग्रहारादकर्मभिनिर्ममेलाः कृताः ॥ ३७६ ॥ ३७६. जयन्त ने इस अद्भुत घटना द्वारा प्राप्त सम्पत्तियों का स्वनामांकित अग्रहारादि में सदुपयोग किया। एवं स भुवनैश्वर्यं भुक्त्वा भूमिभृतां वर । अनेनैव शरीरेण भेजे भूतपतेः सभाम् ॥ ३७७ ॥ ३७७. नृपति श्रेष्ठ उसने इस प्रकार भुवन भोग कर इसी शरीर से भूतपति की सभा को प्राप्त किया । पादटिप्पणियाँ : ३७३ (१) पत्र का खेल क्या था यह इस पद से स्पष्ट होता है । ३७४ (१) श्री विल्सन राजा का स्वर्गारोहण मूल काल सन् १८६ ई० तथा समीकृत काल सन् ४०६ ई० देता है । श्री एम० पी० पण्डित प्रवरसेन द्वितीय का स्वर्गगमन सन्१८६ ई० देते हैं। ३७५ (१) तिलकित : कैलास पर्वत गोल है । तिलक गोल होता है। कल्हण प्रतीत होता है कैलास यात्रा किया था। कैलास पर्वत सचमुच भूमि पर ललाट पर लगे गोल तिलक तुल्य लगता है। मैंने कैलास यात्रा की है। कल्हण का यह श्लोक पढ़ते ही, जिन्होंने भी कैलास यात्रा की है, उन्हें कैलास का अभिराम दृश्य स्मरण हो जायेगा । कैलास उत्तर दिशा में है। कैलास का शिखर हिमाच्छादित रहता है। पर्वत मूल मटमैले पत्थरों जैसे है। प्रायः हिमविहीन रहता है। ललाटपर भ्रूमध्य कस्तूरी तिलक के ऊपर यदि श्वेत चन्दन का तिलक लगा दिया जाय तो कैलास की उपमा ठीक बैठ जाती है । रक्त चन्दन किंवा केसर तिलक पर श्वेत चन्दन तिलक लगाने की प्रथा आज भी प्रचलित है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३७७ में 'भुक्त्वा' का पाठभेद 'त्यक्त्वा' मिलता है।